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*शिबू सोरेन के विचार, संघर्ष और प्रेरणा चिरस्थायी*

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4 अगस्त 2025 को झारखंड की राजनीति के सबसे बड़े स्तंभों में से एक, ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन का निधन हो गया। उनका जाना न केवल झारखंड, बल्कि भारत के आदिवासी आंदोलन और हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका जीवन एक ऐसे व्यक्तित्व का दर्पण है, जिसने अपने संघर्षों और सिद्धांतों के बल पर एक राज्य की नींव रखी और लाखों आदिवासियों को उनकी अस्मिता का बोध कराया।

प्रारंभिक जीवन और चेतना का बीज

शिबू सोरेन का जन्म 1944 में अविभाजित बिहार के हजारीबाग जिले के नेमरा गांव में हुआ था। वे संथाल आदिवासी समुदाय से थे। उनके पिता सोबरन सोरेन को महाजनी प्रथा के विरुद्ध संघर्ष करते हुए मार दिया गया, जिसने शिबू सोरेन के भीतर आदिवासी शोषण के विरुद्ध विद्रोह की भावना जगा दी।

धान कटनी आंदोलन और ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि

महाजनों द्वारा आदिवासियों की फसलों पर कब्जा करना, उन्हें गुलाम बनाना और सूदखोरी में जकड़ देना आम बात थी। इसके खिलाफ शिबू सोरेन ने 1970 के दशक में ‘धान कटनी आंदोलन’ शुरू किया। उन्होंने नारा दिया — ‘धान लगाने वाला ही धान काटेगा!’ इस आंदोलन ने उन्हें आदिवासियों के दिलों में “दिशोम गुरु” बना दिया — दिशोम यानी ‘देश’ और गुरु यानी ‘मार्गदर्शक’।

शिक्षा, सुधार और समाज निर्माण की सोच

शिबू सोरेन केवल आंदोलनकारी नहीं थे, वे सामाजिक पुनर्निर्माण में विश्वास रखते थे। उन्होंने आदिवासियों के बीच रात्रि पाठशालाएं शुरू कीं ताकि दिन में खेतों और खदानों में काम करने वाले लोग रात में पढ़ सकें। वे शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार मानते थे। वे विवाह और त्योहारों में अधिक खर्च के खिलाफ थे और चाहते थे कि वह पैसा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो। उनका मानना था कि शराब आदिवासी समाज को खोखला कर रही है। जब उन्होंने संसद में पहला भाषण दिया, तो उसी में शराब के खिलाफ बोलते हुए इसे ‘आदिवासी समाज के लिए अभिशाप’ बताया।

झारखंड मुक्ति मोर्चा और राजनीतिक यात्रा की शुरुआत

1973 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (JMM) की स्थापना की। उन्होंने 1977 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। पर 1980 से लेकर 2019 तक उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से 8 बार चुनाव जीता। वे दो बार राज्यसभा सांसद भी रहे।

राज्य निर्माण की लड़ाई और संघर्ष का चरम

झारखंड राज्य की मांग शिबू सोरेन की राजनीति की धुरी थी। उन्होंने इस मुद्दे को जमीनी आंदोलनों और संसद, दोनों में प्रमुखता से उठाया। उनके नेतृत्व और संघर्ष के कारण 2000 में झारखंड भारत का 28वां राज्य बना। उन्होंने यह साबित किया कि अलग राज्य सिर्फ राजनीतिक लालसा नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक न्याय की मांग भी है।

केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री पद का सफर

शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और तीन बार केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे। 2004 में मनमोहन सिंह सरकार में उन्हें कोयला और खान मंत्री बनाया गया। लेकिन जामताड़ा केस में गिरफ्तारी वारंट निकलने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। जेल से रिहा होने के बाद उन्हें फिर से मंत्री बनाया गया, लेकिन 2006 में अपने सचिव की हत्या के एक मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया, हालांकि 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। मुख्यमंत्री पद पर वे 2005, 2008 और 2009 में बैठे, लेकिन तीनों बार वे या तो बहुमत साबित नहीं कर सके या चुनाव हार गए या समर्थन खो बैठे।

एक विचारधारा, एक मिशन

शिबू सोरेन का जीवन पदों से अधिक विचारधारा से जुड़ा रहा। उन्होंने आदिवासियों को जागरूक किया कि उनकी संस्कृति, भाषा और भूमि उनकी अस्मिता का हिस्सा है। वे सामूहिक नेतृत्व में विश्वास रखते थे और हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे।

निधन और एक युग का अंत

4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की उम्र में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उनका निधन हुआ। उनके बेटे और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया पर लिखा — “आज मैं शून्य हो गया हूं। दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए।”

 जो मिटा नहीं करते…

शिबू सोरेन का जाना एक शरीर का जाना हो सकता है, लेकिन उनके विचार, संघर्ष और प्रेरणा चिरस्थायी हैं। जिस ‘दिशा’ को उन्होंने आदिवासी समाज को दी, वह झारखंड की राजनीति और सामाजिक चेतना में हमेशा जीवित रहेगी। वे एक आंदोलन थे, एक युग थे और आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श रहेंगे। 

Ramswaroop Mantri

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