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 *युवाओं को लौटना ही होगा: सोशल मीडिया से किताबों की ओर….*

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                             – कुमारी नंदनी 

 आज के समय में मीडिया के बढ़ते दौर में हर व्यक्ति कमसमय में अधिक ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। खासकर युवा अपनी सोशल मीडिया की दुनिया में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास किताबें पढ़ने का समय नहीं बचता। युवा अपने शैक्षणिक सत्र की पढ़ाई के लिए भी किताबों का कम इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उनसे जानकारी प्राप्त करने में समय लगता है।  जबकि डिजिटल मीडिया कम समय में ज़्यादा आवश्यक सामग्री प्रदान कर देती है।

सोशल मीडिया ने युवाओं की एकाग्र शक्ति को कम कर दिया है, क्योंकि वह हर चीज तुरंत उपलब्ध करा देता है। युवाओं में इतना धैर्य नहीं रह गया है, कि वे थोड़ा समय किताबों को दे सकें। हमेशा भाग-दौड़ भरे जीवन में किताबें न सिर्फ ज्ञान देती हैं, बल्कि एक प्रकार की शांति भी प्रदान करती हैं। किताबें एक प्रकार का सुकून देती हैं, मानसिक तनाव को दूर करती हैं, नया शब्दकोश देती हैं और सोचने-समझने की शक्ति विकसित करती हैं।

इसके विपरीत सोशल मीडिया सतही जानकारी ही देता है। डिजिटल मीडिया ने कई नई सुविधाएँ भी दी हैं, जैसे ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स, जिन्हें आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है और पढ़ा जा सकता है, परंतु दूसरी ओर इसने युवाओं की ध्यान शक्ति भी छीन ली है, जिसके कारण लोग इसे इत्मीनान से पढ़ नहीं पाते।

युवा सोशल मीडिया में इतने व्यस्त   हैं कि उन्हें समय का ध्यान ही नहीं रहता। सोशल मीडिया का अधिक उपयोग कई प्रकार की बीमारियों को भी आमंत्रित करता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि रात को बिस्तर पर सोने से पहले किताबें पढ़ने से बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता। इससे बेहद सुकून भरी नींद आती है। इसके विपरीत, देर रात तक मोबाइल चलाने वाले लोगों को नींद की समस्या का सामना करना पड़ता है।

किताबें पढ़ने की आदत लोगों को मानसिक अवसाद से दूर रखने में भी मददगार साबित होती है। किताबें युवाओं में आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक रूप से सोचने की दक्षता भी विकसित करती हैं, साथ ही स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने के लिए भी प्रोत्साहित करती हैं। किसी भी विषय पर गहरी समझ पैदा करती हैं। इंटरनेट पर देखी या पढ़ी हुई चीजें लोग जल्दी भूल जाते हैं, लेकिन किताबों में पढ़ी हुई बातें लंबे समय तक याद रहती हैं।

सोशल मीडिया के दौर में युवाओं को फिर से किताबों की ओर लौटना आवश्यक है। किताबें सिर्फ समझ ही नहीं पैदा करतीं, बल्कि हमारे भीतर की रचनात्मकता को भी बाहर लाने का काम करती हैं। 

( छात्रा,जनसंचार विभाग महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र)

Ramswaroop Mantri

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