प्रत्युष दीप& कमलेश झा
2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने से पहले, ऐसा बताया जाता है कि उनके कार्यालय में एक उप सचिव ने उनसे कहा था कि वे कांग्रेस के प्रधानमंत्री के अधीन काम नहीं करना चाहते. यह नौकरशाह 2006 तक वाजपेयी के निजी सचिव के रूप में काम करता रहा, और बाद में “नए” भारत की सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी का चहेता बन गया.

अश्विनी वैष्णव के नौकरशाह और टेक्नोक्रेट से राजनेता बनने के राजनीतिक उदय की कहानी बहुत नाटकीय है. शायद भारतीय राजनीति में बहुत कम मिसालें हैं, (हाल के दिनों में सबसे मिलती-जुलती मिसाल विदेश मंत्री एस. जयशंकर हैं). 1994 में ओडिशा कैडर के एक होनहार आईएएस अधिकारी से 2021 तक, उन्होंने कॉरपोरेट इंडिया में काम करने, पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित व्हार्टन स्कूल से डिग्री लेने और एक व्यवसाय लगाने के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में अपनी जगह बनाई.
इतना ही नहीं, उनका उद्यमशीलता का सफर सभी मायनों में हिट रहा. अगर पैसा सफलता का पैमाना है तो जिस कंपनी में उन्होंने 1 लाख रुपये का निवेश किया उससे उन्हें कुछ ही सालों में 113 करोड़ रुपये से ज़्यादा के शेयर मिल गए. दरअसल, इस कंपनी का राजस्व, शुरुआती छह सालों के भीतर 45 लाख रुपये से बढ़कर 323 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया.
वैष्णव का राजनीतिक करियर औपचारिक रूप से 2019 में ओडिशा की सत्तारूढ़ बीजेडी और उसकी प्रतिद्वंद्वी भाजपा द्वारा एक आश्चर्यजनक कदम के साथ शुरू हुआ. जब दोनों पार्टियों ने उन्हें राज्यसभा में नामित करने के लिए हाथ मिलाया. ये वक्त आने तक वैष्णव का ओडिशा के साथ संबंध, केवल वहां के आईएएस कैडर के होने से कहीं ज़्यादा गहरा हो चला था. ऐसे संबंध, जिन्हें आमतौर पर भारतीय राजनीति के कसीदों में वैष्णव जैसे विरोधाभासी व्यक्तित्व के लिए अनदेखा कर दिया जाता है.
आखिर वो 2003 से 2015 के बीच काफी हद तक ओडिशा से दूर रहे, जब तक कि एक छोटी सी फर्म उन्हें वापस नहीं ले आई. इसके बाद राज्य के इस खनन दिग्गज ने एक ऐसी यात्रा शुरू की, जिसने जाहिर तौर पर उनके राजनीतिक उत्थान को बढ़ावा दिया.





