(नेवेद्य पुरोहित)
कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसी जगहों तक ले आती है, जहाँ हम दूसरों से नहीं, बल्कि खुद से मिलने लगते हैं। ऐसा ही एक दुर्लभ और आत्मीय अनुभव मुझे मिला 24 से 27 जुलाई 2025 के बीच, जब मैंने योगनगरी ऋषिकेश में आर्ट ऑफ़ लिविंग का मानसून स्पेशल एडवांस्ड मेडिटेशन प्रोग्राम (एएमपी) किया। यह कार्यक्रम प्रसिद्ध ध्यान प्रशिक्षक निर्मल मटेला सर के निर्देशन में हुआ।
इस कार्यक्रम की शुरुआत दरअसल अप्रैल महीने में हुई थी, जब बेनेट यूनिवर्सिटी में यस!+ और सहज समाधि ध्यान कार्यक्रम हुआ था। उसी दौरान हम कुछ वॉलंटियर्स ने यह निर्णय लिया था कि गर्मियों की छुट्टियों में हम ऋषिकेश जाकर एडवांस कोर्स करेंगे। छुट्टियों के बीच यह योजना थोड़ी थम-सी गई थी, लेकिन फिर 13 जुलाई को वंश गुप्ता भैया का संदेश हमारे व्हाट्सऐप ग्रुप में आया कि यदि कोई ऋषिकेश में एडवांस्ड मेडिटेशन प्रोग्राम में इंटरेस्टेड है तो उन्हें बताए।

शुरुआत में मेरा मन नहीं था, लेकिन जब भैया ने बड़े प्यार से कहा, “सावन का महीना है, ऋषिकेश चलो, घाट पर नहाएँगे, दो-चार पाप ही धुल जाएँगे!” तो मन मान गया। हमारे साथ आगरा से मित्र अर्थ सक्सेना भी साथ आने को तैयार हो गए। घरवालों से अनुमति ली, सभी ने सहर्ष हाँ कह दी।

सबसे पहले मैंने इंदौर से दिल्ली की ट्रेन बुक की, लेकिन वह वेटिंग लिस्ट 14 पर थी। सात दिन तक प्रतीक्षा करने के बाद भी टिकट कन्फर्म नहीं हुआ, तो अंत में ट्रेन रद्द कर दी और तत्काल फ्लाइट बुक की। 22 जुलाई की उड़ान से मैं दिल्ली पहुँचा और रात दो बजे वंश भैया के फरीदाबाद स्थित घर पहुँचा। वहीं कुछ घंटे विश्राम किया और सुबह 5 बजे कैब से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन रवाना हुए। वंश भैया ने पहले से ही शताब्दी एक्सप्रेस में टिकट करवा रखा था, जिससे हम 23 जुलाई की सुबह 11 बजे हरिद्वार पहुँचे।
संयोग ऐसा था कि उस दिन सावन महीने की शिवरात्रि (चतुर्दशी) भी थी। हरिद्वार और ऋषिकेश में सावन के कारण जबरदस्त भीड़ थी। जगह-जगह कांवड़िए, भक्ति गीत, हर-हर महादेव की गूंज और श्रद्धा का असीम वातावरण। हरिद्वार से हम सीधे ऋषिकेश पहुँचे जहाँ हम आर्ट ऑफ लिविंग के श्री वेद निकेतन धाम आश्रम में रुके। यह आश्रम गंगा नदी के बिल्कुल किनारे स्थित है प्रकृति की गोद में बसा शांत, पवित्र और अत्यंत सुंदर स्थान। चेक-इन प्रक्रिया पूरी करने के बाद हम तीनों मित्र सबसे पहले पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने निकल पड़े। नदी का जल अत्यंत ठंडा था, लेकिन अनुभूति इतनी दिव्य थी कि मन प्रसन्न हो गया। सावन मास की शिवरात्रि का दिन था, और गंगा स्नान से विशेष पुण्य की अनुभूति हुई। यह सोचकर कि अगले चार दिन हमारा मौन, सात्विक आहार और आश्रमीय अनुशासन में बीतने वाले हैं, हम तीनों बाहर जाकर डोमिनोज़ पिज़्ज़ा खाने निकल गए यह मानो हमारी आख़िरी सांसारिक तृप्ति थी।
अगली सुबह 6 बजे कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत हुई। देशभर से 70 साधक इस कार्यक्रम में सम्मिलित हुए थे, जिनमें से 25 लोग नागपुर से थे। हमारा पूरा दिन ध्यान, प्राणायाम, सुदर्शन क्रिया, मौन और सेवा में विभाजित रहता था। हमारा दैनिक क्रम इस प्रकार था —
सुबह 5:30 से 8:00 बजे तक ध्यान और क्रियाएँ होती थीं, इसके बाद नाश्ता और सेवा कार्य का समय होता। फिर 10:00 से 12:30 तक पुनः ध्यान और सत्र होते। दोपहर में भोजन और विश्राम, और दो बजे से फिर सायं तक कार्यक्रम चलता। रात को रात्रिभोजन के बाद 8 बजे से सत्संग होता था।
पहले दिन सेवा कार्य में मेरे ग्रुप को पहले दिन शौचालयों की सफ़ाई करने का दायित्व मिला। पहले थोड़ी झिझक हुई, पर जैसे ही काम में हाथ लगाया, एक बहुत बड़ा भावनात्मक अहसास हुआ और लगा कि समाज में जो लोग यह काम प्रतिदिन करते हैं, उन्हें कितनी बार तुच्छ दृष्टि से देखा जाता है। जबकि सच यह है कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। इस सेवा ने हमारे भीतर छिपे अहंकार को तोड़ा और आत्मा को नम्र बनाया। यही आत्मिक साधना का प्रारंभ था।
24 जुलाई की रात्रि से हमारा मौन प्रारंभ हुआ, जो 27 जुलाई की दोपहर 1 बजे तक चला। इस मौन की अवधि में शब्दों का त्याग कर हमने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनी। इस काल में हम किसी से बात नहीं करते थे, मोबाइल फोन बहुत कम इस्तेमाल करते थे, और जीवन बिल्कुल भीतर शांति की ओर मुड़ा हुआ था। एक दिन हम सभी लोग सुबह-सुबह ट्रेकिंग पर गए, जहां पहाड़ों और जंगलों के बीच बैठकर ध्यान और सुदर्शन क्रिया की — वह अनुभव शब्दों से परे है।
इन चार दिनों में जीवन की कई आदतें बदल गईं मोबाइल का स्क्रीन टाइम कम हो गया, समय पर सोना और उठना शुरू हुआ, सात्विक भोजन मिला, विचारों में स्पष्टता आई और मन एकदम हल्का हो गया। ऐसा लगने लगा जैसे भीतर कोई नयी ऊर्जा बह रही हो।
अंतिम दिन, हम सभी ने मिलकर गंगा स्नान किया, और उसके बाद रुद्र पूजन में भाग लिया। उसके पश्चात हमारी मौन यात्रा की समाप्ति हुई। मौन से बाहर आते समय एक नई चेतना, नई भावनाएँ और असीम शांति हमारे साथ थीं। हमने हर कार्य को कृतज्ञता के भाव के साथ पूर्ण किया और सबसे अहम बात खुद से प्रेम करना सीखा। शाम 5:20 की मेरी देहरादून से पहली उड़ान थी। इसलिए मैं दोपहर 2:30 बजे ही आश्रम से निकला और देहरादून के जॉली ग्रांट एयरपोर्ट पहुँचा। वहाँ से लखनऊ होते हुए, मेरी अगली फ्लाइट 7:30 बजे इंदौर के लिए थी, और मैं रात 9:30 बजे घर पहुँच गया लेकिन इस बार केवल शरीर नहीं, मन और आत्मा भी शुद्ध होकर लौटी।
ये चार दिन मेरे जीवन के सबसे शुद्ध, शांत और आत्मिक रूप से जागरूक दिन रहे। हर दिन कुछ नया सीखा, कुछ नया महसूस किया। यह अनुभव न तो किसी किताब से मिल सकता है और न ही किसी व्याख्यान से यह केवल आत्मानुभव है। मुझे अब समझ आया कि शांति कही बाहर नहीं, भीतर है। मौन ही सबसे गहन संवाद है। सेवा ही असली साधना है।और आत्म-स्वीकृति ही आत्मविकास का मूल है। यदि आप भी जीवन की भीड़भाड़ से निकलकर, मन को शांत रखने की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं तो एक बार ऋषिकेश जाकर यह अवश्य अनुभव करें।





