-तेजपाल सिंह ‘तेज’
1. अशिक्षा और पूंजी का गठबंधन:
तानाशाही व्यवस्थाएँ यह भलीभांती जानती हैं कि अगर 95% जनता को अशिक्षित और गरीब रखा जाए तथा देश की अधिकतर पूँजी कुछ चुनिंदा पूँजीपतियों के हाथों में सौंप दी जाए, तो सत्ता पर नियंत्रण टिकाऊ और अडिग हो सकता है। आज भारत इसी खतरनाक दिशा में बढ़ रहा है। नई शिक्षा नीति 2020 और उससे प्रेरित कदमों के ज़रिए देश को सुनियोजित ढंग से अशिक्षा की ओर धकेला जा रहा है। यह न सिर्फ़ एक सामाजिक त्रासदी है, बल्कि लोकतंत्र के मूलभूत स्तंभ—जनता की चेतना और आलोचनात्मक सोच—को कुचलने का षड्यंत्र है। “अशिक्षा किसी समाज की दुर्भाग्यवश हुई दुर्घटना नहीं होती — वह सत्ता की सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है।”
भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता और न्याय की नींव है। परंतु जब किसी सरकार की प्राथमिकताओं से शिक्षा ग़ायब हो जाए, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, एक खतरनाक संकेत होता है — लोकशक्ति को लोकवंचना में बदलने की साज़िश।
21वीं सदी के भारत में, जहाँ सूचना और प्रौद्योगिकी के विकास की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों को योजनाबद्ध तरीक़े से बंद किया जा रहा है, शिक्षकों की नियुक्तियाँ रोकी जा रही हैं, और बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। ये घटनाएँ तात्कालिक संकट नहीं हैं — यह उस नई शिक्षा नीति और उस मानसिकता का हिस्सा हैं, जो देश को बाज़ार और धार्मिक प्रचार की प्रयोगशाला बना देना चाहती हैं।
यह निबंध उस संगठित और बहुस्तरीय विनाश का दस्तावेज़ है जो भारत की शिक्षा, और उसके ज़रिए, भारत के लोकतंत्र को खोखला करने में लगा है। आँकड़े, उदाहरण, नीतियाँ — सब एक ही दिशा में इशारा करते हैं: “शिक्षा नहीं, आज्ञाकारी उपभोक्ता चाहिए।” जब सोचनेवाला नागरिक नहीं चाहिए, तब सबसे पहले उसकी पाठशाला जलाई जाती है — कभी आग से, कभी नीति से।
2. स्कूलों का योजनाबद्ध संहार: “विलय” या विलोपन?
उत्तर प्रदेश में 27,000 सरकारी स्कूलों का “विलय” किया जा रहा है। इसे सरकार “मर्ज” कहती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह प्राथमिक शिक्षा की हत्या है। जब गाँव के बच्चे पाँच किलोमीटर दूर के स्कूल में नहीं जा सकते, तो उनकी पढ़ाई छूट जाती है। राजस्थान में 19,500 स्कूल मर्ज हुए, जिससे 7.8 लाख सीटें समाप्त हो गईं। उत्तर प्रदेश में 10.8 लाख बच्चों के पढ़ने की जगह छीन ली गई। छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक — सभी राज्यों में यही प्रक्रिया चल रही है। सरकारी आँकड़े बता रहे हैं कि इन स्कूल बंदियों के कारण लाखों बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियाँ शिक्षा से पूरी तरह वंचित हो रही हैं।
3. शिक्षक नहीं चाहिए: शिक्षा विहीन शिक्षक नीति:
नई शिक्षा नीति का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसमें शिक्षकों के लिए कोई स्थान नहीं रखा गया है। स्कूलों के विलय से शिक्षक “अनावश्यक” बना दिए गए हैं। सरकारी शिक्षक की भर्ती लगभग ठप कर दी गई है। गेस्ट फैकल्टी, पैराटीचर, कॉन्ट्रैक्ट बेस्ड शिक्षकों की अस्थायी और शोषणकारी नियुक्तियाँ की जा रही हैं। सरकार का इरादा स्पष्ट है — शिक्षा का निजीकरण, और शिक्षक समुदाय का ह्रास।
4. उच्च शिक्षा: विश्वविद्यालयों में परीक्षा का जाल और निजीकरण का खेल:
विश्वविद्यालयों के स्तर पर CUET (Central University Entrance Test) के माध्यम से बच्चों को एक जटिल और कठिन प्रणाली में धकेल दिया गया है। ग्रामीण या गरीब बच्चे इन परीक्षाओं के केंद्र तक नहीं पहुँच पाते। CUET के परिणाम देर से आते हैं, जबकि निजी विश्वविद्यालय पहले ही एडमिशन बंद कर देते हैं। ऐसे में बच्चा सरकारी यूनिवर्सिटी का इंतज़ार नहीं कर सकता और महंगे निजी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने को मजबूर होता है। सरकारी विश्वविद्यालयों के 40% पाठ्यक्रम ऑनलाइन कर दिए गए हैं। इससे शिक्षकों की ज़रूरत घट गई है, भवन की आवश्यकता घट गई, और शिक्षा का मानक भी गिरा।
5. ऑनलाइन शिक्षा: गुणवत्ता की गिरावट, शिक्षा का ढोंग:
COVID के समय हमने देखा कि ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों की समझ और रुचि दोनों पर क्या असर हुआ। बावजूद इसके, सरकार इस ढाँचे को ही स्थायी बना रही है। एक शिक्षक 5000 से 10,000 बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाए, यह न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि शिक्षा का अपमान है। यह व्यवस्था सिर्फ़ निजी कंपनियों के लाभ और सरकारी व्यय में कटौती के लिए बनाई गई है।
6. निजी स्कूलों और कॉलेजों का घोटाला: शिक्षा नहीं, शोषण
निजी स्कूलों और कॉलेजों में फीस की लूट, कम उपस्थिति के नाम पर परीक्षाओं से रोक, और फेल करने की धमकी देकर दोबारा साल भर की फीस वसूली आम बात हो गई है। मेडिकल कॉलेजों में निरीक्षण के दिन लैब और प्रोफेसर किराए पर बुलाए जाते हैं ताकि मान्यता मिल जाए। यह सिर्फ़ शिक्षा की बर्बादी नहीं, यह भविष्य की लाशों पर खड़ी व्यवस्था है।
7. आँकड़े जो डराते हैं:
· सरकारी स्कूलों में कक्षा 8 में छात्रों की संख्या 12% कम हुई है (2017 की तुलना में)।
· ग्रामीण भारत में 14–16 वर्ष के 44% बच्चे कक्षा 3 के स्तर पर भी पढ़ नहीं पाते।
· भारत शिक्षा पर सिर्फ़ 2.9% GDP खर्च करता है, जबकि नीति में 6% का वादा था।
· भारत सरकार के विश्वविद्यालयों में 1.5 लाख फैकल्टी पद खाली हैं।
· 2020 से अब तक लाखों बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं।
8. शिक्षा का दलितकरण: कौन हो रहा है सबसे अधिक प्रभावित?
स्कूल बंद होने का सबसे गहरा असर दलित, आदिवासी, पिछड़े, गरीब और अल्पसंख्यक वर्ग के बच्चों पर पड़ा है। जब स्कूल 5-6 किलोमीटर दूर होता है, तो लड़कियों को घर पर बैठा दिया जाता है। जब शिक्षक नहीं होता, तो शिक्षा का स्तर गिरता है। जब ऑनलाइन कोर्स होता है, तो इंटरनेट के बिना गाँव का बच्चा छूट जाता है। यह शिक्षा नीति समानता की नहीं, भेदभाव की नीति है।
9. ये नीति नहीं, यह राष्ट्रद्रोह है:
NEP 2020 कोई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि अशिक्षा की नीति है। यह नीति बच्चों को सोचने, पढ़ने, सवाल पूछने से रोकने के लिए बनाई गई है। क्योंकि जो पढ़ेगा, वही सवाल करेगा। और जो सवाल करेगा, वह सत्ता के लिए ख़तरा बनेगा। यह नीति एक गुलाम भारत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है — जहाँ बच्चों के हाथ में किताब नहीं, मोबाइल है; दिमाग में ज्ञान नहीं, प्रोपेगैंडा है; और भविष्य में सपना नहीं, सिर्फ़ सर्वाइवल है।
10. सवाल बचा है, जवाब नहीं:
“क्या कोई देश इतना ज्ञान-विरोधी हो सकता है?” भारत हो सकता है — जब उसका शासन निजी कंपनियों और पूँजीपतियों के हवाले कर दिया गया हो, और जब जनता को शिक्षा नहीं, धार्मिक अफीम से बहलाया जा रहा हो।
11. निजी विश्वविद्यालयों का बढ़ता साम्राज्य और शोषण की नई इबारत:
इन विश्वविद्यालयों में शिक्षा नहीं बिकती, डिग्री बिकती है, placements बिकते हैं, dreams बिकते हैं। लाखों रुपए की फ़ीस, सैकड़ों छात्रों पर एक शिक्षक, और शोषणकारी attendance policy — यही है आज का कॉरपोरेट एजुकेशन मॉडल। छात्रों को गुलाम उपभोक्ता बना दिया गया है। वे सोच नहीं सकते, सवाल नहीं कर सकते — सिर्फ़ EMI भर सकते हैं। एक पूरी पीढ़ी को ‘सूचनाजन्य अशिक्षा’ में ढाला जा रहा है — वो जानती तो है, लेकिन समझती नहीं।
12. रोजगार और शिक्षा के टूटते रिश्ते:
आज अगर एक युवा B.A., B.Sc., M.A., PhD कर भी ले, तो कोई गारंटी नहीं कि उसे रोजगार मिलेगा। शिक्षा अब रोजगार से नहीं जुड़ी, केवल व्यवसाय से जुड़ी है।सरकारी नौकरियों में लगातार कटौती, ‘गेस्ट फैकल्टी’ का मॉडल, वर्षों तक रुकी परीक्षाएँ, लीक हुए पेपर — सब मिलकर यह बताते हैं कि आज की
उम्मीद की किरण: लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। अगर आप सोच सकते हैं, तो लड़ भी सकते हैं। शिक्षा सिर्फ़ किताबों में नहीं, चेतना में होती है। अगर आप इस सच को पहचानते हैं, तो अगला क़दम आपका है—विरोध, प्रतिकार, और पुनर्निर्माण। यह निबंध “शिक्षा नहीं, व्यापार चाहिए” भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ — लोकशिक्षा — पर हो रहे सुनियोजित हमलों का गंभीर दस्तावेज है।
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और उद्धरणों का समावेश ;
· प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली बनाम आज की नीतियाँ: नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों की तुलना वर्तमान शिक्षा संहार से। उद्धरण: “नालंदा को जलाने के लिए बख्तियार खिलजी आया था, लेकिन आज शिक्षण संस्थानों को नीतियों से जलाया जा रहा है।”
· अम्बेडकर का दृष्टिकोण: “शिक्षा वो शस्त्र है जिससे आप दुनिया को बदल सकते हैं।” — डॉ. अम्बेडकर …शिक्षा को दलित, गरीब, वंचित वर्ग के लिए मुक्ति का मार्ग मानने की विचारधारा का प्रस्तुतीकरण।
· गांधी और नेहरू की शिक्षा संबंधी चिंता: “भारत को अगर टिकाऊ बनाना है तो गाँव-गाँव में शिक्षा पहुँचानी होगी।” — गांधी। “सच्चा लोकतंत्र अशिक्षित जनता पर नहीं टिका रह सकता।” — नेहरू
2. तथ्यात्मक सुदृढ़ीकरण: आँकड़े, रिपोर्ट, ग्राफिक प्रतिनिधित्व:ग्राफ या चार्ट द्वारा प्रस्तुत किए जा सकने वाले पहलू:
· वर्ष 2014–2024 के बीच शिक्षा बजट में बदलाव (बार चार्ट)
· निजी बनाम सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या (लाइन ग्राफ)
· ड्रॉपआउट दर (राज्यवार पाई चार्ट)
· ऑनलाइन शिक्षा बनाम ऑफलाइन शिक्षा में परिणामों की तुलना (टेबल या ड्यूल बार चार्ट)
· सरकारी शिक्षकों के खाली पदों की स्थिति (स्ट्रक्चर्ड डेटा ग्राफ)
· प्रामाणिक रिपोर्ट्स/स्रोत:
· ASER रिपोर्ट (Annual Status of Education Report) — ग्रामीण शिक्षा की हालत
· UNESCO वर्ल्ड एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट
· NEP 2020 की सरकारी समीक्षा रिपोर्ट
· NITI Aayog या PRS Legislative Research डेटा
3. थीमैटिक उपखंडों में पुनर्विन्यास:
निबंध को कुछ बोधगम्य उप-अध्यायों में बाँटा जा सकता है–
· ‘शिक्षा और साजिश’ – सरकार की योजनाओं की समीक्षा;
· ‘गाँव की पाठशालाओं से विश्वविधालयों तक का विध्वंस’ – ज़मीनी सच्चाइयों का विवरण;
· ‘शिक्षा का निजीकरण और बाजारीकरण’ – व्यावसायीकरण का षड्यंत्र
· ‘ऑनलाइन शिक्षा: सुविधा या विस्थापन?’ – डिजिटल डिवाइड और नया वर्गभेद
· ‘शिक्षकहीन भारत का भविष्य’ – बेरोजगारी, अस्थायीकरण और बुद्धिविरोध
· ‘लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी’ – अशिक्षा और तानाशाही का अंतर्संबंध
4. राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषण के सूत्र जोड़ना:
जनतंत्र में शिक्षित नागरिक का महत्व:
· शिक्षा ही वह ज़रिया है जो नागरिक को सोचने, सवाल करने और सत्ता को चुनौती देने का साहस देता है।
· तानाशाही को शिक्षित नागरिक नहीं चाहिए, सिर्फ़ आज्ञाकारी उपभोक्ता चाहिए।
फासीवादी एजेंडों और शिक्षा-संहार:
· जर्मनी के नाज़ी काल में भी छात्रों की किताबें बदली गईं। इतिहास और विज्ञान की जगह प्रोपेगैंडा पढ़ाया गया।
· भारत में स्कूलों के पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक सोच हटाकर धार्मिक मिथकीय कथाएँ डाली जा रही हैं।
5. समाप्ति खंड को घोषणात्मक बनाना:
निबंध का अंत सिर्फ़ आलोचना पर न रुके, बल्कि समाधान और चेतना का स्वर भी रखे:
· जन चेतना की आवश्यकता: हर नागरिक को यह समझना होगा कि स्कूल का बंद होना किसी गाँव की समस्या नहीं, लोकतंत्र की हत्या है।
· पाठ्यक्रमों का भगवाकरण: शिक्षा के भीतर विचारधारा का ज़हर पाठ्यपुस्तकों से अंबेडकर, भगत सिंह, ग़दर आंदोलन, असहमति और वैज्ञानिक चेतना जैसे विषय हटाए जा रहे हैं। इतिहास से कुरुक्षेत्र और अयोध्या निकलकर आ रहे हैं, और ज्ञान की जगह गौरव बैठाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धीरे-धीरे वैदिक-धर्म आधारित शिक्षा प्रणाली में ढाला जा रहा है, जहाँ विज्ञान की जगह कर्मकांड और तर्क की जगह ‘श्रद्धा’ को पढ़ाया जाएगा। यह सिर्फ शिक्षा नहीं बदल रही, नागरिक की चेतना का डीएनए बदल रही है।
· संविधान-सम्मत शिक्षा आंदोलन: संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत 6–14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का मूल अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा एक जनआंदोलन की मांग करती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A यह स्पष्ट करता है कि 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना राज्य का दायित्व है। लेकिन जब सरकारी स्कूलों को बंद किया जाता है, शिक्षकों की नियुक्तियाँ रोकी जाती हैं, और निजी स्कूलों की ओर गरीबों को धकेला जाता है, तो यह अनुच्छेद केवल काग़ज़ी दस्तावेज़ बनकर रह जाता है।
शिक्षा का अधिकार (RTE Act, 2009) स्पष्ट करता है कि हर बच्चे को उसकी ज़िप कोड सीमा के अंदर गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा दी जानी चाहिए। स्कूलों का ‘विलय’ इस प्रावधान की खुली अवहेलना है। अगर बच्चा 5-6 किलोमीटर दूर पैदल नहीं जा सकता, तो दोष किसका है — बच्चे का या नीति का?
· सामूहिक प्रतिरोध की आवश्यकता: शिक्षकों, छात्रों, अभिभावकों और बुद्धिजीवियों को संगठित होकर NEP 2020 और शिक्षा-विरोधी नीतियों का प्रतिकार करना चाहिए। NEP 2020 शिक्षा को “प्रौद्योगिकी के अनुकूल और नवाचारशील” बनाने की बात करती है, लेकिन क्या इस देश के हर गाँव में ब्रॉडबैंड है? क्या हर आदिवासी परिवार के पास टैबलेट, लैपटॉप, या स्मार्टफ़ोन है? ऑनलाइन शिक्षा ने सुविधा नहीं, बल्कि एक नया वर्ग-भेद पैदा किया है — अमीर के बच्चे वीडियो कॉल पर पढ़ रहे हैं, और गरीब का बच्चा मोबाइल सिग्नल पकड़ते हुए छत पर भटक रहा है। यह डिजिटल डिवाइड एक नई जाति व्यवस्था की तरह काम कर रही है — ज्ञान की जातियाँ।
· सामाजिक-राजनीतिक प्रतिरोध की आवश्यकता पर विस्तार:
शिक्षा बचाओ आंदोलन अब केवल शिक्षा का सवाल नहीं, लोकतंत्र का प्रश्न है। यह नारा अब देना होगा: “शिक्षा बचाओ, लोकतंत्र बचाओ।” जिस दिन हर नागरिक समझ लेगा कि उसके बच्चे का स्कूल बंद होना उसके अधिकारों की हत्या है, उस दिन यह मुद्दा अख़बार के कोने से उठकर संसद की छत हिला देगा।
मुझे ऐसा लगता है कि सरकार बंद किए गए स्कूलों की जमीनों को अपने चहेते पूंजीपतियों को कौड़ी के मूल्य में बेच देगी जबकि ज्यादातर स्कूल ग्रामीणों द्वारा प्रदत्त जमीनों पर बने हुए हैं| मेरा यह संदेह बिलकुल तार्किक और ऐतिहासिक रूप से सटीक है लगता है और यह न केवल आशंका है, बल्कि एक स्थापित प्रवृत्ति (pattern) है जिसे हम भारत में पिछले एक दशक में तेजी से उभरते देख रहे हैं। यह भी कि इस प्रकार की प्रवृत्ति आगामी आर्थिक और राजनीतिक घोटाले का संकेत है। इसे इस प्रकार से जानें
ऐतिहासिक संदर्भ: ज़मीनें कैसे हड़पी जाती हैं:
1. सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण: रेलवे की ज़मीन, बीएसएनएल, एयर इंडिया, जल निगम, डाक विभाग — ऐसी कितनी ही संस्थाएँ हैं जिनकी भूमि-सम्पदा वर्षों से “मूल्यांकन से कम मूल्य पर निजी हाथों को सौंपने” का काम चल रहा है। उदाहरण: 2018 में मोदी सरकार द्वारा रेलवे की 1.25 लाख एकड़ ज़मीन “मॉनेटाइज़ेशन” योजना के तहत निजी कंपनियों को दी जाने की योजना बनी थी।
2. ग्रामीणों द्वारा दान की गई स्कूल भूमि: भारत के हजारों सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिनकी ज़मीनें ग्रामसभाओं, ग्राम समाज, या व्यक्तिगत किसानों द्वारा शिक्षा के नाम पर दान की गई थीं। यह भूमि “सार्वजनिक कल्याण” के लिए थी, न कि कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए। यदि सरकार इन बंद किए गए स्कूलों की भूमि को “अप्रयुक्त” घोषित करके “डिजिटल ज़ोन”, “टाउनशिप”, “इनोवेशन पार्क” या “धार्मिक-सांस्कृतिक परिसर” के नाम पर निजी समूहों को सौंप देती है — तो यह सीधा-सीधा भूमि-हड़प और संविधान के साथ विश्वासघात है।
नवीनतम प्रवृत्तियाँ जो इस आशंका को पुष्ट करती हैं:
राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (NMP) योजना : मोदी सरकार की इस नीति के तहत देश की सार्वजनिक संपत्तियों को निजी कंपनियों को लीज़ पर देने या बेचने का प्रावधान है। इसमें स्कूल/कॉलेज की भूमि को “non-core asset” मानकर उसका “वाणिज्यिक उपयोग” किया जा सकता है। गैर-प्रमुख परिसंपत्तियां (Non-core assets) वे संपत्तियां होती हैं जो किसी कंपनी/सरकार के मुख्य व्यवसाय या संचालन के लिए आवश्यक नहीं होती हैं। दूसरे शब्दों में, ये वे संपत्तियां हैं जिनका उपयोग कंपनी/सरकार के दैनिक कार्यों में नहीं किया जाता है। ऐसी संपत्तियों को या तो बेचा जाता है या अन्य उपयोगों के लिए बदल दिया जाता है।
राजस्थान, यूपी, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में देखा गया है कि बंद हुए स्कूलों की भूमि पर:
· प्राइवेट स्कूलों/इंस्टीट्यूट की टाउनशिप खुली;
· ‘धर्मस्थल’ या ‘योग सेंटर’ बनाए गए; या फिर
· कंस्ट्रक्शन कंपनियों को परियोजनाएँ सौंप दी गईं
· शिक्षा नहीं, व्यापार चाहिए: भारत में सुनियोजित अशिक्षा और स्कूल संहार की राजनीति
अशिक्षा किसी समाज की दुर्भाग्यवश हुई दुर्घटना नहीं होती — वह सत्ता की सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है।” भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता और न्याय की नींव है। परंतु जब किसी सरकार की प्राथमिकताओं से शिक्षा ग़ायब हो जाए, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, एक खतरनाक संकेत होता है — लोकशक्ति को लोकवंचना में बदलने की साजिश।
21वीं सदी के भारत में, जहाँ सूचना और प्रौद्योगिकी के विकास की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों को योजनाबद्ध तरीक़े से बंद किया जा रहा है, शिक्षकों की नियुक्तियाँ रोकी जा रही हैं, और बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। ये घटनाएँ तात्कालिक संकट नहीं हैं — यह उस नई शिक्षा नीति और उस मानसिकता का हिस्सा हैं, जो देश को बाज़ार और धार्मिक प्रचार की प्रयोगशाला बना देना चाहती हैं।
यह निबंध उस संगठित और बहुस्तरीय विनाश का दस्तावेज़ है जो भारत की शिक्षा, और उसके ज़रिए, भारत के लोकतंत्र को खोखला करने में लगा है। आँकड़े, उदाहरण, नीतियाँ — सब एक ही दिशा में इशारा करते हैं—“शिक्षा नहीं, आज्ञाकारी उपभोक्ता चाहिए।” जब सोचने वाला नागरिक नहीं चाहिए, तब सबसे पहले उसकी पाठशाला जलाई जाती है — कभी आग से, कभी नीति से।
1. सरकारी स्कूल बंदी: संख्या नहीं, साजिश का संकेत:
राजस्थान में 19,500, उत्तर प्रदेश में 27,000, महाराष्ट्र में 15,000, असम में 5,953, कर्नाटक में 3,450 स्कूल बंद किए जा चुके हैं या ‘विलय’ के नाम पर निष्क्रिय किए गए हैं। अकेले यूपी और राजस्थान में करीब 20 लाख से अधिक बच्चों की शिक्षा सीटें छीन ली गई हैं। यह केवल ‘प्रशासनिक सुधार’ नहीं, शिक्षा से वंचित किए गए भविष्य का एक गुप्त ब्लूप्रिंट है।
2. NEP 2020: नीति या विनाश की योजना?
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में एक ओर ‘शिक्षा में नवाचार’ की बात की जाती है, दूसरी ओर शिक्षा पर GDP का खर्च घटाकर 2.9% तक लाया जा चुका है। नीति में ‘स्कूल मर्जर’ का जो प्रारूप अपनाया गया, उसने बच्चों के लिए 5-6 किमी दूर स्कूल भेजने की मजबूरी पैदा की। गाँवों में स्कूल नजदीक होने की जो संवैधानिक व्यवस्था थी, वह समाप्त हो चुकी है।
3. डिजिटल डिवाइड और ‘ऑनलाइन’ शिक्षा का छलावा:
NEP की आड़ में शिक्षा को ऑनलाइन बना दिया गया है। ग्रामीण भारत में आज भी 60% से अधिक परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं है, फिर भी बच्चों को डिजिटल क्लास में भेजने की अपेक्षा की जाती है। यह केवल असंवेदनशीलता नहीं, एक सुनियोजित बहिष्कार है — गरीब, दलित, आदिवासी बच्चे अब शिक्षा की दौड़ से बाहर हैं।
4. स्कूलों की ज़मीन: शिक्षा से लेकर पूंजी तक की यात्रा:
भारत के हजारों स्कूलों की ज़मीनें ग्रामीणों, ग्रामसभाओं और किसान परिवारों द्वारा शिक्षा के नाम पर दान की गई थीं। यह ज़मीनें थीं “सामूहिक भविष्य” की। अब जब स्कूल बंद हो रहे हैं, तो सरकार इन्हें “अवशेष परिसंपत्तियों” के रूप में घोषित कर रही है।
संभावना यही है कि इन ज़मीनों को अब औने-पौने दाम पर अपने चहेते पूंजीपतियों, ट्रस्टों, और बिल्डरों को सौंपा जाएगा।
यह नई लूट है: शिक्षा के नाम पर मिली ज़मीन से मुनाफ़ा कमाने की साज़िश। कई राज्यों में देखा गया है कि स्कूल बंद होने के कुछ वर्षों के भीतर उन्हीं ज़मीनों पर निजी स्कूल, धार्मिक केंद्र या रियल एस्टेट टाउनशिप बन गए। यह जनता के भरोसे की हत्या है।
5. पाठ्यक्रम और विचारधारा: ज्ञान से गौरव की छलांग:
CBSE और NCERT ने अंबेडकर, भगत सिंह, वैज्ञानिक सोच, ग़दर आंदोलन जैसे विषयों को धीरे-धीरे हटाना शुरू कर दिया है। इतिहास अब ‘गौरवगाथा’ है, तर्क अब ‘श्रद्धा’ है, और नागरिक अब ‘भक्त’ है। यह शिक्षा नहीं, वैचारिक री-कंडीशनिंग है।
6. निजी विश्वविद्यालय: डिग्री का बाज़ार, सोच का संहार:
प्राइवेट विश्वविद्यालय और स्कूल महँगी फ़ीस लेकर डिग्री बाँटते हैं। वहाँ शिक्षक नहीं, सेल्समैन होते हैं; छात्र नहीं, ग्राहक। रोजगार की कोई गारंटी नहीं, पर उपस्थिति न होने पर डिग्री रोकी जाती है। यह शिक्षा नहीं, लूट और अपमान का उद्योग है।
7. रोजगार और शिक्षा का टूटता रिश्ता:
B.Ed., M.Ed., PhD धारकों को गेस्ट फैकल्टी के नाम पर ₹15,000 में रखा जाता है। सरकारी पद खाली पड़े हैं, पर भर्ती नहीं होती। शिक्षा अब ‘रोज़गार का अधिकार’ नहीं, सिर्फ़ ‘सर्टिफिकेट की ऊब’ बन गई है।
यथोक्त के आलोक में यह कहना अतिशयोक्ति न होगा — “जब स्कूल बंद होते हैं, तब सिर्फ़ दीवारें नहीं गिरतीं — पूरा समाज भीतर से ढहने लगता है।”
शिक्षा की हत्या दरअसल लोकतंत्र की आत्महत्या है। आज़ादी के बाद पहली बार भारत में शिक्षा को इतना संगठित रूप से बदनाम, खंडित और वंचित किया गया है। स्कूलों की ज़मीनें पूँजीपतियों को सौंपना उस ग्रामीण नागरिक का अपमान है जिसने खेत की ज़मीन दी थी। यह सिर्फ़ ज़मीन नहीं, बल्कि गाँव के बच्चे का भविष्य, लोकतंत्र की जड़, और सामाजिक समरसता की उम्मीद थी — जिसे अब बाज़ार के हवाले किया जा रहा है। इसलिए अब चुप रहना गुनाह है। अब ज़रूरत है एक नई शिक्षा क्रांति की, जो स्कूलों को पुनर्जीवित करे, शिक्षकों को सम्मान दे, और संविधान की उस भावना को साकार करें।
यह संविधान और सामाजिक न्याय की सीधी अवहेलना होगी :
शिक्षा के नाम पर मिली भूमि को पूँजीपतियों को सौंपना उस ग्रामीण नागरिक का अपमान है जिसने स्कूल खुलवाने के लिए खेत की ज़मीन दी थी। यह सिर्फ़ ज़मीन नहीं, बल्कि गाँव के बच्चे का भविष्य, लोकतंत्र की जड़, और सामाजिक समरसता की उम्मीद थी — जिसे अब बाज़ार के हवाले किया जा रहा है।
सरकारी स्कूलों का बंद होना केवल शिक्षा का ही संकट नहीं है, अपितु यह ज़मीन हड़पने का परोक्ष खेल भी है। जिन स्कूलों की इमारतें गिराई जा रही हैं, उनकी ज़मीनें ग्राम समाज या ग्रामीणों द्वारा दी गई थीं। वे ज़मीनें अब “अवशेष” घोषित कर दी जाएँगी और कौड़ी के दाम किसी चहेते बिल्डर या बाबा के ट्रस्ट को सौंप दी जाएँगी, इसमे किसी भी शंका की गुंजाईश नहीं है।
पूंजीवाद का यही तो नया धर्म है — “लोकसेवा की जमीन से मुनाफे की दुकान खोलो।”:
यदि यह रुका नहीं गया, तो भविष्य में स्कूलों की जगह मॉल, आश्रम और प्राइवेट यूनिवर्सिटियाँ होंगी – जहाँ दाखिला नहीं , बस विज्ञापन मिलेगा। मेरा यह संदेह केवल जायज़ ही नहीं, अत्यंत ज़रूरी चेतावनी है।
“जब स्कूल बंद होते हैं, तब सिर्फ़ दीवारें नहीं गिरतीं — पूरा समाज भीतर से ढहने लगता है।”
सरकारी स्कूलों का बंद होना, शिक्षकों की नियुक्ति रोकना, विश्वविद्यालयों को निजी हाथों में सौंपना — ये सब अलग-अलग नीतिगत निर्णय नहीं हैं। यह एक सुसंगठित वैचारिक हमला है — उस ‘समान शिक्षा के संवैधानिक स्वप्न’ पर जिसे बाबा साहेब अंबेडकर, नेहरू और गांधी ने भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे में अंतर्निहित किया था।
आज जब देश भर के सरकारी स्कूल मर्यादा की कब्रगाह बन रहे हैं, और शिक्षा निजी कंपनियों की लूट का ज़रिया बन चुकी है, तब हमें यह समझना होगा कि यह संकट सिर्फ़ शिक्षा का नहीं है — यह संकट भारत के भविष्य का है। अगर आने वाली पीढ़ियाँ प्रश्न नहीं पूछ पाएँगी, सोच नहीं पाएँगी, और सिर्फ़ आज्ञाकारी ‘व्हाट्सएप नागरिक’ बन जाएँगी, तो लोकतंत्र केवल एक मतदान का उत्सव रह जाएगा — उसके भीतर आत्मा नहीं बचेगी। इसलिए अब चुप रहना गुनाह है। अब ज़रूरत है एक नई शिक्षा क्रांति की, जो स्कूलों को पुनर्जीवित करे, शिक्षकों को सम्मान दे, बच्चों को निकटतम और सुलभ ज्ञान उपलब्ध कराए, और संविधान की उस भावना को साकार करे, जो कहती है — “We are a Republic of free thinkers, not rote followers.” ((“हम स्वतंत्र विचारकों का गणराज्य हैं, रटंत अनुयायियों का नहीं।) अगर स्कूल और विश्वविद्यालय खोखले हो गए, तो संसदें भी कभी न भर सकेंगी।





