एस पी मित्तल,अजमेर
सब जानते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में यशवंत सिन्हा संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार हैं। 18 जुलाई को होने वाले चुनाव के लिए यशवंत सिन्हा इन दिनों विभिन्न राज्यों में सांसदों और विधायकों से संपर्क कर रहे हैं। इसी सिलसिले में 11 जुलाई को सिन्हा ने राजस्थान के जयपुर में आकर कांग्रेस विधायकों से संवाद किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी उपस्थित रहे। आमतौर पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सांसदों एवं विधायकों से हल्का फुल्का संवाद ही करते हैं। लेकिन इस परंपरा से हट कर यशवंत सिन्हा ने जयपुर में कहा कि राष्ट्रपति बनते ही वे दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति भवन में बुलाऊंगा और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बात सुनने को कहूंगा। राष्ट्रपति भवन से यह भी निर्देश दूंगा कि अब जांच एजेंसियों का दुरुपयोग न हो। सिन्हा जब यह बात कह रहे थे, तब सीएम गहलोत के चेहरे पर मुस्कुराहट देखी गई, लेकिन सवाल उठता है कि यशवंत सिन्हा का यह कथन शेख चिल्ली जैसा नहीं है? यह सही है कि राष्ट्रपति अपने अधिकारों का उपयोग कर प्रधानमंत्री तलब कर सकते हैं। यशवंत सिन्हा के लिए राष्ट्रपति बनना एक सपना ही है। क्योंकि देश में जो राजनीतिक गणित है, उसमें भाजपा के गठबंधन वाले एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की जीत तय है। 18 जुलाई को मतदान के बाद 21 जुलाई को मतणना वाले दिन सिन्हा के हार के अंतर की घोषणा होनी है। पिछली बार एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने विपक्ष के उम्मीदवार से 10 प्रतिशत वोट अधिक प्राप्त किए थे। इस बार यह अंतर और बढ़ जाएगा। यह सही है कि यशवंत सिन्हा ने सीएम गहलोत को खुश करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति भवन बुलाने की बात कही, लेकिन यशवंत सिन्हा को यह भी ख्याल रखना चाहिए कि उन्हें मजबूरी में उम्मीदवार बनाया गया है। ममता बनर्जी, अशोक गहलोत, स्टालिन जैसे मुख्यमंत्री तो शरद पवार और फारुख अब्दुल्ला को उम्मीदवार बनाना चाहते थे, लेकिन इन दोनों नेताओं के इंकार करने पर सिन्हा को विपक्ष का उम्मीदवार घोषित किया गया। यशवंत सिन्हा को कम से कम राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की प्रतिष्ठा का तो ख्याल रखना ही चाहिए। चुनाव में हार तय है उसके बाद भी यशवंत सिन्हा राष्ट्रपति बनने के सपने देख रहे हैं और शेख चिल्ली जैसी बातें कह रहे हैं।





