ममता बनर्जी ने इस बार टीएमसी में ही स्ट्राइक कर दी और 74 विधायकों के टिकट काट दिए. इसमें कई बड़े-बड़े चेहरे गुम हो गए. ममता ने सितारों से भी इस बार दूरी बनाई है और सबसे खास बात दागियों को दीदी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है, ताकि बीजेपी को घेरने का मौका न मिले.
बंगाल चुनाव के लिए टीएमसी ने कैंडिडेट की पहली लिस्ट मंगलवार को जारी कर दिया. लिस्ट देखकर कोई भी कहेगा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सियासत की ‘चेस मास्टर’ हैं, जो अपने किले को बचाने के लिए बड़े से बड़े मोहरे को भी कुर्बान करने से नहीं हिचकतीं. ममता ने एक ही झटके में अपने 74 विधायकों को पैदल कर दिया. उनके टिकट काट दिए. इसे टीएमसी के भीतर हुई अब तक की सबसे बड़ी सियासी सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है. इसके बाद से टीएमसी में भूचाल मचा हुआ है.
ममता बनर्जी और उनके रणनीतिकारों ने इस बार सिर्फ विनिंग फैक्टर देखा है और इसके लिए पुराने रिश्तों का भी लिहाज नहीं रखा है. संदेश बिल्कुल साफ है, या तो जनता के बीच काम करो और अपनी छवि साफ रखो, या फिर घर बैठो. पार्टी अब किसी भी दागी, अलोकप्रिय या विवादों में घिरे नेता का बोझ ढोने के मूड में नहीं है.
दागियों पर चला ‘दीदी’ का बुलडोजर

इस लिस्ट की सबसे बड़ी कहानी उन चेहरों का बाहर होना है, जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में टीएमसी की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है. 2021 के बाद से बंगाल की राजनीति शिक्षक भर्ती घोटाले और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों से गूंजती रही है. विपक्ष लगातार ममता बनर्जी पर दागियों को बचाने का आरोप लगाता रहा है. लेकिन इस लिस्ट ने विपक्ष के हाथ से उनका सबसे बड़ा हथियार छीन लिया है.
पार्थ चटर्जी, माणिक भट्टाचार्य और जीवनकृष्ण साहा जैसे वे कद्दावर नाम, जो कभी टीएमसी की कोर कमिटी का हिस्सा हुआ करते थे और सत्ता के मद में चूर थे, उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया गया है. भ्रष्टाचार में नाम जुड़ने के बाद पार्टी ने इन नेताओं से न केवल पूरी तरह से किनारा कर लिया है, बल्कि यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि ‘कटमनी’ और घोटालों के दाग लेकर कोई भी नेता ममता बनर्जी के नाम पर चुनाव नहीं लड़ सकता.
कई सितारे भी लिस्ट से बाहर
टीएमसी हमेशा से टॉलीवुड यानी बंगाली सिनेमा के सितारों को चुनावी मैदान में उतारने के लिए जानी जाती रही है. लेकिन इस बार स्टारडम से ज्यादा वोटेबिलिटी और क्लीन इमेज पर फोकस किया गया है. मशहूर अभिनेता और विधायक कांचन मल्लिक और चिरंजीत चक्रवर्ती जैसे बड़े नामों को भी इस बार टिकट नहीं मिला है.
कांचन मल्लिक का टिकट कटना सबसे ज्यादा चर्चा में है. इसका कारण उनकी कोई राजनीतिक विफलता नहीं, बल्कि उनकी निजी जिंदगी और सोशल मीडिया पर उनकी बयानबाजी से उपजे विवाद हैं. जब किसी नेता की पर्सनल लाइफ पार्टी की पब्लिक इमेज पर भारी पड़ने लगे, तो उसका पत्ता कटना तय होता है. ममता बनर्जी ने यह साफ कर दिया है कि उन्हें रैलियों में भीड़ जुटाने वाले सिर्फ ‘चेहरे’ नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो विवादों से दूर रहकर जनता का काम कर सकें.
पुराने दिग्गजों का अहंकार टूटा
74 विधायकों की यह लिस्ट टीएमसी के भीतर हुए जेनरेशनल शिफ्ट और अभिषेक बनर्जी की मजबूत होती पकड़ का भी सीधा प्रमाण है. जिन 74 विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है, उनमें कई ऐसे नाम हैं जो सालों से अपने-अपने इलाकों के क्षत्रप माने जाते थे.
तपन दासगुप्ता, ज्योत्सना मंडी, तजमूल हुसैन, असित मजूमदार, परेश पाल, स्वर्णकमल साहा, विकास रॉयचौधुरी और विवेक गुप्ता जैसे नाम इस लंबी फेहरिस्त का हिस्सा हैं. इनमें से कई नेताओं की ग्राउंड रिपोर्ट बेहद खराब थी. जनता के बीच उनकी दूरी बढ़ चुकी थी, एंटी-इंकंबेंसी चरम पर थी और उन पर गुटबाजी के आरोप लग रहे थे. ममता बनर्जी ने इन ‘स्थानीय क्षत्रपों’ की जमीनी हकीकत को भांपते हुए उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना ही बेहतर समझा.
15 के टिकट बदले, 135 पर भरोसा
राजनीति में केवल काटना ही सब कुछ नहीं होता, सही चेहरों को सही जगह पर फिट करना भी एक कला है. टीएमसी के सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने 15 विधायकों की सीटें बदल दी हैं. इनमें अभिनेता शोभन चक्रवर्ती जैसे नाम भी शामिल हैं. सीट बदलने की यह रणनीति एंटी-इंकंबेंसी को मात देने और जातिगत व क्षेत्रीय समीकरणों को दुरुस्त करने का एक आजमाया हुआ फॉर्मूला है.
वहीं, 135 विधायकों को उनकी पुरानी सीटों से ही मैदान में उतारा जा रहा है. इसका मतलब है कि पार्टी ने आंख बंद करके सभी को नहीं हटाया है. जिन्होंने जमीन पर काम किया है, जिनका रिपोर्ट कार्ड अच्छा रहा है और जो विवादों से दूर रहे हैं, पार्टी ने उन पर अपना भरोसा कायम रखा है.






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