अग्नि आलोक
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 ज्योतिष मैं ।भ्रम । को राहु कहा जाता है

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श्रीमती पूजा अग्निहोत्री दुबे

 राहु अर्थात भ्रम और भ्रम ही समस्त प्रकार के पापों(काम क्रोध मद लोभ प्रमाद, अहंकार आलस्य आदि)की जड़ है यहां एक बात स्पष्ट करनी होगी जब तक जड़ नहीं मिटाएंगे तब तक डाली टहनियां फूल पत्ती उत्पन्न होती ही रहेंगी यह मेरा नहीं प्रकृति का नियम है परंतु जब जड़ का अता पता ही नहीं है तो भ्रम कैसे जाएगा केवल और केवल राहु को शांत करने से पर राहु शांत कैसे होगा???? विद्वान लोग कहते हैं आलस्य मनुष्य का शत्रु है सत्य है आईऐ आज इसी पर प्रकाश डालते हैं

एक उदाहरण के रूप में इसे स्पष्ट करने की कोशिश करती हूं मान लीजिए आप इतना थक गए हैं की आपसे उठते भी नहीं बनता है जब आप से उठते ही नहीं बन रहा है तो खड़े तो हो ही नहीं पाएंगे परंतु उसी समय आपको पता लगे कि जिस जगह पर आप विश्राम ले रहे हैं कुछ समय में ही वहां पर सिंह आ सकता है यकीन मानिए मेरा विश्वास कीजिए आप तत्क्षण वहां से ऐसा दौड़कर भागेंगे की बड़े-बड़े धावक भी आपके कंपटीशन में आ जाएंगे । 😀 । परंतु यह क्या अभी तो आप बैठ भी नहीं सकते थे किंतु ऐसा क्या हो गया कि आप नेशनल लेवल के धावक बन गए विचार कीजिए यह क्या था क्या सचमुच आपको इतनी थकान हो गई थी??????????

भ्रम से बड़ा मनुष्य का कोई शत्रु नहीं यह बात कोई नहीं बतायेगा सभी यही बोलेंगे कोई आलस्य को शत्रु बोलेगा तो कोई क्रोध को बोलेगा परंतु जड़ कोई नहीं बतायेगा चाहे वह कितना भी बड़ा विद्वान क्यों ना हो मैं बलपूर्वक यह बात कहती हूं कि संसार में जितने भी अपराध होते हैं सिर्फ भ्रम के कारण होते हैं जो कि स्वयं राहु का प्रतीक है ध्यान रहे मैं कोई साधारण ज्योतिषी नहीं मेरे द्वारा लिखा गया यह वाक्य उन लोगों के लिए हैं जो मुझे नहीं जानते या नहीं पहचानते । 😀 या बहुत समय से संपर्क में नहीं है।

Ramswaroop Mantri

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