आइटीम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा ,आयोजित संगीत समारोह ‘मेघ मल्हार’ के दूसरे दिन सुश्री शाश्वती मंडल का गायन
*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
आइटीम यूनिवर्सिटी ग्वालियर द्वारा ,आयोजित संगीत समारोह ‘मेघ मल्हार’ के दूसरे दिन सुश्री शाश्वती मंडल का गायन सुनने के लिए गया था। क्योंकि मैं कोई संगीत विशेषज्ञ, समीक्षक नहीं हूं केवल संगीत का रसिक श्रोता हूं। संगीत प्रस्तुति में आनंद अथवा रसभंगता का जैसा प्रभाव मुझ पर पड़ता है उसे ही शब्दों में पिरो कर लिखता हूं। आज की प्रस्तुति में मौसम के मुताबिक राग मेघ से कार्यक्रम शुरू हुआ, बाद में रामदासी मल्हार फिर राग देश में टप्पा गाने की घोषणा खुद गायिका शाश्वती मंडल ने मंच से कर दी थी। रियाज़ से मंजे हुए कलाकार की तैयारी के सारे गुण उनके गायन में लग रहे थे।
तबले सारंगी की लड़त, और हारमोनियम से नोक झोक मुझ जैसे रसिक को खूब आनंदित कर रहे थे। देखा जाता है कि नफ़ीरी वादक (शहनाई) के साथ दमकश वाले हुंकार भरते रहते हैं, जिससे मुख्य कलाकार ऊर्जा पाकर राग में रस भरकर विस्तार से अपना रंग बिखेरते हैं। शाश्वती मंडल की दो शिष्या तानपुरे के साथ-साथ गायन में भी साथ दे रही थी, शाश्वती बार-बार अपनी शिक्षाओं को स्वर लगाने के लिए इशारा करती थी परंतु उनकी शिष्याओ से मनचाहा साथ नहीं मिल पा रहा था जिसके कारण श्रोता के रूप में कुछ अटपटा सा लग रहा था। बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी। अंदर गायन से वर्षा ऋतु के विविध रूपों विरह, मिलन, रौद्र, करुणा का संगीत के माध्यम से वर्णन हो रहा था। शास्त्रीय संगीत के जादुई असर से मैं आनंदित हो उठा। संगीत सभा की समाप्ति तक वर्षा रूक चुकी थी।
हाल से बाहर निकला तो वहां का मंजर देखकर आईटीएम यूनिवर्सिटी के इस दूसरे “तुरारी” कैंपस की पुरानी यादें जाग उठी। जिस समय इस कैंपस की स्थापना की नींव पड़ रही थी तो मैं इसके संस्थापक रमाशंकर सिंह के साथ उस स्थान को देखने के लिए गया था। तब तक आगरा झांसी हाईवे का निर्माण नहीं हुआ था, सरकारी अमले के कुछ इंजीनियर और कारिंदे जमीन की नपाहिस, पैमाइश, निशान देही कर रहे थे। रमाशंकर ने जब हाथ का इशारा करके मुझे बताया यह जमीन है, तो मैंने देखा कि बाहर से अंदर दाखिल होने के लिए तकरीबन 10 से 12 फुट गहरा तथा 20 फुट के तकरीबन लंबा गड्ढा बना हुआ था।
ऊपर बिजली के हाई टेंशन तार लगे हुए थे। सामने उबड़ खाबड़ जमीन तथा अंत में एक पहाड़ी की श्रृंखला दिखाई दे रही थी। गैर तजुर्बेकर होने के कारण मुझे लगा कि यहां पर यूनिवर्सिटी बनाने की सोचना अक्लमंदी का काम नहीं है, और मैंने रमा से कह भी दिया कि मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। आज जब मैं प्रोग्राम खत्म होने के बाद हाल के बाहर आया तो बारिश से नहा चुके पेड़ पौधे, वहां पर रखे हुए स्कल्पचर, तामीर की गई इमारतें, खेलों के मैदान, क्लासरूम, विद्यार्थियों के हॉस्टल देखकर कई तरह के विचार उमड़ने घुमड़ने लगे। आज यह परिसर शैक्षणिक, सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जहां एक और प्रस्तर कलाकारों के हथौड़े छेनी से गड़ी गई आकृतियो, कोटा शैली से कच्ची मिट्टी से बनी कलाकृतियां, मुख्तलिफ कलाकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग से अटी-पटी दिखाई दे रही थी।
एक व्यक्ति की लगन, मेहनत, सूझबूझ, कलानुराग, जीजिविषा, आत्मविश्वास तथा हिम्मत न हारने की ज़िद के कारण वह एक रमणीक सांस्कृतिक शैक्षणिक स्थल बन गया। दूर-दूर तक हरे-भरे पेड़ों की झुरमुट, सनाहट, लंबे चौड़े रास्ते के साथ वृक्षों की कतारें, बीच-बीच में पत्थर की कलाकृतियां देखकर कोई भी ,मोहित हो सकता है। एक तकनीकी यूनिवर्सिटी में कला, साहित्य, संगीत, स्थापत्य, रंगकारी के अनूठे आयोजनों को साकार रूप दे दिया साथी रमाशंकर सिंह ने।





