सड़क, पुल या फिर रेलवे लाइन बिछाते वक्त दुर्घटनाएं होना आम बात है. इस वजह से बहुत से लोग जान भी गवाते हैं. लेकिन, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान थाइलैंड और बर्मा (अब म्यांमार) के बीच बिछाई गई एक रेलवे लाइन बिछाने में जितनी इंसानी जिंदगियां काल के मुंह में समाई, उसे जान आपकी रूह कांप जाएगी. थाइलैंड-बर्मा लिंक रेलवे के इस रेलवे प्रोजेक्ट को पूरा करने में करीब सवा लाख लोग मारे गए. इस लाइन की कुल लंबाई 415 किलोमीटर थी. यानी एक किलोमीटर पटरी बिछाने में 290 लोगों की जान गई. यही वजह है कि इसे ‘डेथ रेलवे’ का ही नाम दे दिया और आज भी ये ट्रैक इसी नाम से जाना जाता है.
डेथ रेलवे का एक हिस्सा अब भी चालू है. इस रेलवे लाइन का निर्माण जापान ने कराया था. सेकेंड वर्ल्ड वार में थाइलैंड और बर्मा पर कब्जा करने के बाद जापान ने अपनी सेना तक रसद पहुंचाने के लिए इसे बनाया था. समुद्री मार्ग से थाइलैंड और बर्मा तक जरूरी सामान पहुंचाने में बहुत खतरा था और इसके लिए जहाजों को 3200 किलोमीटर की समुद्री यात्रा करनी पड़ रही थी. इसी को देखते हुए थाइलैंड के बैंकॉक से बर्मा के रंगून तक रेलवे लाइन बिछाने का फैसला किया.
15 महीने में बनकर हुआ तैयार
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान का सिंगापुर से लेकर बर्मा तक के इलाकों पर कब्जा हो गया था. बर्मा से थाइलैंड और सिंगापुर तक कनेक्टिविटी के लिए उसे एक सुरक्षित मार्ग की आवश्कता ताकि इस इलाके से उसकी पहुंच आसानी से हिंद महासागर तक हो जाए. इसलिए उसने थाईलैंड में नोंग प्लाडुक से लेकर बर्मा के थानबुयाजत के बीच रेल लाइन बिछाने का फैसला किया. 415 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का निर्माण 16 सितंबर 1942 को दोनों छोरों से शुरू हो गया. यह 17 अक्टूबर 1943 को बनकर तैयार हो गया. इसका 111 किलोमीटर हिस्सा बर्मा और बाकी 304 किलोमीटर हिस्सा थाइलैंड में बना.
2.40 लाख लोग लगे काम पर
जापान जल्द से जल्द इस रेलवे लाइन का निर्माण करना चाहता था. लेकिन इस रूट में खतरनाक जंगल, पहाड़ी इलाका और कई नदी और नाले थे. लेकिन जापान हर हाल में इसे बनाना चाहता था. इसलिए रेलवे ट्रैक के निर्माण पर थाईलैंड, चीन, इंडोनेशिया, बर्मा, मलेशिया और सिंगापुर सहित कई एशियाई देशों से करीब 180,000 लोगों को काम पर लगाया गया. इतना ही नहीं मित्र देशों के बंदी बनाए गए 60,000 कैदियों (पीओडब्ल्यू) को भी बर्मा रेलवे लाइन को बनाने में लगा दिया गया.
मारे आधे लोग
रेलवे ट्रैक बनाने में लगे मजदूरों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया. जापानी सेना ने उनसे रात दिन काम कराया. उनके साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया गया. हैजा, मलेरिया, पेचिश, भुखमरी और थकावट ने 16,000 कैदियों के हजारों की संख्या में मजदूरों का जीवन लील लिया.
जापान के दुश्मनों ने इस रेलवे लाइन के निर्माण में बाधा डालने को कई बार हमले किए. इनमें भी बड़ी संख्या में लोग मारे गए. कुल मिलाकर काम पर लगे लोगों में से आधे लोग यानी 1.20 लाख लोग मौत के मुंह में समा गए.





