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वोटर ID को आधार से लिंक करना स्वैच्छिक या अनिवार्य? क्यों मचा है बवाल; विपक्ष क्यो कर रहा है इसका विरोध?

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वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करने वाला चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 विपक्ष के विरोध के बावजूद मंगलवार को राज्य सभा से भी पास हो गया। ये बिल एक दिन पहले ही लोकसभा से पास हुआ था। विपक्ष चाहता था कि इस बिल को स्थाई समिति के पास भेजा जाए, लेकिन सरकार ने इस मांग को ठुकरा दिया। सरकार ने चुनाव कानूनों में संशोधन करने वाले इस बिल को जरूरी बताया है तो वहीं विपक्ष इसका विरोध कर रहा है।

आइए जानते हैं कि आखिर क्या है चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021? इसमें वोटर आईडी कार्ड को आधार से जोड़ने को लेकर क्या कहा गया? क्यों मचा है इस पर बवाल? विपक्ष क्यो कर रहा है इसका विरोध?

क्या है चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021?

चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 या इलेक्शन लॉज (अमेंडमेंट) बिल 2021 का उद्देश्य कई चुनाव सुधारों को लागू करना है, जिनको लेकर लंबे समय से बातचीत जारी थी। ये बिल 20 दिसंबर को लोकसभा और 21 दिसंबर को राज्यसभा से पास हो गया है। इस बिल में वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक किए जाने का जिक्र है और इसी बात को लेकर ये बिल विपक्ष के निशाने पर है।

सरकार ने चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 को लेकर उठ रहे सवालों पर अपना पक्ष रखा है और बताया है कि इलेक्टोरल रोल से आधार को लिंक करना क्यों जरूरी है?

वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करना क्यों जरूरी? ये हैं सरकार के तर्क

  • इस बिल में एक प्रावधान है जिसके तहत नया आवेदक पहचान के उद्देश्य से निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को आधार संख्या दे सकता है।
  • बिल में कहा गया है कि कोई भी आवेदन इस आधार पर खारिज नहीं होगा और न ही वोटर लिस्ट से इसलिए किसी का नाम कटेगा कि उसने आधार नहीं दिया है।
  • बिल में ये जरूर कहा गया है कि आधार न दे पाने वाले आवेदक को इसके ‘’पर्याप्त कारण’’ बताने होंगे।
  • मतदाता सूची के साथ आधार को जोड़ने से एक ही व्यक्ति के नाम पर अलग-अलग जगहों पर बने कई वोटर आईडी की समस्या को खत्म करने में मदद मिलेगी।
  • एक ही व्यक्ति के नाम पर अलग-अलग जगह पर वोटर आईडी कार्ड जारी होने की वजह वोटर के बार-बार निवास स्थान बदलने और पिछले नामांकन को हटाए बिना नए स्थान पर वोटर आईडी के लिए आवेदन के कारण होता है।
  • इस प्रकार, जिन वोटर्स के नाम एक से अधिक वोटर लिस्ट में या एक ही वोटर लिस्ट में एक से अधिक बार आते हैं, उन दिक्कतों को भी दूर किया सकेगा।
  • एक बार आधार के वोटर लिस्ट से लिंक हो जाने के बाद, जब भी कोई व्यक्ति नए रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करेगा, तो वोटर लिस्ट डेटा सिस्टम पिछले रजिस्ट्रेशन के बारे में तुरंत अलर्ट कर देगा।
  • इससे काफी हद तक वोटर लिस्ट को साफ करने में मदद मिलेगी।

वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करना स्वैच्छिक नहीं अनिवार्य?
इस बिल में चुनाव सुधारों के लिए जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन किए गए हैं। 1950 के एक्ट के मुताबिक, कोई व्यक्ति निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के पास अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकता है।

इस एक्ट में संशोधन के बाद इस बिल के मुताबिक, ”निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी किसी व्यक्ति से उसकी पहचान साबित करने के लिए उसका आधार पेश करने के लिए कह सकता है। यदि उसका नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में है, तो लिस्ट में दर्ज एंट्री के प्रमाणीकरण के लिए आधार संख्या की आवश्यकता हो सकती है।”

इस बिल में कहा गया है, ”किसी व्यक्ति द्वारा आधार न दे पाने की वजह से न तो वोटर लिस्ट में उसका नाम शामिल करने से वंचित किया जाएगा और न ही वोटर लिस्ट से उसका नाम हटाया जाएगा, बशर्ते इसके लिए (आधार न देने के लिए) उसके पास ”पर्याप्त कारण” (sufficient cause) हों।

सरकार ने आधार न देने के लिए बिल में जिस ”पर्याप्त कारण” शब्द का जिक्र किया है, उसी को लेकर कई विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार ने भले ही वोटर आईडी को आधार से लिंक करने को स्वैच्छिक कहा है, लेकिन बिल में आधार न देने के लिए ”पर्याप्त कारण” बताने को स्पष्ट नहीं किया है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस बिल का यह सेक्शन बहुत ही जटिल है क्योंकि इससे ऐसा तो लगता है कि आधार देना स्वैच्छिक है लेकिन अगर कोई आधार लिंक नहीं कराना चाहता है तो उसके लिए सरकार ने ‘पर्याप्त कारण” बताने को कहा है। लेकिन बिल में इसका जिक्र नहीं है कि ”पर्याप्त कारण” क्या हो सकते हैं? सरकार को इस बात को स्पष्ट करना चाहिए कि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किन वजहों से आधार देने को बाध्य नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शुरुआत में भले ही सरकार ये दावा करे कि आधार को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने का कदम स्वैच्छिक है, लेकिन धीरे-धीरे ये कुछ अन्य सेवाओं की तरह ही अनिवार्य बन जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट लगा चुका है वोटर आईडी को आधार से लिंक करने पर रोक
वोटर आईडी को आधार से लिंक करने का प्रयास चुनाव आयोग पहले भी कर चुका है। 2015 में चुनाव आयोग ने मार्च 2015 से अगस्त 2015 तक राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धिकरण कार्यक्रम (NERPAP) चलाया था। उस समय चुनाव आयोग ने 30 करोड़ से अधिक वोटर आईडी को आधार से लिंक करने का प्रॉसेस पूरा कर लिया था। ये प्रक्रिया रोक सुप्रीम कोर्ट द्वारा वोटर आईडी को आधार से लिंक करने पर रोक लगाए जाने के बाद रुकी।

दरअसल, वोटर आईडी को आधार से लिंक करने की प्रक्रिया के दौरान आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के करीब 55 लाख लोगों के नाम वोटर डेटाबेस से हट गए थे। इसी को लेकर आधार की संवैधानिकता को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था और शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को वोटर आईडी और आधार को लिंक करने से रोक दिया था।

26 सितंबर 2018 को आधार को लेकर दिए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्य सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के अलावा आधार को किसी भी सेवा के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है।

विपक्ष क्यों कर रहा है इसका विरोध?
विपक्ष लगातार चुनाव कानून (संशोधन) बिल का विरोध कर रहा है। राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर भड़कते हुए कहा कि बिना चर्चा और बहस के इस बिल को पास कराना ‘लोकतंत्र का मजाक’ उड़ाना है।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस बिल पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कहा कि आधार ”केवल निवास के प्रमाण के लिए है, न कि नागरिकता के प्रमाण के लिए।” थरूर ने कहा कि ऐसा करके सरकार गैर-नागरिकों को वोटिंग अधिकार दे रही है।

AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि सरकार इससे राइट टू प्राइवेसी’ अधिकार का भी उल्लंघन करेगी। ओवैसी ने कहा कि इस कदम से चुनाव आयोग की स्वायत्तता में भी दखल पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी वोटर आईडी कार्ड को आधार से जोड़ने को गलत कहा था।

इस बिल से होंगे और कौन-कौन से चुनाव सुधार
वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक कराने के अलावा चुनाव कानून (संशोधन) बिल से कुछ और प्रमुख चुनाव सुधार होने हैं:

नए मतदाता साल में 4 मौकों पर रजिस्ट्रेशन करा पाएंगे

  • इस बिल में पहली बार वोटर बनने वाले युवा मतदाताओं (18 वर्ष) को वोटर लिस्ट में रजिस्ट्रेशन कराने के अधिक मौके मिलेंगे।
  • अब युवा मतदाता अब साल में चार मौकों (चार अलग कट ऑफ-डेट) पर वोटर लिस्ट में रजिस्ट्रेशन करा पाएंगे।
  • अभी तक पहली बार मतदाता बनने वालों (18 वर्ष का होने वालों) को साल में केवल एक बार 1 जनवरी को ही रजिस्ट्रेशन कराने का अधिकार था।
  • इस बिल में पहली बार मतदाता बनने वालों को साल में चार तारीखों पर 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर को वोटर लिस्ट में रजिस्ट्रेशन कराने का प्रावधान है।
  • 1 जनवरी या उससे पहले 18 वर्ष का होने वाले लोगों को साल में केवल एक बार ही वोटर आईडी के लिए रजिस्ट्रेशन कराने का नियम था।

इस बिल में आर्मी वोटर्स के लिए नियम को जेंडर न्यूट्रल बनाया गया है।

  • अब महिला सैन्यकर्मी के पति को भी सर्विस वोटर माना जाएगा।
  • अभी तक पुरुष सैन्यकर्मी की पत्नी को तो सर्विस वोटर माना जाता है लेकिन महिला सैन्यकर्मी के पति को सर्विस वोटर नहीं माना जाता था।
  • चुनाव आयोग ने इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में आर्मी वोटर्स के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘पत्नी’ शब्द को बदलकर ‘स्पाउस’ (जीवनसाथी) करने का सुझाव दिया था।

किसी भी परिसर का उपयोग कर सकेगा चुनाव आयोग

  • इस बिल के कानून बनने के बाद चुनाव आयोग को किसी भी परिसर के चुनाव संबंधी कार्यों के लिए इस्तेमाल का अधिकार मिल जाएगा।
  • चुनाव आयोग को पोलिंग स्टेशन, मतगणना, या बैलेट बॉक्स और वोटिंग मशीनों के स्टोरेज के लिए किसी भी परिसर के इस्तेमाल का अधिकार होगा।
  • अभी तक चुनाव आयोग द्वारा तक चुनावों के दौरान कुछ परिसरों के इस्तेमाल पर आपत्तियां उठती थीं।

Ramswaroop Mantri

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