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 *बैंक ट्रेड यूनियन आंदोलन : कुछ कड़वी सच्चाई!*

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विजय दलाल

एआईबीईए के बैनर तले और उसकी छतरी के नीचे रहने वालों को यह भूलना नहीं चाहिए कि आज देश में अघोषित आपातकाल लगाने वाले अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए इंदिरा जी जिन्होंने नेहरू काल में देश के बुनियादी विकास की नींव रखी थी उसकी पहली मंजिल जिस पर आज देश की बुलंद इमारत खड़ी है बैंकों का  नेशनलाईजेशन कर के की थी। उसके बाद राजाओं का प्रीविपर्स खत्म कर सामंती व्यवस्था पर हमला किया था। उसके बाद परमाणु परीक्षण और 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के खुब डराने के बाद भी पाकिस्तान के टुकड़े कर बांग्लादेश को अलग कर दिया। इसलिए इंदिरा जी के विरुद्ध देश की समाजवादी विरोधी और पूंजीवाद समर्थक, प्रीविपर्स छीनने के कारण सामंती ताकतें, सिद्धांतत: संविधान की , अंबेडकर, नेहरू और गांधी के पुतले जलाने वाली ताकतें और अमेरिका की ना मानकर तटस्थता की नीति अपनाते और दुनिया के सामने एक शक्तिशाली ताकत के रूप में पेश होने से साम्राज्यवाद की आंख की किरकिरी होने के कारण चारों प्रतिगामी ताकतों के मिलकर प्रगतिशील इंदिरा गांधी पर हमला किया था।

इसलिए उसका मुकाबला करने हेतु संविधान के प्रावधानों के तहत् आपातकाल लगाया था। तब भी हमारे जैसे करोड़ों लोग हैं जो आपातकाल के विरोधी रहे और रहेंगे उस समय की ज्यादतियों के समर्थक न कल थे न आज हैं। लेकिन इन हकीकतों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इंदिरा जी लोकतंत्र समर्थक और संविधान में अटूट विश्वास करती थी इसलिए फिर से चुनाव हुए और चुनाव में हारी और आपातकाल के लिए माफी भी मांगी। देश ने फिर से बेलेट पेपर से उन्हें जीताकर माफ भी कर दिया और वहीं वो काला अध्याय वहीं समाप्त हो गया। 

ये मजदूर किसान विरोधी और संविधान – लोकतंत्र विरोधी ताकतें देश को बेचने को और फिर से साम्राज्यवाद का गुलाम बनाने की साज़िश रच रही है।

जनता के श्रम और पूंजी से बनाए देश के पुरे बुनियादी उद्योग को अपने चुने हुए कार्पोरेट्स मित्रों के हाथों कोड़ियों के दाम बेच चुकी है मोदी सरकार। आधुनिक दशकों में दुनिया के सबसे सशक्त किसान आंदोलन का क्या हश्र किया है इस सरकार ने। बेरोजगारों की फौज खड़ी कर ली गई है। गैर बराबरी अपने चरम पर है। सौ – डेढ़ सो साल के संघर्षों और हजारों लोगों के बलिदान से जो श्रम कानून,स्थाई नौकरियां, प्रबंधनों की ज्यादतियों के खिलाफ सुरक्षा, मिनिमम वेतनमान कानून , सेवा निवृत्ति के पश्चात सामाजिक सुरक्षा संबंधी इत्यादि जितने भी कानून पाए थे उन सब को श्रम संहिता बनाकर पीछे के रास्ते से छीन लिया गया और मेहनतकश को बंधुआ मजदूर बनाने की प्रक्रिया से देश गुजर रहा है।

*न न्यायपालिका और न ही आज पुरी तरह से कार्पोरेट्स नियंत्रित मीडिया ट्रेड यूनियन आंदोलन से अपना रिश्ता कभी का तोड़ चुके हैं।

ट्रेड यूनियन के पास करो या मरो के रास्ते के अलावा कुछ भी नहीं बचा है। वरना दुकान तो कैसी भी चल जाएगी। अधिवेशन शादी विवाह के समारोह से ज्यादा कुछ भी नहीं रह जा रहें हैं। परिपत्र शाखाओं के ड्रावर्स की धूल खाते रहेंगे। नेताओं के भाषण एक कान से सुने जा रहे हैं और दूसरे कान से निकाले जा रहे हैं। मध्यम वर्गीय व्हाइट कालर यूनियनों के सदस्यों को आज केवल उनके व्यक्तिगत आर्थिक फायदों के अलावा कोई काम की चीज नहीं रह गई है। ट्रेड यूनियन के बुनियादी सिद्धांतों और संघर्षों से बहुमत सदस्यों का कोई लेना-देना नहीं रह गया है। ट्रेड यूनियनों और श्रमिक आंदोलन के सामूहिक आव्हान पर लोग हड़तालों पर जाते भी हैं तो बहुमत सदस्य उसे छुट्टी की तरह सेलिब्रेट करते हैं। यह मेरा 1978 से 2015 तक एआईबीईए की यूनिटरी सिस्टम से लेकर फेडरल सिस्टम में स्थानीय से लेकर मध्यप्रदेश की राज्य इकाइयों के किसी न किसी पदाधिकारी पद पर रहते हुए और आज भी अप्रत्यक्ष माध्यमों से ही सही हर गतिविधियो से जुड़ा हुआ हूं यह मेरा अपना अनुभव है।

चाहे सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र को निजी क्षेत्र को सौंपने की नीतियों का परिणाम हो या उच्च प्रबंधन द्वारा भ्रष्टाचार पर यूनियनों द्वारा आंख मीच लेना हो या नीचले स्तरों पर सदस्यों के बीच ट्रेड यूनियन शिक्षा का अभाव हो बैंक ट्रेड यूनियन आंदोलन आज सिर्फ बहुमतवाद तक पहुंच गया है पूंजीवाद ने समाज में जितनी बुर्जुआ बुराईयां पैदा की उससे आंदोलन विभाजित करने के साथ बाकी वैचारिक बुराईयों से भी पुरी तरह से त्रस्त है। अधिकांश सदस्य या तो सरकार के साथ खड़े हैं या भयभीत होकर अपने आपको इन सबसे अलग खड़े हैं और निजी क्षेत्र के प्रबंधन के समान निगरानी में केवल नौकरी भर कर रहे हैं।

Ramswaroop Mantri

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