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सबा हसन:अमूर्त कला कृतियों में उन्होंने आख़िर क्या सिरजा है

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डॉ. मंजु प्रसाद

आम भारतीय जनों में बहुत सारे कलाकारों की तरह लोकप्रिय नहीं हैं सबा हसन, शायद अपनी आकृति विहीन कलाकृतियों की वजह से। अपनी कलाकृतियों को प्रभावशाली और अनोखा बनाने के लिए कई समकालीन चित्रकार आधुनिक तकनीक का बखूबी सहारा ले रहे हैं। सबा हसन भी अपने कला सृजन में चित्रकला, मूर्तिकला और वीडियो का इस्तेमाल करती हैं। उनकी उपलब्धियां सोचने पर विवश कर देती हैं कि विभिन्न माध्यमों से बनाईं अपनी अमूर्त कला कृतियों में उन्होंने आख़िर क्या सिरजा है। कौन से मौलिक विचार से प्रेरित हैं उनकी कलाकृतियां। सबा हसन गोवा और दिल्ली में रहने वाली कलाकार हैं। चर्चा में वे तब आईं जब उन्हें 2022 का प्रतिष्ठित पोलाॅक ग्रांट पुरस्‍कार प्राप्त किया जो कि कला के क्षेत्र में व्यक्तिगत तौर पर बेहतरीन काम करने वाले कलाकार प्रसिद्ध पोलाॅक क्रेशनर फाउंडेशन न्यूयॉर्क द्वारा दिया जाता है।

अमूर्त कला भावनाओं की अभिव्यक्ति ही है चाहे वो प्रेम की हो या पीड़ा की। जैसे संगीत की स्वर लहरी धीरे-धीरे ऊपर उठती है गिरती भी है लयपूर्ण ढंग से। उसी तरह से रंगों और रेखाओं का अंकन एक निपुण कलाकार करता है। यह देख कर महसूस करने की जरूरत है। रंग, रेखाएं टेक्सचर भावों और शब्दों की तरह हैं जिसके द्वारा चित्रकार एक कथ्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। दरअसल अमूर्त चित्रकला आधुनिक युग की देन है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद समाज में भय, संशय और निराशा ही व्याप्त थी। ऐसे समय में ही यूरोपीय कला में वस्तुनिरपेक्ष अभिव्यंजनावाद का जन्म हुआ। अमेरिकी चित्रकार जैक्सन पोलाॅक इसके प्रमुख कलाकारों में से हैं। चित्रण में सहज ज्ञान और अंतर्मन से संचालित प्रक्रिया ही वस्तु निरपेक्ष अभिव्यंजनावाद के मूल आधार हैं। अमूर्त कला इसी विचारधारा से प्रेरित है।

प्रतिकूल स्थितियों में यथार्थ चित्रण बहुत जोखिम भरा और विवादों को जन्म देता है। हमारे यहां बहुत सारे कलाकार इससे बचने के लिए कला में अमूर्त शैली को अपनाते हैं। कलाकार सबा हसन ने किस उद्देश्य से किन परिस्थितियों में इस शैली को अपनाया यह बात गौण है। महत्वपूर्ण ये है कि कला सृजन में उनके विचार क्या हैं? इस संदर्भ में सबा हसन बेहद प्रगतिशील हैं। 2012 के एक साक्षात्कार में अपने बारे में वे बताती हैं ” मैं जीवन में एक गैर परंपरावादी व्यक्ति हूं। मेरे जीवन मूल्य नैसर्गिक रूप से मेरे सहज बोध से अभिप्रेरित हैं न कि परंपरा से। यह विशेषता स्वाभाविक रूप से मेरे प्रशिक्षण में बिखरी रहती है। सबसे पहले मैं कैनवास पर मिट्टी या सीमेंट का इस्तेमाल करती हूं। जो विधिवत सुनियोजित ढंग से नहीं होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चित्रकला में मैं इमपेस्टो तकनीक (चित्र फलक पर ब्रश स्ट्रोक्स या पैलेट चाकू से रंगों के मोटी परत लगाने की तकनीक) इस्तेमाल करती हूं। जब मैं युवा थी तो काफी मात्रा में तैल रंगों को खरीदने में असमर्थ थी। इसीलिए एक्सपेरिमेंट करके रंगों में अन्य सामग्री को मिलाने लगी। बहुत सारी असफलताओं के बाद मेरी तकनीकी पर पकड़ हुई।”

तकनीकी जानकारी में पारंगत होकर सबा हसन ने अपनी कलाकृतियों में विविध सामग्रियों का इस्तेमाल करना शुरू किया जैसे रंग, जला कर उत्पन्‍न किये प्रभाव, किताबें, रेत, काजल, रस्सी, पत्तियां, समुद्री सीप आदि।

अपनी कलाकृतियों से सबा हसन गहरी संवेदनाओं के साथ जुड़ती हैं। अरबी प्रवाही लिपि से, पर्शियन लघु चित्रों से उनकी रंग शैली प्रभावित हैं। भारतीय परंपरागत बौद्ध भित्तिचित्र शैली आदिवासी कला से भी वे अपने चित्रों में प्रभाव लेती हैं। सबा हसन अपनी मां से बहुत प्यार करती रही हैं। उनके बीच हुए अपने पत्राचार को भी सबा ने सृजनात्मक रूप दिया है।

सबा हसन ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक किया ‌है। इन्होंने सांस्कृतिक मानव विज्ञान सइरक्यूज विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। कला का विधिवत प्रशिक्षण सबा हसन ने ‘सरेलीयम ईकोल डी आर्टस विजुअल लाओसाने’ से लिया।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (यू.के.) से कला इतिहास का अध्ययन किया।

सबा हसन को कई पुरस्कार और सम्मान मिले। 2007 में रज़ा फाउंडेशन की ओर से रज़ा पुरस्कार मिला। गुजरात में हुए दंगों ने सबा को बहुत प्रभावित किया। नागरिकता को लेकर किए गए दिल्ली के शाहीन बाग में हुए महिला आंदोलन आन्दोलन का सबा हसन ने सृजनात्मक समर्थन किया था।
कलाकार सबा हसन की कला और विचारधारा में बेहद संभावनाएं हैं। विश्वास है अपने कला सृजन को काफी आगे ले‌कर जाएंगी।

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