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*-निर्मल सिरोहिया*
विनम्रता, धैर्य, सहिष्णुता और करुणा की प्रतिमूर्ति पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह नहीं रहे। देश ने एक दूरदर्शी राजनेता और अद्वितीय अर्थशास्त्री खो दिया। एक गैर राजनीतिक व्यक्ति का देश की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचकर बदलाव की नींव रखना आसान नहीं होता, लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने यह सहजता और सौम्यता से कर दिखाया। करीब पांच दशक से अधिक समय तक वे देश की राजनीति से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे।
1971 में वाणिज्य और 1972 में वे वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार बने। यही नहीं वित्त मंत्रालय के सचिव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1991 में जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय पीवी नरसिंहराव ने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाकर उनके राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत की। नरसिंहराव की अपेक्षा अनुरूप उन्होंने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को लागू करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट से उबारकर इसे एक नई दिशा दी। वक्त बदला और 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह को भारत का 14वां प्रधानमंत्री बनाया गया।
उन्होंने 10 वर्षों तक इस पद का मान बढ़ाया। उन्होंने ग्रामीण विकास, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में कई प्रयोग किए। नई योजनाओं को लागू किया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, शिक्षा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और भारत-अमेरिका परमाणु समझौता उनके कार्यकाल की खास उपलब्धियां थीं। डॉ. मनमोहन सिंह की विद्वता, विनम्रता और नीतिगत दूरदर्शिता उन्हें भारतीय राजनीति और प्रशासन में सदैव स्मरणीय बनाती है। उनका निधन देश के लिए अपूरणीय क्षति है। आज देश एक ऐसे नेता को खो चुका है,जिसने अपनी बुद्धिमत्ता और संजीदगी से न केवल देश को आर्थिक संकट से उबारा, बल्कि विकास की नई ईबारत लिखी। ऐसे *महान नेता को आत्मीय श्रद्धांजलि*।





