पुष्पा गुप्ता (महमूदाबाद)
भारतीय धर्मग्रंथों से निकला सार है ”जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता वास करते हैं” प्रत्यक्ष और अनुभूत सर्वत्र सत्य है। उपलब्ध इतिहास भी गवाह हैं।
महाभारत के मूल में क्या है? एक स्त्री का अपमान. उसकी इच्छा के विरुद्ध किया गया कृत्य सर्वनाश का कारण बना.
राम-रावण युद्ध के मूल में सीता-सुपरर्णखा का अपमान बना विनाश का कारण।
नारी की इच्छा के विरुद्ध किया जाने वाला कृत्य हो या बलात उसे भोगने का प्रयास : परिणाम कभी सुखद नहीं हुए।
वर्तमान समय में तर्क और कुतर्को से दुनिया को भरमाया जा सकता है लेकिन खुद को नहीं। ईश्वरत्व सर्वव्यापी है किंतु इतना सूक्ष्म की पकड़ में नहीं आ सकता : जन्मों भटकने के बाद भी। ईश्वर जिसकी विविध रूपों में, मूर्तियों में तलाश करते हैं; वह भी नारी शक्ति के सामने नतमस्तक होता है.तब जब वह सृजन करती है माँ के रूप में।
नारी किस रूप में है आपके सामने : माँ , पत्नी , मित्र , बेटी , पुत्री हर रूप में. वह सम्मानीय है. उसे पूजने का सब्जेक्ट नही बना सकते, तो मत बनाएं. कम से कम भोगने- फेकने का सब्जेक्ट तो मत बनाएं.
विवाह और बेदखल स्त्री
कहते है ना विवाह किसी रिश्ते का गवाह तो अवश्य होता है मगर उसमे उपस्थित प्रेम की गवाही नहीं देता। निसंदेह समाज में उन्हीं रिश्तों को मान्यता मिलती है जिनका कोई नाम होता है बिना नाम के रिश्ते का कोई सम्मान नहीं।
यही समाज का ढांचा है। शायद यही वजह रही की एक विवाहित स्त्री के प्रेम को समाज के साथ साथ उसके प्रेमी के भी मन में भी कभी उचित स्थान नहीं मिला। तिरस्कृत कर दिया गया उन्हे हर किसी ने। कभी कोई समझ नही पाया प्रेम विहीन रिश्ते में सिंदूर एक सजावट और मंगलसूत्र जंजीर मात्र है।
विवाह समाज द्वारा बनाया गया शरीर तक पहुंचने का एक मार्ग भर है पर वो किसी के दिल में पहुंचने का रास्ता नहीं । दुनियां की दृष्टि में विवाहित स्त्री का प्रेम,समर्पण भी सम्मान योग्य नही बल्कि एक शर्मिंदगी है किंतु एक अविवाहिता के ढोंग में भी सुरक्षा और प्रेम दिखाई देता है।
शायद किसने समझा कि विवाहित स्त्री के मन में भी वही प्रेम रंग ,भावनाएं होती है जैसे किसी अविवाहिता के मन में। किसी स्त्री को अपनाने का आधार सम्मान और प्रेम न हो कर सिंदूर और मंगलसूत्र बन जाता है।
अनिच्छा से किसी वैवाहिक संबंध में होने का ये अर्थ लगाया जाता है कि वो अब प्रेम करने अथवा पाने की अधिकारिणी नही रही।
ये बेदखल स्त्रियां है जिन्हे जीवन के हर खुशी से वंचित रहना पड़ता है।
इन स्त्रियों का प्रेम समाज की नजर में उन घांस पतवार की तरह है जो फसल के बीच में उग जाते हैं इनपर इतने आक्षेप और आलोचना किए जाते है जिससे खत्म हो जाए ये अनचाही घांस।
लोगो को कौन समझाए की कुछ बातों में तर्क नहीं होते सिर्फ अनुभूति होती है । इन स्त्रियों के लिए बहुत मुश्किल होता है अपना प्रेम साबित करना। हर जगह से नकारी गई इन स्त्रियों कोई नही देता अपने खुले दिल में स्थान।
कोई नही जो उसके मन की गांठे खोल कर उसे पढ़ सके। इन्हें संबंध निभाने के लिए कठिन जीवन जीना पड़ता है । इन्हें बस हमदर्दी में डूबे हुए शब्द मिलते हैं कोई प्रेम भरा संवाद नही।
इन्हें कभी कभी प्रेम का आश्वासन तो मिलता है लेकिन किसी का प्रेम नही।
कभी गलती से किसी ने हांथ बढ़ाया भी तो जल्दी से वापस खींच लिया बिना सोचे की संबंध भले ही अमान्य हो प्रेम तो हमेशा से पूज्यनीय है।
प्रेम में आत्माओं का एक होना नही होता बल्कि एक ही आत्मा का दो भागों में बंट कर दो अलग शरीर में वास करना हैं।
ऐसा कोई पुरुष नही जो इन सजावटी सामाजिक मान्यताओं से बाहर निकल कर उन्हे खुले दिल से अपना ले वो जैसी हैं जिस तरह हैं।
किसी से प्रेम न करने की वजह चाहे कितनी भी हों करने के लिए बस एक वजह ही काफी होती है उनके लिए कभी कोई तो सोचता कि उन्हे भी बस एक ही जिंदगी मिली है जीने के लिए। वो भी ढूंढती है किसी का अपनापन जो उसके मन को छू ले।
(लेखिका चेतना विकास मिशन की प्रबंधिका हैं.)

