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परीक्षा प्रणाली में किसी सुधार के बारे में सोचने की क्या जरूरत

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प्रणव प्रियदर्शी

आज तो बच्चों को परीक्षा के दबाव से बचाने के लिए पीएम मोदी खुद मैदान में निकल आया करते हैं। ‘परीक्षा पर चर्चा’ का हर दौर इसका साक्षी है। और जब खुद मोदी ‘चर्चा’ कर रहे हैं तब परीक्षा प्रणाली में किसी सुधार के बारे में सोचने की क्या जरूरत। हर तनाव छात्रों के जीवन से यूं गायब होगा जैसे गधे के सिर से सींग।

पर एक ज़माना इस देश में ऐसा भी था जब ना तो मोदी जी पीएम होते थे और ना परीक्षा पर चर्चा जैसी सुविधा छात्रों को उपलब्ध होती थी। तब यूपी में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह जैसे नेता परीक्षा- परीक्षा खेलते थे। एक को परीक्षा प्रणाली की शुद्धता की इतनी चिंता थी कि वे नकल करने वाले छात्रों को दुर्दांत अपराधियों की तरह जेल की सींखचों के पीछे पहुंचाने पर तुले रहते थे और दूसरे को नौनिहालों के भविष्य की फिक्र इस कदर सताती थी कि वे परीक्षा में नकल पर कोई बंदिश बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। 

बिहार का मामला बिलकुल अलग था। वह कहने में नहीं करने में यकीन रखता था। वहां ऐसी बहसें नहीं होती थीं, सारे प्रयोग परीक्षा हॉल में ही देखने को मिलते थे। चीटिंग के इनोवेटिव आइडिया तो पनपते ही रहते, इसे रोकने या कम करने की कवायद भी नए रंग दिखाती।  

मसलन, जब मैंने दसवीं का बोर्ड दिया, इनविजलेटर्स कड़ी चेतावनी दिया करते थे, ‘देखो, फ्लाइंग स्क्वाड (उड़न दस्ता जो औचक निरीक्षण का काम करता था) वाले घूम रहे हैं। अगर थोड़ी-बहुत भी आवाज हुई और वे आ गए तो परीक्षा रद्द हो सकती है। इसलिए जो करना है शांति से करो।‘ यह बताने की जरूरत नहीं कि शांति से क्या करने को कहा जा रहा था। 

12वीं की परीक्षा में मामला यहां तक पहुंचा कि चिट या गाइड के पन्नों को छुपाने की जरूरत नहीं रह गई थी। स्नातक परीक्षा के दौरान तो यह स्थिति थी कि एग्जामिनेशन रूम के एक कोने में रखी गाइड उठाकर लाने का समय बचाने की गरज से एक परीक्षार्थी ने इनविजलेटर से ही रिक्वेस्ट किया, ‘सर जरा गाइडवा बढ़ाइए ना वहां से।‘ इस पर ‘सर’ ने उसे घुड़कते हुए कहा, ‘बदतमीज, लेना है तो खुद उठकर लो। तुम लोगों का कुछ भरोसा है, अगली बार कहोगे कि सर मैं घर पर भूल आया गाइड, आप प्लीज जाकर लेते आइए।‘

एक जिला मुख्यालय में किसी सेंटर पर सख्ती कुछ ज्यादा हो गई तो एक उद्वेलित छात्र ने अपने स्कूल के प्रिंसिपल को फोन किया कि सर उस सेंटर पर तो चीटिंग ही नहीं करने दे रहे। ‘अच्छा? कौन नहीं करने दे रहा, तुम नाम बताओ।‘ छात्रों के भविष्य के प्रति चिंतित उस ‘प्रभावशाली’ प्रिंसिपल ने संबंधित व्यक्ति की खबर लेते हुए उसे चेताया, कि अगर ऐसी ही सख्ती हुई तो उनके सेंटर में रिजल्ट 10-12 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा और फिर उसकी जिम्मेदारी उन्हें ही लेनी होगी। धमकी का असर अगले दिन ही दिख गया। उस सेंटर पर सामान्य व्यवस्था बहाल हो चुकी थी।

खैर यह तो बीते दौर की बात थी। मौजूदा दौर एआई का है। पिछले दिनों नई पीढ़ी के नौनिहालों से बातचीत के क्रम में तकनीकी विकास के परिणामों की झलक मिलीं। उनका कहना था, अब पुराने जमाने की तरह चिट लिखने पहुंचाने वाला मामला नहीं रहा। अब तो सीधे चैटजीपीटी का खेल हो गया है। यानी? यानी यह कि क्वेश्चन पेपर की तस्वीर खींच कर चैटजीपीटी से उत्तर मांगा जाता है और मिनटों में व्हाट्सएप मैसेज के रूप में मदद हाजिर हो जाती है। 

मदद कौन करता है?  कोचिंग सेंटर का व्हाट्सएप ग्रुप। अब सारे बच्चे तो चैटजीपीटी का इस्तेमाल भी ठीक से नहीं कर पाते ना। कोचिंग सेंटर की भी जिम्मेदारी होती है स्टूडेंट्स को सही अनुपात में पास करवाकर एजुकेशन सिस्टम को ढहने से रोके रहें। सो सम्मिलित प्रयास से यह ढांचा कायम है अपनी जगह।

(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)

Ramswaroop Mantri

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