5 अगस्त 2025 को मध्य प्रदेश के सीहोर स्थित कुबेरेश्वर धाम में रुद्राक्ष वितरण के दौरान मची भगदड़ में दो महिला श्रद्धालुओं की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए। यह कोई पहली घटना नहीं थी। पिछले चार वर्षों में पंडित प्रदीप मिश्रा के आयोजनों में कम से कम 6 लोगों की मौत और 50 से अधिक घायल हो चुके हैं।
फिर भी प्रशासनिक तंत्र हर बार उसी ढर्रे पर चलता है—“अचानक भीड़ आ गई”, “धक्का-मुक्की से हादसा हुआ”, “अब राहत बचाव जारी है”.
यह लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित अंधश्रद्धा और बाज़ारू धर्म का परिणाम है — जहां ‘धार्मिक आयोजन’ श्रद्धा का नहीं, भीड़ नियंत्रण की विफलता और सत्ता के संरक्षण का प्रमाण बन चुके हैं।
कौन हैं पंडित प्रदीप मिश्रा?
मध्य प्रदेश के सीहोर में जन्मे प्रदीप मिश्रा ने निजी स्कूलों में शिक्षक की नौकरी से अपने करियर की शुरुआत की। पूजा-पाठ और कर्मकांड के ज़रिये वे धीरे-धीरे ‘महिलाओं के बीच लोकप्रिय कथा वाचक’ बने, जहाँ उन्होंने शिव पुराण, सास-बहू के किस्से, और दैनिक जीवन में उपयोगी टोटकों के ज़रिये अपनी पहुँच बढ़ाई।
भले ही वे शिव को समर्पित दिखते हों, लेकिन उनका माथे का वैष्णव तिलक उनकी धार्मिक पहचान में विरोधाभास भी दिखाता है।
प्रदीप मिश्रा ने रुद्राक्ष महोत्सव और कुबेरेश्वर धाम के निर्माण से अपनी ‘कथा वाचक’ छवि को एक बड़े धार्मिक उद्योग में बदल दिया, जो अब करोड़ों का दान, जमीनों की खरीद, सोशल मीडिया इनकम और लाखों की भीड़ का केंद्र बन चुका है।
बार-बार क्यों दोहराती हैं त्रासदियाँ?
✅ 2023 में रुद्राक्ष वितरण के दौरान भगदड़:
एक महिला की मौत,
3 साल का बच्चा भी मरा,
आयोजन स्थगित करना पड़ा।
✅ 2025 की घटना:
फिर से रुद्राक्ष वितरण,
फिर से भीड़,
फिर से मौतें और अफरा-तफरी।
प्रश्न उठता है: अगर आयोजक और प्रशासन को पहले से अनुभव था, तो क्यों नहीं की गई पुख्ता व्यवस्था?
यह सिर्फ़ लापरवाही नहीं, ‘भीड़ में मौत को सामान्य’ मान लेने की एक क्रूर व्यवस्था है।
सरकार और प्रशासन का दोहरा चेहरा
मुख्यमंत्री, विधायक और अफसर हर बार घटना के बाद संवेदना प्रकट करते हैं। फिर भी आयोजनों को रोकने या नियंत्रित करने की कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती।
इसका कारण क्या है?
क्या पंडित प्रदीप मिश्रा को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है?
क्या इन आयोजनों के पीछे राजनीतिक निवेश, धर्म आधारित ध्रुवीकरण और चुनावी समीकरण काम करते हैं?
क्या ‘श्रद्धालु’ को ‘भीड़’ में बदलकर सत्ता केवल संख्याबल बटोरती है, और जब हादसा होता है तो ‘प्राकृतिक दुर्घटना’ कहकर पल्ला झाड़ लेती है?
गरीब ही क्यों मरता है?
“इन आयोजनों में कभी किसी नेता का बेटा नहीं मरता, मरता है तो सिर्फ गरीब।”
भीड़ में शामिल महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे — ये वही लोग होते हैं जो जीवन में कुछ आशा, कुछ चमत्कार खोजते हैं।
उन्हें बताया जाता है कि रुद्राक्ष से कर्ज़ कटेगा, संतान प्राप्त होगी, परीक्षा में सफलता मिलेगी।
लेकिन वे भूल जाते हैं कि इस ‘श्रद्धा व्यापार’ का कोई बीमा नहीं होता।
अवास्तविक वादों और टोटकों का बाज़ार
प्रदीप मिश्रा की प्रसिद्धि उनके कथाओं से नहीं, टोटकों और चमत्कारिक दावों से जुड़ी है:
“रुद्राक्ष पहनने से धन मिलेगा“,
“5 बेलपत्र से नौकरी पक्की”,
“काली हल्दी से कोर्ट केस जीत जाओगे”,
और भी दर्जनों ‘पुराणों में लिखा है’ कहकर बेचे जा रहे समाधान।
ये उपाय वैज्ञानिक सोच का मखौल हैं और समाज को एक बार फिर भाग्य, भय और आस्था के नशे में धकेलते हैं, जहाँ वह सवाल नहीं करता — सिर्फ़ झुकता है।
कुबेरेश्वर धाम: श्रद्धा का केंद्र या धर्म का प्राइवेट प्रोजेक्ट?
धाम पर:
भूमि विस्तार,
दान आधारित निर्माण,
सोशल मीडिया कमाई,
और बिना सरकारी नियमन के रुद्राक्ष वितरण जैसे आयोजन।
क्या यह धार्मिक ट्रस्ट एक अनियमित, अनुत्तरदायी “धार्मिक उद्योग” नहीं बन चुका है?
आख़िरकार ज़िम्मेदार कौन?
1. आयोजक: आयोजन की सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं की होती है।
2. प्रशासन: अगर बिना अनुमति या अपर्याप्त सुरक्षा में आयोजन होता है, तो यह विफलता उनकी है।
3. सरकार: बार-बार की घटनाओं के बावजूद कोई नियमन नहीं किया गया।
4. मीडिया: जो कथाओं का प्रचार करता है, लेकिन घटनाओं के मूल पर मौन रहता है।
5. समाज: जो प्रश्न पूछने के बजाय भीड़ में खो जाना पसंद करता है।
कथा नहीं, आत्ममंथन ज़रूरी है
जब-जब कथा वाचक के आयोजन में लोग कुचले जाते हैं, तब-तब यह सवाल उठता है कि:
श्रद्धा किस कीमत पर?
टोटके किसकी ज़िंदगी बदलते हैं, और किसकी लील लेते हैं?
क्या धार्मिक आयोजन अब मौत के मेले बनते जा रहे हैं?
उत्तर हमें खुद खोजने होंगे।





