दुनिया के मकबूल शायर डॉ. राहत इंदौरी… उनकी 75वीं सालगिरह का जश्न इंदौर में मनाया जा रहा है। लाभ मंडपम का बड़ा हॉल श्रोताओं से खचाखच भरा था। देश दुनिया के नामवर शायर अपना कलाम पेश करने के लिए हाज़िर थे। कई शायर अपना फन दिखा चुके थे… कई अपनी बारी के इंतजार में थे। मुशायरे के सूत्रधार ने अचानक उन्हें कलाम पढ़ने के लिए आमंत्रित किया, जिनकी याद में यह आयोजन किया जा रहा था। डॉ. राहत इंदौरी के नाम के एलान के साथ ही पूरे मजमे में उत्सुकता और आश्चर्य की लहर दौड़ गई। हॉल की लाइट्स ऑफ कर दी गईं… और स्टेज पर लगे बड़े स्क्रीन पर राहत साहब अवतरित हुए… अपने जाने, पहचाने और पसंद किए जाने वाले अंदाज में कलाम के साथ सबसे रू-ब-रू हुए। मंच पर मौजूद शायरों ने भी अपना रुख बदलकर स्क्रीन पर टकटकी लगा ली।

जश्न ए राहत के दौरान इस अनोखे अंदाज को स्क्रीन प्ले करने की योजना राहत इंदौरी फाउंडेशन के फैसल राहत ने बनाई थी। मंच पर शायरों के लिए रखी गई कुर्सियों में एक राहत साहब के लिए भी छोड़ी गई थी। तय किया गया कि हर साल के आयोजन में राहत साहब की यह कुर्सी इसी तरह आबाद रहा करेगी।
राहत के बाद की राहत
मैं जिंदा हूं… राहत साहब की शायरी काल की अन पढ़ी, अन छपी शायरी का हिस्सा है। रेखता पब्लिकेशन ने इन अनदेखे और अनसुने कलाम को किताब की शक्ल दी है। जश्न ए राहत के दौरान इस पुस्तक का विमोचन किया गया। इस खास किताब से राहत के चाहतमंद उनके कई नए कलाम पढ़ पाएंगे।
सूफियाना अंदाज़
सूफियाना अंदाज़ में भी राहत साहब की कई गजलें जश्न ए राहत के दौरान सुनाई दीं। अंतरराष्ट्रीय सूफी गायक आफताब कादरी ने इस खास प्रस्तुति की विशेष तैयारी की थी। सूफियाना अंदाज़ जब श्रोताओं के सामने आया तो राहत के खैरख्वाह झूम झूम उठे।
एक नई तहरीर यह भी
शाम करीब चार बजे शुरू हुई जश्न की विभिन्न कड़ियां रात करीब डेढ़ बजे तक सतत चलती रहीं। राहत की बात, सूफियाना रंग, किताबों का विमोचन और महफिल ए मुशायरा में लोग ऐसे डूबे कि उन्हें लाभ मंडपम के बाहर की दुनिया ही बेरंग और नीरस लगने लगी। किसी साहित्यिक कार्यक्रम की इतनी लंबी अवधि को भी अब तक का नया इतिहास करार दिया जा रहा है।




