अग्नि आलोक
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 *कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ*

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डा० लोहिया भारत के संभवतः अकेले  राजनेता हुये जिन्होंने राजनीति इतिहास अर्थशास्त्र समाज वास्तुकला संगीत संस्कति कूटनीति समेत लगभग सभी विषयों पर समस्या एवं समाधान सहित विस्तार से अपनी अनूठी शैली में कहा लिखा । भारतीय आख्यान नायकों से उनकी नजर कैसे चूकती ? कृष्ण पर उनके एक भाषण की अंश यहाँ  आज कृष्ण जन्म अवसर पर साझा कर रहा हूँ । पढिये और बताइये कैसा लगा ? रमाशंकर सिंह 

 ! 

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“ कृष्ण की सभी चीजें दो हैं : दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृत या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गई है। यों कृष्ण देवकीनन्दन भी हैं, लेकिन यशोदानन्दन अधिक। ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ, पेट-माँ का नाम न जानते हों, लेकिन बाद वाली दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोई निराला ही होगा। उसी तरह, वसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नन्द को असली बाप से कुछ बढ़कर ही रुतबा मिल गया है। द्वारका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है। किन्तु यदि कृष्ण की चले, तो द्वारका और द्वारकाधीश, मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहे। मथुरा से तो बाललीला और यौवन-क्रीड़ा की दृष्टि से, वृन्दावन और बरसाना वगैरह अधिक महत्वपूर्ण हैं। प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रुक्मिणी और सत्यभामा की, राधा और रुक्मिणी की, या राधा और द्रौपदी की। प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा-सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राधा ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह एक पहुँचाए, लेकिन इतना संभव नहीं लगता। हर हालत में, रुक्मिणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी।

मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख हैं। यह शारीरिक सीमा, उसे अपना एक दोस्त, एक माँ, एक बाप, एक दर्शन वगैरह देती रहती है। किन्तु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है, मन ही के द्वारा उछल सकता है।

कृष्ण उसी तत्त्व और महान् प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलाँघता-उलाँघता सबमें मिला देता है, किसी से भी अलग नहीं रखता।

क्योंकि कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्य लीला है, केवल सिद्धांतों और तत्त्वों का विवेचन नहीं, इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रहकर दो और निरापनी हो गयी हैं। यों दोनों में ही कृष्ण का तो निरापना है, किन्तु लीला के तौर पर अपनी माँ, बीवी और नगरी से परायी बढ़ गयी है। परायी को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खतम करना है। मथुरा का एकाधिपत्य खतम करती है द्वारका, लेकिन उस क्रम में द्वारका अपना श्रेष्ठत्व जैसा कायम कर लेती है।

भारतीय साहित्य में माँ हैं यशोदा और लला है कृष्ण। माँ-लला का इनसे बढ़कर मुझे तो कोई संबंध मालूम नहीं, किन्तु श्रेष्ठत्व भर ही तो कायम होता है। मथुरा हटती नहीं और न रुक्मिणी, जो मगध के जरासंध से लेकर शिशुपाल होती हुई हस्तिनापुर के द्रौपदी और पाँच पांडवों तक एक-रूपता बनाये रखती है।  परकीया स्वकीया से बढ़कर उसे खतम तो करती नहीं, केवल अपने और पराये की दीवारों को ढहा देती है। लोभ, मोह, ईर्ष्या, भय इत्यादि की चहारदीवारी से अपना या स्वकीय छुटकारा पा जाता है। सब अपना और अपना सब हो जाता है। बड़ी रसीली लीला है कृष्ण की, इस राधा-कृष्ण या द्रौपदी–सखा और रुक्मिणी–रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर में, प्रेमानन्द और खून की गर्मी और तेजी में, कमी नहीं। लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना।

कृष्ण है कौन? गिरधारी, गिरधर गोपाल! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी है, लेकिन कृष्ण का गुह्यतम रूप तो गिरधर गोपाल में ही निरखता है। कान्हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उँगली पर क्यों उठाना पड़ा? इसलिए न कि उसने इन्द्र की पूजा बंद करवा दी और इन्द्र का भोग, खुद खा गया, और भी खाता रहा। इन्द्र ने नाराज होकर पानी, ओला, पत्थर बरसाना शुरू किया, तभी तो कृष्ण को गोवर्धन उठाकर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्ण ने इन्द्र का भोग खुद क्यों खाना चाहा?

यशोदा और कृष्ण का इस संबंध में गुह्य विवाद है। माँ, इन्द्र का भोग लगाना चाहती है, क्योंकि वह बड़ा देवता है, सिर्फ वास से ही तृप्त हो जाता है, और उसकी बड़ी शक्ति है, प्रसन्न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ। बेटा कहता है कि वह इन्द्र से भी बड़ा देवता है, क्योंकि वह तो वास से तृप्त नहीं होता और बहुत खा सकता है और उसके खाने की कोई सीमा नहीं है। यही है कृष्ण-लीला का गुह्य-रहस्य। वास लेने वाले देवताओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्ण लीला है।

कृष्ण के पहले, भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। निस्संदेह अवतार कृष्ण के पहले से शुरू हो गये। किंतु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसीलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है।

द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है, जो निरंतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली। कृष्ण संपूर्ण और अबोध मनुष्य है, खूब खाया-खिलाया, खूब प्यार किया और प्यार सिखाया, जनगण की रक्षा की और उसका रास्ता बताया, निर्लिप्त भोग का महान् त्यागी और योगी बना।

इस प्रसंग में यह प्रश्न बेमतलब है कि मनुष्य के लिए, विशेषकर राजकीय मनुष्य के लिए राम का रास्ता सुकर और उचित है या कृष्ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्य बनता रहा। देव और निस्व और असीमित होने के नाते कृष्ण में जो असंभव मनुष्यताएँ हैं, जैसे झूठ, धोखा और हत्या, उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं, उसमें कृष्ण का क्या दोष। कृष्ण की संभव और पूर्ण मनुष्यताओं पर ध्यान देना ही उचित है, और एकाग्र ध्यान। कृष्ण ने इन्द्र को हराया, वास लेने वाले देवों को भगाया, खाने वाले देवों को प्रतिष्ठित किया, हाड़, खून, मांस वाले मनुष्य को देव बनाया, जन-गण में भावना जागृत की कि देव को आसमान में मत खोजो, खोजो यहीं अपने बीच, पृथ्वी पर। पृथ्वी वाला देव खाता है, प्यार करता है, मिलकर रक्षा करता है।

कृष्ण जो कुछ करता था, जमकर करता था, खाता था जमकर, प्यार करता था जमकर, रक्षा भी जमकर करता था : पूर्ण भोग, पूर्ण प्यार, पूर्ण रक्षा। कृष्ण की सभी क्रियाएँ उसकी शक्ति के पूरे इस्तेमाल से ओत-प्रोत रहती थीं, शक्ति का कोई अंश बचाकर नहीं रखता था, कंजूस बिलकुल नहीं था, ऐसा दिलफेंक, ऐसा शरीरफेंक चाहे मनुष्यों से संभव न हो, लेकिन मनुष्य ही हो सकता है, मनुष्य का आदर्श, चाहे जिसके पहुँचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रुक जाना पड़ता हो। कृष्ण ने खुद गीत गाया है स्थितप्रज्ञ का, ऐसे मनुष्य का जो अपनी शक्ति का पूरा और जमकर इस्तेमाल करता हो। “कूर्मोअंगानीव” ने बताया है ऐसे मनुष्यों को। कछुए की तरह यह मनुष्य अपने अंगों को बटोरता है, अपनी इन्द्रियों पर इतना संपूर्ण प्रभुत्व है इसको कि इन्द्रियार्थों से उन्हें पूरी तरह हटा लेता है। कुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उलटा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करना, जमकर भोग भी, त्याग भी। जमा हुआ भोगी कृष्ण, जमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोंनों में विशेष अंतर नहीं। फिर भी, कृष्ण ने एकांगी परिभाषा दी, अचल स्थितप्रज्ञ की, चलस्थित प्रज्ञ की नहीं। उसकी परिभाषा तो दी जो इन्द्रियार्थों से इन्द्रियों को हटाकर पूर्ण प्रभुता निखरता हो, उसकी नहीं, जो इन्द्रियों को इन्द्रियार्थों में लपेटकर, घोलकर। कृष्ण खुद तो दोनों था, परिभाषा में एकांगी रह गया।

जो काम जिस समय कृष्ण करता था, उसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोग करता था, अपने लिए कुछ भी नहीं बचाता था, अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। “कूर्मोअंगानीव” के साथ-साथ “समग्र-अंग-एकाग्री” भी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था। जो काम करो, जमकर करो, अपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंक कर।

देवता बनने की कोशिश में मनुष्य कुछ कृपण हो गया है, पूर्ण आत्मसमर्पण वह कुछ भूल-सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने-आप को किसी दूसरे के समर्पण करे। अपने ही कामों में पूरा आत्मसमर्पण करे। झाड़ू लगाए तो जमकर, या अपनी इन्द्रियों का पूरा प्रयोग कर युद्ध में रथ चलाये तो जमकर, श्यामा मालिन बनकर राधा को फूल बेचने जाए तो जमकर, जीवन का दर्शन ढूँढ़े और गाए तो जमकर। कृष्ण ललकारता है मनुष्य को अकृपण बनने के लिए, अपनी शक्ति को पूरी तरह और एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्य करता कुछ है, ध्यान कुछ दूसरी तरफ रहता है। झाड़ू देता है फिर भी कूड़ा कोनों में पड़ा रहता है।

एकाग्र ध्यान न हो तो सब इन्द्रियों का अकृपण प्रयोग कैसे हो। “कूर्मोअंगानीव” और  “समग्र-अंग-एकाग्री”मनुष्य को बनना है। यही तो देवता की मनुष्य बनने की कोशिश है। देखो, माँ, इन्द्र खाली वास लेता है, मैं तो खाता हूँ।

आसमान के देवताओं को जो भाग्य उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ के लिए तैयार रहना चाहिए, तभी कृष्ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उँगली पर उठाना पड़ा। इन्द्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता, तो ऐसा कृष्ण किस काम का। फिर कृष्ण के रक्षा-युग का आरंभ होने वाला था। एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर लीला है। कालिया-दहन और कंस वध उसके आसपास के हैं। गोवर्धन उठाने में कृष्ण की उँगली दूखी होगी, अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुँझलाकर सहारा देने को कहा होगा। माँ को कुछ इतराकर उँगली दूखने की शिकायत की होगी। गोपियों से आँख लड़ाते हुए अपनी मुसकान द्वारा कहा होगा। उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्ण की तो आपस में गंभीर और प्रफुल्लित मुद्रा रही होगी। कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्ण ने अधिक निहारा होगा, माँ की ओर इतराकर, या राधा की ओर प्रफुल्ल होकर। उँगली बेचारे की दुख रही थी। अब तक दुख रही है, गोवर्धन में तो यही लगता है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्ण ने गऊ वंश रूपी दानव को मारा था, राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्थल पर कृष्ण से गंगा माँगी। बेचारे कृष्ण को कौन-कौन से असंभव काम करने पड़े हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है दूसरों को सुखी बनाने के लिए। उसकी उँगली दुख रही है। चलो, उसको सहारा दें। गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने, जिनमें पंडे होते ही हैं, प्रश्न किया कि मैं कहाँ का हूँ?

मैंने छेड़ते हुए उत्तर दिया, राम की अयोध्या का।

पंडों ने जवाब दिया, सब माया एक है।

जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्तू वाले राम से गोवर्धन वासियों का नेह कैसे चल सकता है। उनका दिल तो माखन-मिसरी वाले कृष्ण से लगा है।

माखन-मिसरी वाला कृष्ण, सत्तू वाला राम कुछ सही है, पर उसकी अपनी उँगली अब तक दूख रही है।

एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुई। पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोई नतीजा न निकला, न निकलने वाला था। लेकिन क्या मीठी मुसकान से उस पंडे ने कहा कि जीवन में दो मीठी बात ही तो सब कुछ है। कृष्ण मीठी बात करना सीख गया है, आसमान वाले देवताओं को भगा गया है, माखन-मिसरी वाले देवों की प्रतिष्ठा कर गया है। लेकिन उसका अपना कौन-कौन सा अंग अब तक दूख रहा है।

कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया है, जिसने मनुष्य बनने की कोशिश की। उसका राज्य संसार में अधिक फैला। शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी जिंदगी में वैभव और ऐश न था, शायद इसलिए कि जन-रक्षा का उसका अंतिम काम ऐसा था कि उसकी उँगली सिर्फ न दूखी, उसके शरीर का रोम-रोम सिहरा और अंग-अंग टूटकर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्यान करके अपने सीमा बाँधने वाले चमड़े के बाहर उछलते हैं। हो सकता है कि ईसूमसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया है कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज की मालिक सभ्यता के पुरखे हैं। ईसू रोमियों पर चढ़ा। रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्ण-लीला का मजा ब्रज और भारत भूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्ण की नियति कठिन है। जो भी हो, कृष्ण और क्रिस्टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया। दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं-कहीं सादृश्य है। कभी दो महाजनों की तुलना नहीं करनी चाहिए। दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ है। फिर भी, क्रिस्टोस प्रेम के आत्मोत्सर्गी अंग के लिए बेजोड़ और कृष्ण संपूर्ण मनुष्य-लीला के लिए। कभी कृष्ण के वंशज भारतीय शक्तिशाली बनेंगे, तो संभव है उसकी लीला दुनिया भर में रस फैलाए।

चित्र – एम एफ हुसैन

कृष्ण
कृष्ण की सभी चीजेंदो हैं: दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रिमकाए े ँ, या यों किहए अनेक। जो चीज संसारी
अर्ꣻथ मेंबाद की या स्वीकृत या सामािजक है, वह असली सेभी श्रेष्ठ और िप्रय हो गई है। यों कृष्ण देवकीनंदन
भी हैं, लेिकन यशोदानंदन अिꣻधक। ऐसेलोग िमल सकतेहैं, जो कृष्ण की असली माँ, पेट-माँका नाम न जानते
हों, लेिकन बाद वाली दूध वाली, यशोदा का नाम न जाननेवाला कोई िनराला ही होगा। उसी तरह, वासदुेव कुछ
हारेहुए-सेहैं, और नंद को असली िपता सेकुछ बढ़ कर ही रूतबा िमल गया है। द्वारका और मथराु की होड़
करना कुछ ठीक नहीं, क्योंिक भूगोल और इितहास नेमथराु का साथ िदया है, िकंतं ुयिद कृष्ण की चले, तो
द्वारका और द्वारकाधीश, मथराु और मथरापित ु सेअिꣻधक िप्रय रहें। मथराु सेतो बाललीला और यौवन- क्रीड़ा
की दृिष्ट सेवंृदावन है। िकसकी तलना ु की जाए? रूक्मिण और सत्यभामा की, दृिष्ट से, वंृदावन और बरसाना
वगैरह अिꣻधक महत्वपूर्ण हैं। प्रिमकाओ े ं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। िकसकी तलना ु की जाए, रूक्मिण और
सत्यभामा की, राधा और रूक्मिण की, या राधा और द्रौपदी की। प्रेिमका शब्द का अर्ꣻथ सं कुिचत न कर सखा-
सखी भाव को लेकेचलना होगा। अब तो मीरा नेभी होड़ लगानी शरूु की है। जो हो, अभी तो राधा ही बड़भािगनी
हैिक तीन लोक का स्वामी उसकेचरणों का दास है। समय का फे र और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को
राधा की जगह तक पहुचाए, लेिकन इतना सं भव नहीं लगता। हर हालत में, रूक्मिण, राधा सेटक्कर कभी नहीं
लेसके गी।
मनष्ुय की शारीिरक सीमा उसका चमड़ा और नख हैं। यह शारीिरक सीमा, उसेअपना दोस्त, एक माँ,
एक बाप, एक दर्शन वगैरह देती रहती है, िकंतं ुसमय हमेशा इस सीमा केबाहर उछलनेकी कोिशश करता
रहता है, मन ही केद्वारा उछल सकता है। कृष्ण उसी तत्व और महान प्रेम का नाम हैजो मन को प्रदत्त सीमाओं
सेलाँघता-लाँघता सबसेिमला देता है, िकसी सेभी अलग नहींरखता। क्योंिक कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनष्ुय
लीला है, के वल िसद्धांतों और तत्वों का िववेचन नहीं है, इसिलए उसकी सभी चीजेंअपनी और एक की सीमा में
न रह कर दो और िनरापनी हो गयी है। यों दोनों मेंही कृष्ण का तो िनरापना है, िकन्तुलीला केतौर पर अपनी
माँ, बीवी, और नगरी सेपरायापन बढ़ गया है। परायी को अपनी सेबढ़नेदेना भी तो एक मानी मेंअपनेपन को
खत्म करना है। मथराु का एकािꣻधपत्य खत्म करती हैद्वारका, लेिकन उस क्रम मेंद्वारका अपना श्रेष्ठत्व जैसा
क़ायम कर लेती है।
भारतीय सािहत्य मेंमाँहैयशोदा और लला हैकृष्ण। माँ-लाल का इनसेबढ़ कर मझु ेतो कोई सं बंध
मालूम नहीं, िकंतं ुश्रेष्ठत्व भर ही तो क़ायम होता है। मथराु हटती नहीं और न रूक्मिण, जो मगध केजरासं ध से
लेकर िशशपालु होती हुई हिस्तनापरु के द्रौपदी और पाँच पांडवों तक एकरूपता बनायेरखती है। परकीया,
स्वकीया सेबढ़ कर उसेखत्म तो करता नहीं, के वल अपनेऔर परायेकी दीवारों को ढहा देता है। लोभ, मोह,
ईर्ष्या, भय, इत्यािद की चारदीवारी सेअपना या स्वकीय छुटकारा पा जाता है। सब अपना और, अपना सबका

हो जाता है। बड़ी रसीली लीला हैकृष्ण की, इस राधा-कृष्ण या द्रौपदी-सखा और रूक्मिण-रमण की। कहींचर्म-
सीिमत शरीर में, प्रमान े ंद और खू

न की गर्मी और तेजी में, कमी नहीं। लेिकन यह सब रहतेहुए भी कै सा िनरापना!

कृष्ण हैकौन? िगरधारी, िगरधर गोपाल ! वैसेतो मरलीधर ु और चक्रधर भी है, लेिकन कृष्ण का गह्यतम ु
रूप तो िगरधर गोपाल मेंही िनखरता है। कान्हा को गोवर्ꣻधन पर्वत अपनी कानी उँगली पर क्यों उठाना पड़ा
था? इसिलए न िक उसनेइंद्र की पूजा बंद करवा दी और इंद्र का भोग खदु खा गया और खाता भी रहा। तभी
तो कृष्ण को गोवर्ꣻधन उठा कर अपनेगो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्ण नेइंद्र का भोग खदु क्यों खाना
चाहा? यशोदा और कृष्ण का इस सं बंध मेंगह्यु िववाद है। मां इंद्र का भोग लगाना चाहती हैक्योंिक वह बड़ा
देवता है, िसर्फ बास सेही तृप्त हो जाता है, और उसकी बड़ी शिक्त है, प्रसन्न होनेपर बहुत वर देता हैऔर
नाराज होनेपर तकलीफ। बेटा कहता हैिक वह इंद्र सेभी बड़ा देवता है, क्योंिक वह तो बास सेतृप्त नहीं होता
और बहुत खा सकता हैऔर उसकेखानेकी कोई सीमा नहीं। यही हैकृष्ण-लीला का गह्यु -रहस्य। बास लेने
वालेदेवताओं सेखानेवालेदेवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्ण-लीला है।
कृष्ण केपहले, भारतीय देव आसमान केदेवता हैं। िनःसं देह अवतार कृष्ण केपहलेसेशरूु हो गए, िकंतं ु
त्रेता का राम ऐसा मनष्ुय हैजो िनरंतर देव बननेकी कोिशश करता रहा, इसीिलए उसमेंआसमान केदेवता का
अंश कुछ अिꣻधक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है, जो िनरंतर मनष्ुय बननेकी कोिशश करता रहा। उसमेंउसे
सं पूर्ण सफलता िमली। कृष्ण सं पूर्ण और अबोध मनष्ुय है, खू

ब खाया-िखलाया, खू

ब प्यार िकया और प्यार
िसखाया, जनगण की रक्षा की और उसका रास्ता बताया, िनर्िलप्त भोग का महान्त्यागी और योगी बना।
इस प्रसं ग मेंयह प्रश्न बेमतलब हैिक मनष्ुय केिलए िवशेषकर राजकीय मनष्ुय केिलए, राम का रास्ता
सकर ु और उिचत हैया कृष्ण का। मतलब की बात तो यह हैिक कृष्ण देव होता हुआ िनरंतर मनष्ुय बनता रहा।
देव और िनस्व और असीिमत होनेकेनातेकृष्ण मेंजो असं भव मनष्ुयताए हैं, जैसेझठू धोखा और हत्या, उनकी
नकल करनेवालेलोग मूर्ख हैं, उसमेंकृष्ण का क्या दोष! कृष्ण की सं भव और पूर्ण मनष्ुयताओं पर ध्यान देना
ही उिचत है, और एकाग्र ध्यान। कृष्ण नेइंद्र को हराया बास लेनेवालेदेवों को भगाया, खानेवालेदेवों को
प्रितिष्ठत िकया, हाड़, खू

न, मांस वालेमनष्ुय को देव बनाया, जन-गण मेंभावना जागृत की िक देव को आसमान
मेंमत खोजो, खोजो यहीं अपनेबीच, पृष्वी पर। पृथ्वी वाला देव खाता है, प्यार करता है, िमल कर रक्षा करता
है।
कृष्ण जो कुछ करता था, जम कर करता था, खाता था जम कर, प्यार करता था जम कर, रक्षा भी जम कर

करता था। पूर्ण भोग, पूर्ण प्यार, पूर्ण रक्षा। कृष्ण की सभी िक्रयाएं उसकी शिक्त केपूरेइस्तेमाल सेओत-
प्रोत रहती थीं। शिक्त का कोई अंश बचा कर नहीं रखता था, कं जूस िबल्कुल नहीं था। ऐसा िदलफें क, ऐसा

शरीरफें क चाहेमनष्ुयों को सं भव न हो, लेिकन मनष्ुय ही हो सकता है। मनष्ुय का आदर्श, चाहेिजसकेपहुचनँ े
तक हमेशा एक सीढ़ी पहलेरूक जाना पड़ता हो। कृष्ण नेखदु गीत गाया हैिस्थतप्रज्ञ का, ऐसेमनष्ुय का जो
अपनी शिक्त का पूरा और जम कर इस्तेमाल करता हो। “कूर्मोगानीव” नेबताया हैऐसेमनष्ुय को कछुए की
तरह यह मनष्ुय अपनेअंगों को बटोरता है, अपनी इंिद्रयों पर इतना सं पूर्ण प्रभत्वु हैइसको िक इंिद्रयार्ꣻथों से
उन्हेंपूरी तरह हटा लेता है। कुछ लोग कहेंगेिक यह तो भोग का उलटा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करना, जम
कर भोग भी, त्याग भी। जमा हुआ भोगी कृष्ण, जमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोनों मेंिवशेष अंतर नहीं।

िफर भी, कृष्ण नेएकांगी पिरभाषा दी। अचल िचतपराु की, चल-िस्थत प्रज्ञ की नहीं। उसकी पिरभाषा तो दी जो
इंिद्रयाणर्ꣻथों सेइंिद्रयों को हटा कर पूर्ण प्रभता ु िनखारता हो। पर उसकी तो दोनों पिरभाषा मेंएकांगी रह गए।
जो काम िजस समय कृष्ण खदु करतेथे, उसमेंअपनेसमग्र अंगों का एकाग्र प्रयोग करतेथे, अपनेिलए कुछ भी
नहीं बचातेथे, अपना तो था ही नहीं कुछ उनमें। “समग्र-अंग- एकाग्री” भी पिरभाषा मेंशािमल होना चािहए था।
जो काम करो, जम कर करो, अपना पूरा मन और शरीर उसमेंफें क कर। देवता बननेकी कोिशश मेंमनष्ुय कुछ
कृपण हो गया है, पूर्ण आत्मसमर्पण वह कुछ भूल-सा गया है।
जरूरी नहीं हैिक वह अपने-आप को िकसी दूसरेको समर्पण करे। अपनी इंिद्रयों का पूरा प्रयोग कर यद्धु
मेंरथ चलाये, तो जम कर, या झाडूलगायेतो जम कर, या श्याम मालीन बनकर राधा को फूल बेचनेजाए, तो
जम कर, जीवन का दर्शन ढूँढ़ेऔर गाये, तो जम कर । कृष्ण ललकारता हैमनष्ुय को अकृपण बननेकेिलए,
अपनी शिक्त को पूरी तरह और एकाग्र उछालनेकेिलए। मनष्ुय करता कुछ है, ध्यान कुछ दूसरी तरफ रहता है।
झाडूदेता हैिफर भी कूड़ा कोनों मेंपड़ा रहता है। एकाग्र ध्यान न हो, तो सब इंिद्रयों का अकृपण प्रयोग कै से
हो। ‘कूर्मोगानीव’ और ‘समग्र-अंग-एकाग्री’ मनष्ुय को बनना है। यही तो देवता की मनष्ुय बननेकी कोिशश है।
देखो, माँ, इंद्र खाली बास लेता है, मैंतो खाता हू।ँ
आसमान केदेवताओं को जो भगाए, उसेबड़ेपराक्रम और तकलीफ केिलए तैयार रहना चािहए। तभी
कृष्ण को पूरा गोवर्ꣻधन पर्वत अपनी छोटी उँगली पर उठाना पड़ा। इंद्र को वह नाराज कर देता और अपनी
गऊओं की रक्षा न करता, तो ऐसा कृष्ण िकस काम का, िफर कृष्ण केरक्षा-यगु का आरंभ होनेवाला था। एक
तरह सेबाल और यवा ु -लीला का शेष ही िगिरधर लीला है। कािलया-दहन और कं स वध उसकेआसपास केहैं।
गोवर्ꣻधन उठानेमेंकृष्ण की उँगली दुःखी होगी, अपनेगोपों और सखाओं को कुछ झंझला ु कर सहारा देनेको
कहा होगा। माँको कुछ इतरा कर उँगली दुखनेकी िशकायत की होगी। गोिपयों सेआँख लड़ातेहुए अपनी
मस्ुकान द्वारा कहा होगा। उसकेपराक्रम पर अचरज करनेकेिलए राधा और कृष्ण की तो आपस मेंगंभीर और
प्रफुिल्लत मद्रा ु रही होगी। कहना किठन हैिक िकसकी ओर कृष्ण नेअिꣻधक िनहारा होगा, माँकी ओर इतरा कर,
या राधा की ओर प्रफुल्ल हो कर। उँगली बेचारेकी दुख रही थी। अब तक दुख रही है, गोवर्ꣻधन मेंतो यही लगता
है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्ण नेगऊ वंश रूपी दानव को मारा था, राधा िबगड़ पड़ी और इस पाप से
बचनेकेिलए उसनेउसी स्थल पर कृष्ण सेगंगा मांगी। बेचारेकृष्ण को कौन-कौन सेअसं भव काम करनेपड़े
हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा हैदूसरों को सखी ु बनानेकेिलए। उसकी उँगली दुख रही है। चलो,
उसको सहारा दें। गोवर्ꣻधन मेंसड़क चलतेकुछ लोगों ने, िजनमेंपंडेहोतेही हैं, प्रश्न िकया िक मैंकहाँका हू? ँ
मैंनेछेड़तेहुए उत्तर िदया, राम की अयोध्या का।
पंडों नेजवाब िदया, सब माया एक है।
जब मेरी छेड़ चलती रही, तो एक नेकहा िक आिखर सत्तूवालेराम सेगोवर्ꣻधनवािसयों का नेह कै सेचल
सकता है? उनका िदल तो माखन-िमसरी वालेकृष्ण सेलगा है।
माखन-िमसरी वाला कृष्ण, सत्तूवाला राम कुछ सही है, पर उसकी अपनी उँगली अब तक दुख रही है।

एक बार मथराु मेंसड़क चलतेएक पंडेसेमेरी बातचीत हुई। पंडों की साधारण कसौटी सेउस बातचीत
का कोई नतीजा न िनकला, न िनकलनेवाला था। लेिकन क्या मीठी मस्ुकान सेउस पंडेनेकहा िक जीवन मेंदो
मीठी बात ही तो सब कुछ हैं। कृष्ण मीठी बात करना सीख गया है, आसमान वालेदेवताओं को भगा गया है,
माखन-िमसरी वालेदेवों की प्रितष्ठा कर गया है, लेिकन उसका अपना कौन-कौन सा अंग अब तक दुख रहा है।
कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया हैिजसनेमनष्ुय बननेकी कोिशश की। उसका राज्य संसार में
अिꣻधक फै ला। शायद इसिलए िक वह गरीब बढ़ई का बेटा था और उसकी अपनी िजंदगी ं मेंवैभव और ऐश न
था। शायद इसिलए िक जन-रक्षा का उसका अंितम काम ऐसा था िक उसकी उँगली िसर्फ न दुखी, उसकेशरीर
का रोम-रोम िसहरा और अंग-अंग टूट कर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्यान करकेअपनेसीमा बांधनेवाले
चमड़ेकेबाहर उछलतेहैं, हो सकता हैिक यीशू

मसीह दुिनया मेंके वल इसिलए फै ल गया हैिक उसका िवरोध
उन रोिमयों सेथा जो आज की मािलक सम्यता केपरखु ेहैं। यीशूरोिमयों पर चढ़ा। रोमी आज केयूरोिपयों पर
चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो। कृष्ण लाला का मजा ब्रज और भारत भूिम केकण सेइतना िलपटा हैिक
कृष्ण की िनयित किठन हैऔर जो भी हो कृष्ण और िक्रस्टोस (क्राइस्ट) दोनों नेआसमान केदेवताओं को भगाया।
दोनों केनाम और कहानी मेंभी कहीं-कहीं सदृश्य हैकभी दो महानों की तलना ु नहीं करनी चािहए। दोनों अपने
क्षेत्र मेंश्रेष्ठ हैं। िफर भी, क्राइस्ट प्रेम केआत्मोसर्गी अंग केिलए बेजोड़ और कृष्ण सं पूर्ण मनष्ुय-लीला केिलए।
कभी कृष्ण केवंशज भारतीय शिक्तशाली बनेंगे, तो सं भव हैउसकी लीला दुिनया भर मेंरस फै लाए।
कृष्ण बहुत अिꣻधक िहंदुस् ं तान केसाथ जड़ा ु हुआ है। िहंदुस् ं तान केज्यादातर देव और अवतार अपनी िमट्टी

केसाथ सनेहुए हैं। िमट्टी सेअलग करनेपर वेबहुत कुछ िनष्प्राण हो जातेहैं। त्रेता का राम िहंदुस् ं तान की उत्तर-
दिꣻक्षण एकता का देव है, द्वापर का कृष्ण देश की पूर्व-पिꣻश्चम एकता का देव है। राम उत्तर- दिꣻक्षण और कृष्ण

पूर्व-पिꣻश्चम धरीु पर घूम।े कभी-कभी तो ऐसा लगता िक देश को उत्तर-दिꣻक्षण और पूर्व-पिꣻश्चम एक करना ही
राम और कृष्ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्पित्त राजनीित सेहै। िबखरेस्वजनों को इकट्ठा करना, कलह
िमटाना, सलहु कराना और हो सके, तो अपनी और सब की सीमा को ढ़हाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊँचा
उठाना, सदाचार की दृिष्ट सेऔर आत्म-िचंतन ं की भी।
देश की एकता और समाज की शिद्धु सं बंधी कारणों ओर आवश्यकताओं सेसंसार केसभी महान्धर्मों
की उत्पित्त हुई है। अलबत्ता, धर्म इन आवश्यकताओं सेिजतना ओत-प्रोत है, उतना और कोई नहीं। कभी-कभी
ऐसा लगता हैिक राम और कृष्ण केिकस्सेतो मनगढ़न्त गाथाएँहैंिजनसेएक अिद्वतीय उद्देश्य हािसल करना
था। इतनेबड़ेदेश केउत्तर-दिꣻक्षण और पूर्व- पिꣻश्चम को एक रूप मेंबाँधना था। इतनेिवलक्षण उद्देश्य केअनरूपु
ही येिवलक्षण िकस्सेबने। मेरा मतलब यह नहीं िक सबकेसब िकस्सेझठू ेहैं। गोवर्ꣻधन पर्वत का िकस्सा िजस
रूप मेंप्रचिलत है, उस रूप मेंझठा ू तो हैही, साथ-साथ न जानेिकतनेऔर िकस्से, जो िकतनेऔर आदिमयों के
रहेहों, एक कृष्ण अथवा राम केसाथ जड़ु गए हैं। जोड़नेवालों को कमाल हािसल हुआ। यह भी हो सकता है
िक कोई न कोई चमत्कािरक परूषु राम और कृष्ण केनाम केहुए हों। चमत्कार भी उनका संसार केइितहास में
अनहोना रहा हो। लेिकन उन गाथाकारों का यह काम अनहोना चमत्कार नहीं हैिजन्होंनेराम और कृष्ण केजीवन

की घटनाओं को इस िसलिसलेऔर तफसील मेंबाँधा हैिक इितहास भी उसकेसामनेलजा गया है। आज के
िहंदुस् ं तानी राम और कृष्ण की गाथाओं की एक-एक तफसील को चाव सेऔर सप्रमाण जानतेहैं, जब िक
ऐितहािसक बद्धु और अशोक उनकेिलए धधली ँ

ु स्मृित मात्र रह गए हैं।

महाभारत िहंदुस् ं तान की पूर्व-पिꣻश्चम यात्रा है, िजस तरह रामायण उत्तर-दिꣻक्षण यात्रा है। पूर्व-पिꣻश्चम यात्रा
का नायक कृष्ण है, िजस तरह उत्तर-दिꣻक्षण यात्रा का नायक राम है। मिणपरु सेद्वारका तक कृष्ण या उसके
सहचरों का पराक्रम हुआ है, जैसेजनकपरु सेश्रीलंका तक राम या उसकेसहचरों का। राम का काम अपक्षाक े ृत
सहज था। कम सेकम उस काम मेंएकरसता अिꣻधक थी। राम का मकाबला ु या दोस्ती हुई भील, िकरात, िकन्नर,
राक्षस, इत्यािद से, जो उसकी अपनी सभ्यता सेअलग थे। राम का काम था इनको अपनेमेंशािमल करना और
उनको अपनी सभ्यता मेंढाल देना, चाहेहरायेिबना या हरानेकेबाद।

कृष्ण को वास्ता पड़ा अपनेही लोगों से। एक ही सभ्यता केदो अंगों मेंसेएक को लेकर भारत की पूर्व-
पिꣻश्चम एकता कृष्ण को स्थािपत करनी पड़ी। इस काम मेंपेंच ज्यादा थे। तरह-तरह की सं िꣻध और िवग्रह का क्रम

चला। न जानेिकतनी चालािकयाँऔर धूर्तताएँभी हु¢। राजनीित का िनचोड़ भी सामनेआया-ऐसा छन कर
जैसा िफर और न हुआ। अनको े ं ऊँचाइयां भी छुई ग¢। िदलचस्प िकस्सेभी खू

ब हुए। जैसी पूर्व-पिꣻश्चम राजनीित
जिटल थी, वैसेही मनष्ुयों केआपसी सं बंध भी, खास कर मर्द-औरत के । अर्जनु की मिणपरु वाली िचत्रांगदा,
भीम की िहडम्बा और पांचाली का तो कहना ही क्या। कृष्ण की बआु कुन्ती का एक बेटा था अर्जनु, दूसरा कर्ण,
दोनों अलग-अलग िपताओं सेऔर कृष्ण नेअर्जनु को कर्ण का छल-वध करनेकेिलए उकसाया। िफर भी,
क्यों जीवन का िनचोड़ छन कर आया क्योंिक कृष्ण जैसा िनस्व मनष्ुय न कभी हुआ और उसकेबढ़ कर तो कभी
होना ही असं भव है। राम उत्तर-दिꣻक्षण एकता का न िसर्फ नायक बना, राजा भी हुआ। कृष्ण तो अपनी मरली ु
बजाता रहा। महाभारत की नाियका द्रौपदी सेमहाभारत केनायक कृष्ण नेकभी कुछ िलया नहीं, िदया ही।
पूर्व-पिꣻश्चम एकता की दो धिरया ु ँस्पष्ट ही कृष्ण-काल मेंथीं। एक पटना-गया की मगधपरीु और दूसरी
हिस्तनापरु-इंद्रप्रस्थ की कुरू-धरी। ु मगध-धरीु का फै लाव स्वयं कृष्ण की मथराु तक था जहाँमगध नरेश का
जरासं ध का दामाद कं स राज्य करता था। बीच मेंिशशपालु , आिद मगध केआिꣻश्रत िमत्र थे। मगधधरीु के
िखलाफ कुरू धरीु का सशक्त िनर्माता कृष्ण था। िकतना बड़ा फै लाव िकया। कृष्ण नेइस धरीु का पूर्व में
मिणपरु सेलेकर पिꣻश्चम मेंद्वारका तक का इस कुरू-धरीु मेंसमावेश िकया। देश की दोनों सीमाओं, पूर्व की
पहाड़ी सीमा और पिꣻश्चम की समद्री ु सीमा को फाँसा और बाँधा। इस धरीु को कायम और शिक्तशाली करनेके
िलए कृष्ण को िकतनी मेहनत और िकतनेपराक्रम करनेपड़ेऔर िकतनी लंबी सूझ सोचनी पड़ी। उसनेपहला
वार अपनेही घर मथराु मेंमगधराज केदामाद पर िकया। उस समय सारेिहंदुस् ं तान मेंयह वार गँूजा होगा। कृष्ण
की यह पहली ललकार थी, वाणी द्वारा नहीं। उसनेकर्म द्वारा रण-भेरी बजायी। कौन अनसनी ु कर सकता था।
सबको िनमं त्रण हो गया यह सोचनेके िलए िक मगध राजा को अथवा िजसेकृष्ण कहे, उसेसम्राट केरूप में
चनो। ु अंितम चनाव ु भी कृष्ण नेबड़ेछली रूप मेंरखा। कुरू-वंश मेंही न्याय-अन्याय केआधार पर दो टुकड़ेहुए
और उनमेंअन्यायी टुकड़ी केसाथ मगध-धरीु को जड़वा ु िदया। संसार नेसोचा होगा िक वह तो कुरूवंश का

अंदरूनी और आपसी झगड़ा है। कृष्ण जानता था िक वह तो इंद्रप्रस्थ-हिस्तनापरु की कुरू-धरीु और राजिगरी की
मगध-धरीु का झगड़ा है।
राजिगरी राज्य कं स-वध पर ितलिमला उठा होगा। कृष्ण नेपहलेही वार मेंमगध की पिꣻश्चमी ताकत को
खत्म-सा कर िदया लेिकन अभी तो ताकत बहुत ज्यादा बटोरनी और बढ़ानी थी। यह तो िसर्फ आरंभ था। आरंभ
अच्छा हुआ। सारेसंसार को मालूम हो गया। लेिकन कृष्ण कोई बद्धु थोड़ेही था जो आरंभ की लड़ाई को अंत
की बना देता। उसकेपास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कं स केससरु और उसकी पूरेिहंदुस् ं तान की शिक्त
सेजूझ बैठता। वार करके, संसार को डंका सना ु केकृष्ण भाग गया। भागा भी बड़ी दूर, द्वारका में। तभी सेउसका
नाम रणछोड़दास पड़ा। गजरात ु मेंआज भी हजारों लोग, शायद एक लाख सेभी अिꣻधक लोग होंग, ेिजनका नाम
रणछोड़दास है। पहलेमैंइस नाम पर हसा ँ करता था, मस्ुकाना तो कभी न छोडंूगा। यों, िहंदुस् ं तान मेंऔर भी
देवता हैंिजन्होंनेअपना पराक्रम भाग कर िदखाया जैसेज्ञानवापी केिशव ने। यह पराना ु देश है। लड़ते-लड़ते
थकी हिड्डयों को भागनेका अवसर िमलना चािहए था। लेिकन कृष्ण थकी िपंडिलयो ं ं केकारण नहीं भागा। वह
भागा। जवानी की बढ़ती हिड्डयों केकारण। अभी हिड्डयों को बढ़ानेऔर फै लानेका मौका चािहए था। वार करो
और भागो। अफसोस यही हैिक कुछ भक्त लोग भागनेही मेंमजा लेतेहैं।
द्वारका मथराु सेसीधेफासलेपर करीब 700 मील हैवर्तमान सड़कों की यिद दूरी नापी जाए तो करीब
1050 मील होती है। बीचली दूरी इस तरह करीब 750 मील होती है। कृष्ण अपनेशत्रुसेबड़ी दूर तो िनकल ही
गया, साथ ही साथ देश की पूर्व-पिꣻश्चम एकता हािसल करनेके िलए उसनेपिꣻश्चम केआखरी नाकेको बाँध
िलया। बाद में, पाँचों पांडवों केवनवास यगु मेंअर्जनु की िचत्रांगदा और भीम की िहडम्बा केजिरयेउसनेपूर्व
केआिखरी नाकेको भी बाँधा। इन फासलों को नापनेकेिलए मथराु सेअयोध्या, अयोध्या सेराजमहल और
राजमहल सेइम्फाल की दूरी जानना जरूरी है। यही रहेहोंगेउस समय केमहान राजमार्ग। मथराु सेअयोध्या
की बीचली दूरी करीब 300 मील है। अयोध्या सेराजमहल करीब 470 मील है। राजमहल सेइम्फाल की बीचली
दूरी करीब सवा पाँच सौ मील है, यों वर्तमान सड़कों सेफासला करीब 850 मील और सीधा फासला करीब
380 मील है। इस तरह मथराु सेइम्फाल का फासला उस समय केराजमार्ग द्वारा करीब 1600 मील रहा होगा।
कुरू-धरीु केकें द्र पर कब्जा करनेऔर उसेसशक्त बनानेकेपहलेकृष्ण कें द्र से800 मील दूर भागा और अपने
सहचरों और चलो े ं को उसने1600 मील दूर तक घमाया। ु पूर्व-पिꣻश्चम की पूरी भारत यात्रा हो गई। उस समय
की भारतीय राजनीित को समझनेकेिलए कुछ दूिरयाँऔर जानना जरूरी है। मथराु सेबनारस का फासला करीब
370 मील और मथराु सेपटना करीब 500 मील है। िदल्ली से, जो तब इंद्रप्रस्थ थी, मथराु का फासला करीब
70 मील है। पटनेसेकलकत्तेका फासला करीब सवा तीन सौ मील है। कलकत्तेकेफासलेका कोई िवशेष
तात्पर्य नहीं, िसर्फ इतना ही िक कलकत्ता भी कुछ समय तक िहंदुस् ं तान की राजधानी रही है, चाहेगलाम ु
िहंदुस् ं तान की। मगध-धरीु का पनर ु ्जन्म एक अर्ꣻथ मेंकलकत्तेमेंहुआ। िजस तरह कृष्ण-कालीन मगध-धरीु के
िलए राजिगिर कें द्र है, उसी तरह ऐितहािसक मगध-धरीु केिलए पटना या पाटिलपत्रु कें द्र है, और इन दोनों का
फासला करीब 40 मील है। पटना-राजिगिर कें द्र का पनर ु ्जन्म कलकत्तेमेंहोता है। इसका इितहास केिवद्यार्ꣻथी
अध्ययन करें, चाहेअध्ययन करतेसमय सं तापपूर्ण िववेचन करेंिक यह काम िवदेशी तत्वाधान मेंक्यों हुआ?

कृष्ण नेमगध-धरीु का नाश करकेकुरू-धरीु की क्यों प्रितष्ठा करनी चाहे? इसका एक उत्तर तो साफ है,
भारतीय जागरण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पिꣻश्चम मेंथा जो राजिगिर और पटना सेबहुत दूर पड़ जाता
था। उसकेअलावा मगध-धरीु कुछ परानी ु बन चकी ु थी, शिक्तशाली थी, िकंतं ुउसका फै लाव सं कुिचत था। कुरू-
धरीु नयी थी और कृष्ण इसकी शिक्त और इसकेफै लाव दोनों का ही सर्वशिक्तसं पन्न िनर्माता था। मगध-धरीु
को िजस तरह चाहता शायद न मोड़ सकता, कुरू-धरीु को अपनी इच्छा केअनसार ु मोड़ और फै ला सकता था।
सारेदेश को बाँधना जो था उसे। कृष्ण ित्रकालदर्शी था। उसनेदेख िलया होगा िक उत्तर-पिꣻश्चम मेंआगेचलकर
यूनािनयों, हूणों, पठानों, मगलो ु ं, आिद केआक्रमण होंगेइसिलए भारतीय एकता की धरीु का कें द्र कहींवहींरचना
चािहए, जो इन आक्रमणों का सशक्त मकाबला ु कर सके । ित्रकालदर्शी क्यों न देख पाया िक इन िवदेशी
आक्रमणों केपहलेही देशी मगध-धरीु बदला चकाएगी ु और सकड़ो ै ं वर्ष तक भारत पर अपना प्रभत्वु कायम
करेगी और आक्रमण केसमय तक कृष्ण की भूिम केनजदीक यािन कन्नौज और उज्जैन तक िखसक चकी ु होगी,
िकंतं ुअसक्त अवस्था में। ित्रकालदर्शी नेदेखा शायद यह सब कुछ हो, लेिकन कुछ न कर सका हो। वह हमेशा
केिलए अपनेदेशवािसयों को कै सेज्ञानी और साधुदोनों बनाता। वह तो के वल रास्ता िदखा सकता था। रास्ते
मेंभी शायद त्रिटु थी। ित्रकालदर्शी को यह भी देखना चािहए था िक उसकेरास्तेपर ज्ञानी ही नहीं, अनाड़ी भी
चलेंगेऔर वेिकतना भारी नकसान ु उठाएंग।े राम केरास्तेचल कर अनाड़ी का भी अिꣻधक नहीं िबगड़ता, चाहे
बनना भी कम होता हो, अनाड़ी नेकुरू-पांचाल सं िꣻध का क्या िकया?
कुरू-धरीु की आधार-िशला थी कुरू-पांचाल सं िꣻध। आसपास केइन दोनों इलाकों का वज्र समान एका
कायम करना था, सो कृष्ण नेउन लीलाओं केद्वारा िकया, िजनमेंपांचाली का िववाह पाँचों पाण्डवों सेहो गया।
यह पांचाली भी अद्भतु नारी थी। द्रौपदी सेबढ़कर, भारत की कोई प्रखर-मखी ु और ज्ञानी नारी नहीं। कै सेकुरू
सभा को उत्तर देनेकेिलए ललकारती हैिक जो आदमी अपनेको हार चका ु है, क्या दूसरेको दाँव पर रखनेकी
उसमेंस्वतंत्र सत्ता है?
पाँचों पांडव और अर्जनु भी उसकेसामनेफीकेथे। यह कृष्णा तो कृष्ण केही लायक थी। महाभारत का
नायक कृष्ण, नाियका कृष्णा। कृष्णा और कृष्ण का सं बंध भी िवश्व-सािहत्य मेंबेिमसाल है। दोनों सखा सखी ही
क्यों रहे। कभी कुछ और दोनों मेंसेिकसी नेहोना चाहा? क्या सखा सखी का सं बंध पूर्ण रूप सेमन की देन
थी या उसमेंकुरू-धरीु केिनर्माण और फै लाव का अंश था? जो हो, कृष्ण और कृष्णा का यह सं बंध राधा और
कृष्ण केसं बंध सेकम नहीं, लेिकन सािहत्यकों और भक्तों की नजर इस ओर कम पड़ी है। हो सकता हैिक
भारत की पूर्व-पिꣻश्चम एकता केइस िनर्माता को अपनी ही सीख केअनसार ु के वल कर्म, न िक कर्मफल का
अिꣻधकारी होना पड़ा, शायद इसिलए िक यिद वह स्वंय कर्मफल हते ुबन जाता, तो इतना अनहोना िनर्माता हो
ही नहीं सकता था। उसनेकभी लालच न िकया िक अपनी मथराु को ही धरीु -कें द्र बनाए, उसकेिलए दूसरों का
इंद्रप्रस्थ और हिस्तनापरु ही अच्छा रहा। उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप मेंरखा, िजसेसंसार अपनी कहता
है, वैसी न बनाया। कौन जानेकृष्ण केिलए यह सहज था या इसमेंभी उसका िदल दुखा था।

कृष्णा अपनेनाम केअनरूपु साँवली थी, महान्सं दरी ु रही होगी। उसकी बिद्धु का तेज, उसकी चिकत
िहरणी आँखों मेंचमकता रहा होगा। गोरी की अपेक्षा सं दर ु सांवली, नखिशख और अंग मेंअिꣻधक सडौलु होती
हैं। राधा गोरी रही होगी। बालक और यवकु कृष्ण राधा मेंएकरस रहा। प्रौढ़ कृष्ण केमन पर कृष्णा छायी रही
होगी। राधा और कृष्ण तो एक थेही। कृष्ण की सं तानेंकब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी-बेखबर जवानी में
गोरी सेउलझना और अधेड़ अवस्था मेंश्यामा को िनहारना। कृष्ण-कृष्णा सं बंध मेंऔर कुछ हो न हो, भारतीय
मर्दों को श्यामा की तलना ु मेंगोरी केप्रित अपनेपक्षपात पर मनन करना चािहए।
रामायण की नाियका गोरी है। महाभारत की नाियका कृष्णा है। गोरी की अपेक्षा सांवली अिꣻधक सजीव
है। जो भी हो, इसी कृष्ण-कृष्णा सं बंध का अनाड़ी हाथों िफर पनर ु ्जन्म हुआ। न रहा उसमेंकर्मफल और
कर्मफल हते ुत्याग। कृष्णा पांचाल यानी कन्नौज केइलाकेकी थी, सं यक्ुता भी। धरीु -कें द्र इंद्रप्रस्थ का अनाड़ी
राजा पृथ्वीराज अपनेपरखु ेकृष्ण केरास्तेन चल सका। िजस पांचाली द्रौपदी केजिरयेकुरू-धरीु की आधारिशला
रखी गई, उसी पांचाली सं यक्ुता केजिरयेिदल्ली-कन्नौज की होड़ जो िवदेिशयों केसफल आक्रमणों का कारण
बना। कभी-कभी लगता हैिक व्यिक्त का तो नहीं, लेिकन इितहास का पनर ु ्जन्म होता है, कभी फीका कभी
रंगीला। कहाँद्रौपदी और कहाँसं यक्ुता, कहाँकृष्ण और कहाँपृथ्वीराज ? यह सही हैफीका और मारात्मक
पनर ु ्जन्म, लेिकन पनर ु ्जन्म तो हैही।
कृष्ण की कुरू-धरीु केऔर भी रहस्य रहेहोंग।े साफ हैिक राम आदर्शवादी एकरूप एकत्व का िनर्माता
और प्रतीक थे। उसी तरह जरासं ध भौितकवादी एकत्व का िनर्माता था। आजकल कुछ लोग कृष्ण और जरासं ध
यद्धु को आदर्शवाद-भौितकवाद का यद्धु माननेलगेहैं। वह सही जंचता है, िकंतं ुअधूरा िववेचन। जरासं ध
भौितकवादी एकरूप एकत्व का इच्छुक था। बाद के मगधीय मौर्य और गप्ुत राज्यों मेंकुछ हद तक इसी
भौितकवादी एकरूप एकतत्व का इच्छुक था। बाद केमगधीय मौर्य और गप्ुत राज्यों मेंकुछ हद तक इसी
भौितकवादी एकरूप एकत्व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी केअनरूपु बौद्ध धर्म का। कृष्ण आदर्शवादी बहुरूप
एकत्व का िनर्माता था। जहाँतक मझु ेमालूम है, अभी तक भारत का िनर्माण भौितकवादी बहुरूप एकतत्व के
आधार पर कभी नहीं हुआ। िचर चमत्कार तो तब होगा, जब आदर्शवाद और भौितकवाद केिमले-जलु ेबहुरूप
एकत्व केआधार पर भारत का िनर्माण होगा। अभी तक तो कृष्ण का प्रयास ही सर्वािꣻधक मानवीय मालूम
होता है, चाहेअनकरणीय ु राम का एकरूप एकतत्व ही हो। कृष्ण की बहुरूपता मेंवह ित्रकाल-जीवन हैजो औरों
मेंनहीं।
कृष्ण यादव-िशरोमिण था, के वल क्षित्रय राजा ही नहीं, शायद क्षत्रीय उतना नहीं था, िजतना अहीर। तभी
तो अिहिरन राधा की जगह अिडग हैं, क्षत्राणी द्रौपदी उसेहटा न पाई। िवराट्िवश्व और ित्रकाल केउपयक्ुत कृष्ण
बहुरूप था। राम और जरासं ध एकरूप थे; चाहेआदर्शवादी एकरूपता मेंकें द्रीयकरण और क्रूरता कम हो, लेिकन
कुछ न कुछ कें द्रीयकरण तो दोनों मेंहोता है। मौर्य और गप्ुत राज्यों मेंिकतना कें द्रीयकरण था, शायद क्रूरता
भी।

बेचारेकृष्ण नेइतनी िनःस्वार्ꣻथ मेहनत की, लेिकन जन-मन मेंराम ही आगेरहा है। िसर्फ बंगाल मेंही
मरु्दै“बोल हिर, हिर बोल” केउच्चारण सेअपनी आखरी यात्रा पर िनकालेजातेहैं, नहीं तो कुछ दिꣻक्षण को छोड़
कर सारेभारत मेंिहन्दू मरु्दे”राम नाम सत्य है” केसाथ ही लेजाए जातेहैं। बंगाल केइतना तो नहीं, िफर भी
उड़ीसा और असम मेंकृष्ण का स्थान अच्छा है। कहना मिश्ु कल हैिक राम और कृष्ण मेंकौन उन्नीस, कौन बीस
है। सबसेआश्चर्य की बात हैिक स्वंय ब्रज केचारों ओर की भूिम केलोग भी वहाँएक-दूसरेको “जैरामजी” से
नमस्तेकरतेहैं। सड़क चलतेअनजान लोगों को भी यह ‘जैरामजी’ बड़ा मीठा लगता है, शायद एक कारण यह
भी हो।
राम त्रेता केमीठे, शान्त और ससुं स्कृत यगु का देव है। कृष्ण पके, जिटल, तीखेऔर प्रखर बिद्धु यगु का
देव है। राम गम्य हैं। कृष्ण अगम्य है। कृष्ण नेइतनी अिꣻधक मेहनत की िक उसकेवंशज उसेअपना अंितम
आदर्श बनानेसेघबड़ातेहैं, यिद बनातेभी हैंतो उसकेिमत्रभेद और कूटनीित की नकल करतेहैं, उसका अथवा
िनस्व उनकेिलए असाध्य रहता है। इसीिलए कृष्ण िहंदुस् ं तान मेंकर्म का देव न बन सका। कृष्ण नेकर्म राम
सेज्यादा िकयेहैं। िकतनेसं िꣻध और िवग्रह और प्रदेशों केआपसी सं बंधों केधागेउसेपलटनेपड़तेथे। यह बड़ी
मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसकेयह मतलब नहीं िक प्रदेशों केआपसी सं बंधों मेंकृष्ण-नीित अब भी चलाई
जाए। कृष्ण, जो पूर्व-पिꣻश्चम की एकता देगया, उसी केसाथ-साथ उस नीित का औिचत्य भी खत्म हो गया।
बच गया कृष्ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक िहंदुस् ं तानी इन दोनों का
समन्वय नहीं कर पाए हैं। करें, तो राम केकर्म मेंभी पिरवर्तन आये। राम रोऊ है। इतना िक मर्यादा भंग होती
है। कृष्ण कभी रोता नहीं। आँखेंजरूर डबडबाती हैंउसकी, कुछ मौकों पर, जैसेजब िकसी सखी या नारी को दुष्ट
लोग नंगा करनेकी कोिशश करतेहैं।
कै सेमन और वाणी थेउस कृष्ण के । अब भी तब की गोिपयाँऔर जो चाहें, वेउसकी वाणी और मरली ु
की तान सनु कर रस-िवभोर हो सकतेहैंऔर अपनेचमड़ेकेबाहर उछल सकतेहैं। साथ ही कर्म-सं ग केत्याग,
सःखु -दुःख, शीत-उष्ण, जय-अजय केसमत्व केयोग और सब भूतों मेंएक अव्यय भाव का सरीला ु दर्शन,
उसकी वाणी सेसनु सकतेहैं। संसार मेंएक कृष्ण ही हुआ िजसनेदर्शन को गीत बनाया।
वाणी की देवी द्रौपदी सेकृष्ण का सं बंध कै सा था। क्या सखा-सखी का सं बंध स्वयं एक अंितम सीढ़ी
और असीम मैदान है, िजसकेबाद और िकसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं? कृष्ण छिलया जरूर था, लेिकन
कृष्णा सेउसनेकभी छल न िकया। शायद वचन-बद्ध था, इसिलए जब कभी कृष्णा नेउसेयाद िकया, वह आया।
स्त्री-परूषु की िकसलय-िमत्रता को, आजकल केवैज्ञािनक, अवरूद्ध रिसकता केनाम सेपकारत ु ेहैं। यह अवरोध
सामािजक या मन केआंतिरक कारणों सेहो सकता है। पाँचों पांडव कृष्ण केभाई थेऔर द्रौपदी कुरू-पांचाल
सं िꣻध की आधारिशला थी। अवरोध के सभी कारण मौजूद थे। िफर भी, हो सकता हैिक कृष्ण को अपनी
िचत्तप्रवृित्तयों का कभी िवरोध न करना पड़ा हो। यह उसकेिलए सहज और अंितम सं बंध था, ठीक उतना ही
सहज और अंितम और रसमय, जैसा राधा सेप्रेम का सं बंध था अगर यह सही है, तो कृष्ण-कृष्णा केसखा-सखी
सं बंध का ब्यौरा दुिनया मेंिवश्वास होना चािहए और तफ़सील से, िजससेस्त्री-परूषु सं बंध का एक नया कमरा

खलु सके । अगर राधा की छटा कृष्ण पर हमेशा छायी रहती है, तो कृष्ण की छटा भी उस पर छायी रहती है।
अगर राधा की छटा िनराली है, तो कृष्ण की घटा भी। छटा मेंतिष्टप्रदान ु रस हैं, घटा मेंउत्कं ठा-प्रधान कर्तव्य।
राधा-रस तो िनराला हैही। राधा-कृष्ण एक हैं, राधा-कृष्ण का स्त्री रूप और कृष्ण राधा का परूषु रूप।
भारतीय सािहत्य मेंराधा का िजक्र बहुत पराना ु नहीं हैक्योंिक सबसेपहली बार पराणु मेंआता है“अनराधा ु ” के
नाम से। नाम ही बताता हैप्रेम और भिक्त का वह स्वरूप, जो आत्मिवभोर है, िजससेसीमा बाँधनेवाली चमड़ी
रह नहीं जाती। आधिनकु समय मेंमीरा नेभी उस आत्मिवभोरता को पानेकी कोिशश की। बहुत दूर तक गयी
मीरा, शायद उतनी दूर गयी िजतना िकसी सजीव देह को िकसी याद केिलए जाना सं भव हो। िफर भी, मीरा की
आत्मिवभोरता मेंकुछ गर्मी थी। कृष्ण को तो कौन जला सकता है, सलगा ु भी नहींसकता, लेिकन मीरा केपास
बैठनेमेंउसेजरूर कुछ पसीना आए, कम-से-कम गर्मी तो लगे। राधा न गरम है, न ठंडी, राधा पूर्ण है। मीरा
की कहानी एक और अर्ꣻथ मेंबेजोड़ है। पिद्मनी मीरा की परिखन ु थी। दोनों िचत्तौड़ की नाियकाएँहैं। करीब ढाई
सौ वर्ष का अंतर है। कौन बड़ी है, वह पिद्मनी जो जौहर करती हैया मीरा िजसेकृष्ण केिलए नाचनेसेकोई
मना न कर सका। परानु ेदेश की यही प्रितभा है। बड़ा जमाना देखा हैइस िहन्दुस्तान ने। क्या पिद्मनी थकती-
थकती सकड़ो ै ं बरस मेंमीरा बन जाती है? या मीरा ही पिद्मनी का श्रेष्ठ स्वरूप है? अथवा जब प्रताप आता है,
तब मीरा िफर पिद्मनी बनती है। हेित्रकालदर्शी कृष्ण ! क्या तमु एक ही मेंमीरा और पिद्मनी नहीं बना सकते?
राधा-रस का पूरा मजा तो ब्रज-रज मेंिमलता है। मैंसरयूऔर अयोध्या का बेटा हू।ँ ब्रज-रज मेंशायद
कभी न लौट सकूँगा। लेिकन मन सेतो लौट चका ु हू।ँ श्री राधा की नगरी बरसानेकेपास एक रात रह कर मैंने
राधारानी केगीत सनुेहैं।
कृष्ण बड़ा छिलया था। कभी श्यामा मािलन बन कर राधा को फूल बेचनेआता था। कभी वैद्य बन कर
आता था, प्रमाण देनेिक राधा अभी ससरालु जानेलायक नहीं है। कभी राधा प्यारी को गोदानेका न्योता देनेके
िलए गोदनहािरन बन कर आता था, और जब राधा उससेएक बार िछटक कर अलग होती थी, शायद झंझला ु
कर, शायद इतरा कर, तब श्रीकृष्ण मरारी ु को ही छड्ट्

ठी का दूध याद आता था, बैठ कर समझाओ राधारानी को

िक वंृदा सेआखेंनहीं लड़ाई।
मैंसमझता हूँिक नारी अगर कहीं नर केबराबर हुई है, तो िसर्फ ब्रज मेंऔर कान्हा केपास । शायद
इसीिलए आज भी िहंदुस् ं तान की औरतेंवंृदावन मेंजमना ु केिकनारेएक पेड़ मेंरूमाल िजतनी चनड़ी ु बाँधनेका
अिभनय करती हैं। कौन औरत नहीं चाहेगी कन्हैया सेअपनी चनड़ी ु हरवाना, क्योंिक कौन औरत नहीं जानती
िक दुष्टजनों द्वारा चीरहरण केसमय कृष्ण ही उनकी चनड़ी ु अनंत करेगा। शायद जो औरतेंपेड़ मेंचीर बाँधती हैं,
उन्हेंयह सब बतानेपर वह लजाएंगी, लेिकन उनकेपत्रु-पण्यु , आिद की कामना केपीछेभी कौन- सी सषुप्ुत
याद है।
ब्रज की मरली ु लोगों को इतना िवहृल कै सेबना देती हैिक वेकुरूक्षत्रे केकृष्ण को भूल जाएं और िफर
मझु ेतो लगता हैिक अयोध्या का राम मिणपरु, मथराु सेद्वारका केकृष्ण को कभी भलान ु ेन देगा। जहाँमैंनेचीर
बाँधनेका अिभनय देख, उसी केनीचेवंृदावन केगंदेपानी का नाला बहतेदेखा, जो जमना ु सेिमलता है। और

राधा रानी केबरसानेकी रंगीली गली मेंपैर बचा- बचा कर रखना पड़ता हैिक कहीं िकसी गंदगी मेंन सन जाए।
यह वही रंगीली गली है, जहाँसेबरसानेकी औरतेंहर होली पर लाठी लेकर िनकलती हैंऔर िजनकेनक्कड़ ु
पर नंद गाँव मेंमर्द मोटेसाफेबाँध और बड़ी ढ़ालों सेअपनी रक्षा करतेहैं। राधा रानी अगर कहीं आ जाए, तो
वह इन नालोंऔर गंदिगयों को तो खत्म करेही, बरसानेकी औरतों केहाथ मेंइन गलाल ु और हल्के, भीनी महक
वाले, रंग की िपचकारी थमायेऔर नंद गाँव केमर्दों को होली खेलनेकेिलए न्यौता दे। ब्रज मेंमहक नहीं है,
कंुज नहीं है, के वल करील रह गए हैं, शीतलता खत्म है। बरसानेमेंमैंनेराधारानी की अिहिरनों को बहुत ढूँढा।
पाँच-दस घर होंग।े वहाँबिनयाइनों और ब्राह्यिणयों का जमाव हो गया है। जब िकसी जीत मेंकोई बड़ा आदमी
या बड़ी औरत हुई, तीर्ꣻथ-स्थान बना और मं िदर और दुकानेंदेखते-देखतेआ¢, तब इन िद्वज नािरयों केचेहरेभी
म्लान थे, गरीब, कृश और रोगी। कुछ लोग मझु ेमूर्खतावश िद्वज-शत्रुसमझनेलगेहैं। मैंतो िद्वज-िमत्र हू, ँ
इसिलए देख रहा हूँिक राधारानी की गोिपयों, मल्लािहनों और चमाइनों को हटा कर िद्वज नािरयों नेभी अपनी
क्रांित खो दी है। िमलाओं ब्रज की रज मेंपष्ुपों की महक, दो िहंदुस् ं तान को कृष्ण की बहुरूपी एकता, हटाओ राम
का एक रूपी िद्वज-शू

द्र धर्म, लेिकन चलो राम केमर्यादा वालेरास्तेपर सच और िनयम पालन कर।
सरयूऔर गंगा क+,य क- न/दयाँह3। क+,य कभी-कभी कठोर हो कर अ:यायी हो जाता हैऔर नकु सान कर बैठता
है। जमनु ा और चBबल, के न तथा दसू रF जमनु ा-मखु ी न/दयाँरस न/दयाँह3। रस मHIमलन है, कलह Iमटाता है।
लेKकन लाLय (आलLय) भी हैजो Nगरावट मHमनP

ुय को QनकBमा बना देता है। इसी रसभरF इतराती जमनु ा के
KकनारेकृPण नेअपनी लFला क-, लेKकन कुV-धरुF का कHX उसनेगंगा के KकनारेहF बसाया। बाद मH, /हदं Lुतान के
कुछ रा[य जमनु ा के Kकनारेबनेऔर एक अब भी चल रहा है। जमनु ा ]या तमु कभी बदलोगी। आ^खर गंगा मHहF तो
Nगरती हो। ]या कभी इस भI

ूम पर रसमय कत+,य का उदय होगा। कृPण ! कौन जानेतमु थेया नहFं। कै सेतमु ने
राधा-लFला को कुV लFला सेQनभाया। लोग कहतेह3Kक यवु ा कृPण का `ौढ़ कृPण सेकोई संबंध नहFं। बतातेह3Kक
महाभारत मHराधा का नाम तक नहFं। बात इतनी सच नहFं]यcKक Iशशपु ाल नेeोध मHकृPण क- परुानी बातH
साधारण तौर पर fबना नामकरण के बतायी ह3। सgय लोग ऐसेिजe असमय नहFंKकया करते, जो समझतेह3वे,
और जो नहFंसमझतेवेभी। महाभारत मHराधा का िजe हो कै सेसकता है। राधा का वण+न तो वहFंहोगा जहाँतीन
लोक का Lवामी उसका दास है। रास का कृPण और गीता का कृPण एक ह3। न जानेहजारc वषl सेअभी तक पलड़ा
इधर या उधर ]यc भारF हो जाता है? बताओ, कृPण?

Ramswaroop Mantri

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