अग्नि आलोक
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10 बेहतरीन कविता

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काव्य अभिव्यक्ति: होता हैं शैतान*

उज्ज्वला में बाँट दी, गैस चूल्हा घर में
सोचा नहीं जलेगा कैसे, उजाला घर में ?

रोटी, कपड़ा, दाना-पानी हसीं शाम दे दिया
पर जिनें का हाथों में कोई काम ना दिया

गरीबों के घर से अभी भी उठ रहा धुआँ
पैसे बिना शायद ओ सिलेंडर नहीं लिया

आमदनी अठन्नी, महँगाई चरम छू रहीं
‘अच्छे दिन’ में जीने की वहम निकल ग

विधना तोरे देश का अजीब है विधान*
जो बन के आता रहनुमा, होता हैं शैतान ।।

बिमल तिवारी “आत्मबोध”
देवरिया उत्तर प्रदेश


राजा का वरदान

राजा को वरदान है
उसे कोई मार नहीं सकता.
लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी है,
उसे छोटे छोटे घावों से बचना होगा.
इन घावों में अगर चीटियां लग गयी
तो राजा को कोई नहीं बचा पायेगा.

राजा के पैरों तले अनेक चीटियां कुचली जाती
कभी राजा उन्हें गुस्से में कुचलता
कभी प्यार में
और कभी कभी तो यूं ही.

चीटियां परेशान थी
उन्हें राजा के घाव का इंतजार था,
ठीक उसी तरह जैसे सांप के घाव का इंतजार रहता है चीटियों को.

एक दिन राजा ने ऐलान किया कि
उसे एक ही रंग पसंद है
बाकी रंग या तो राज्य छोड़ दे, या अपना रंग फीका कर लें.

राज्य में अफरा-तफरी मच गई
कुछ ने राजा की बात मानते हुए अपना रंग फीका कर लिया,
कुछ ने अपना रंग चटकीला बनाये रखने की भरसक कोशिश की.
और इस जुर्म में जेल भी जाते रहे.
राजा के पैरों तले कुचले भी जाते रहे.

लेकिन कुछ रंग भूमिगत हो गए
राजा के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया
राजा ने भी इनके खिलाफ अपनी पूरी सेना उतार दी.

लेकिन भयानक दमन के बावजूद
विद्रोहियों ने राजा को एक छोटा घाव दे ही दिया
चीटियों को इसी बात का तो इंतजार था.

चीटियों ने पंक्तिबद्ध होकर राजा के घाव पर हमला बोल दिया
राजा और उसके निजी सैनिक
चींटियों को मारते रहे!

लेकिन चींटियों की पंक्ति तो अंतहीन थी
दरवाजे, खिड़की सब बन्द कर दिए गए
लेकिन
कभी रोशनदान से, किवाड़ों की झिर्रियों से, तमाम सुराखों से
चीटियों का संकल्पबद्ध काफिला आगे बढ़ता ही रहा
चीटियां मरती रही,
दूसरी चीटियां मरती चीटियों के ऊपर से आगे बढ़ती रही!
राजा के घाव को गहरा बनाती रही!!
राजा के शरीर का तापमान बढ़ता रहा!!!

और अंत मे राजा यह बुदबुदाते हुए मर गया
कि आखिर राज्य में कितनी चीटियां है????

मनीष आज़ाद


डरे नहीं है हम

उनसे कह दो कि डरे नहीं है हम,
हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम।

बहुत जुनून है मुझमें इस नाइंसाफी के खिलाफ,
सर फिरा है मगर सरफिरे नहीं हैं हम।

बहुत ऊंची पहाड़ है, है फ़तह बहुत मुश्किल,
अभी से हार क्यों माने अगर चढ़े नहीं हैं हम।

तेरे भड़काने से फिरकापरस्त हो जाएं?
तुम्हारी तरह ज़मीर से गिरे नहीं हैं हम।

हिंदू मुस्लिम कर-करके दंगा कराने वालों,
यहां पर खूब शांति है, बहरे नहीं हैं हम।

तेरी सियासत ही मुल्क का माहौल बिगाड़ रहा,
पर हमारी जंग जारी है अभी ठहरे नहीं है हम।

दो कौड़ी के दाम से मेरा जमीर मत खरीदो,
अमानत में खयानत कर बिके नहीं हैं हम।

जम्हूरियत में तानाशाही की चोट ठीक नहीं,
कल भी इंकलाबी थे, अभी सुधरे नहीं हैं हम।

एक रोहित के मौत से हमे खामोश मत समझो,
अब हजार रोहित निखरेंगे बिखरे नहीं हैं हम।

उनसे कह दो कि अभी डरे नहीं है हम,
हारे हैं जरूर मगर मरे नहीं हैं हम।

श्याम पांडे


अतीत की खुदाई

अतीत को न्याय दिलाने वाले
इस ‘राष्ट्रीय खुदाई अभियान’ में
अन्ततः मैं भी शामिल हो गया!

फावड़ा लेकर मैं निकल पड़ा अतीत की ओर…

खोदते खोदते जब मैं थक रहा था
तो अचानक कुछ टकराया,
मैंने जल्दी – जल्दी मिट्टी हटाई
लेकिन यहां किसी मंदिर का अवशेष नहीं
बल्कि एक कंकाल था
कंकाल एक महिला का
मैं बेहद आश्चर्यचकित
क्योंकि महिला की योनि पर ताला जड़ा था.
ताले में भरसक जंग लग गया था
लेकिन वह टूटा नहीं था.
तभी वह दर्द से कराही
मैं डरकर पीछे हट गया
वह अपने आप में कुछ कह रही थी
मैंने कान लगाया
‘मेरी योनि को मुक्त करो’!
इसकी चाभी खोजो और मुझे मुक्त करो!!
मैं पसीने से तरबतर
ये कैसे हो सकता है
सदियों से यह महिला
अपनी योनि पर लगे ताले के खुलने के इंतजार में मरी नहीं है.
घबराकर मैंने खुदाई बन्द कर दी.

दूसरे दिन मैंने दूसरी जगह खुदाई शुरू की
इस बार जब टन्न की आवाज आयी
तो मैं हैरान
यह तो सिर्फ सिर का कंकाल है.
धड़ कहाँ है?
सर के इस कंकाल को जैसे ही मैंने हाथ में लिया.
यह कांपा
और कहीं से बारीक सी आवाज आई
मेरे धड़ को ढूंढो!
बिना उसके मैं कैसे मर सकता हूँ
हमारे सिर को तो पेशवाओं ने फुटबॉल बना कर खेला
धड़ का क्या किया
हमें पता नहीं.
मैंने धड़ की तलाश में चारो तरफ तेज़ी से खुदाई कर डाली
लेकिन हर तरफ सिर का ही कंकाल मिला
फुटबॉल की तरह हिलते डुलते
सदियों बाद भी मरने से इंकार करते.

अचानक मेरी नज़र
कुछ अकड़े काले पड़ गए कंकालों पर पड़ी
ये तो आग में जले मालूम होते हैं
मैं सहमते सहमते उनके नज़दीक गया
मुझे देखते ही उन्होंने करवट बदल ली
अरे, ये भी ज़िंदा हैं!
मैंने साहस करके पूछा
तुम्हारा तो अंतिम संस्कार हो चुका है
फिर तुम ज़िंदा क्यों हो?
उनमें से एक ने लगभग खीझते हुए कहा
हमें अपनी झोपड़ियों में हमारे बच्चों सहित फूंक दिया गया था
मैंने आश्चर्य से पूछा
क्यों?
क्योंकि हमने पहली बार अपने खाने में घी का तड़का लगाया था!
दक्षिण टोले से जाने वाली घी की महक उन्हें बहुत नागवार गुजरी!
क्योंकि घी के स्वाद पर उनका ही अधिकार था
इसलिए खाने से पहले ही हमें जला दिया गया!
हम अभी भी भूखे हैं
तो फिर मर कैसे सकते हैं?
मैं पसीने से तरबतर वहां से भागा..
मुझे लगा मैं पागल हो जाऊंगा…

लेकिन कुछ दिनों बाद
इन सबको दिमाग से निकाल कर
मैंने फिर खुदाई शुरू की
इस बार एक जर्जर हवेली की खुदाई करते हुए
मुझे उसकी नींव में एक के ऊपर एक कई साबुत कंकाल मिले.
वे भी मरे नहीं थे, बल्कि कराह रहे थे
उन्होंने फुसफुसा कर मुझसे कहा
इस महल को बनाते हुए हम इसी में दब गए
इसकी नींव हो गए.
राजा ने महल की सुरक्षा का वास्ता देकर
हमारे परिवार वालों को यहां आने से रोक दिया.
बिना अंतिम संस्कार, हम मर कैसे सकते हैं?

मैं वहां से भी जान बचाकर भागा
अंततः एक खुले मैदान की मैंने खुदाई शुरू की
रात भर खुदाई के बाद जब मैं पस्त हो चुका था.
तो अल्लसुबह जो मैंने देखा
उसने मेरे होश उड़ा दिये.
यहां वहां बिखरे थे हज़ारों कंकाल
लेकिन कोई साबुत नहीं था.
किसी की टांग गायब थी, किसी का हाथ
और किसी की आंख
मुझे आश्चर्य हुआ, कि ये भी मरे नहीं हैं!
सब कसमसा रहे हैं
मानो मिट्टी का बोझ हटने से
अब उठना चाह रहे हों
उनमें से किसी एक ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा
‘अंधायुग’ में हम जिस राजा के ख़िलाफ़ लड़े
उसे तो हम नहीं ही जानते थे
लेकिन जिस राजा के लिए लड़े, उसके बारे में भी हमें कहां पता था!
विजयी और पराजित राजा
दोनों ने संधि की
और हमे छोड़कर चले गए.
हम अपने परिवार वालों के इंतजार में
अभी भी मरने का इंतजार कर रहे हैं
क्या तुम उन्हें इत्तिला दे सकते हो?

मैं परेशान
कि यह सब क्या हो रहा है
कहीं यह कोई दुःस्वप्न तो नहीं है
अतीत इस कदर ज़िंदा कैसे है!

मैंने फावड़ा फेंका
और हताश होकर समुद्र में छलांग लगा दी
जब सांस रोके समुद्र की गहराई में गोते लगाता
तलछट पर पहुँचा
तो यहां भी आश्चर्य ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा
मैंने जो देखा, वह भयावह था!
कल्पना से परे था!
समुद्र की तलहटी पर लाखों कंकाल बिछे हुए थे…
इनके न सिर्फ हाथ और पैर बंधे थे
बल्कि वे एक दूसरे से भी बांधे गए थे!

मुझे समझते देर न लगी
जरूर गुलाम विद्रोह के कारण इनके जहाज डूबे होंगे
मैंने सोचा कि पानी मे तो निश्चित ही ये मर चुके होंगे.
लेकिन मैं यहां भी गलत था
नज़दीक पहुँचने पर मैंने देखा कि वे हिल रहे हैं
उन्हें लहरे हिला रही हैं या वे खुद हिल रहे हैं!

पता नहीं
लेकिन मुझे देखते ही
सभी कमज़ोर आवाज में, मगर एक स्वर में बोलने लगे
‘संकोफ़ा, संकोफ़ा…’
मैं समझ गया
ये मुझे सुदूर अतीत में भेजकर
अपने लिए कुछ मंगाना चाहते हैं
ताकि अपनी यातनादायी बेड़ियां तोड़ सकें!
मुक्त होकर एक दूसरे के गले लग सकें!!
और चैन से मर सकें!!!
या अफ्रीकी मुहावरे में कहें तो चैन से जी सकें!

अब मेरी सांस घुटने लगी थी
मुझे अतीत से बाहर आना ही पड़ा
समुद्र के ऊपर आकर लम्बी लम्बी सांस भरकर

मैं सोचने लगा
अतीत तो सचमुच ज़िंदा है, पूरी तरह ज़िंदा!
ठीक हमारी ही तरह
और न्याय के इंतजार में है
ठीक हमारी ही तरह…..

मनीष आज़ाद


धर्म

जो आदमी पहला होता है
जो रास्ता बनाता है
जो संघर्ष करता है
स्वभाविक है
उसके अनुभव बड़े अदभुत रहे होंगे

अब रास्ता बन गया
और जो लोग इसपर चलेंगे
उनके अनुभव पहले वाले आदमी जैसे नहीं रहेंगे
उनकी जिंदगी में वो संघर्ष नहीं आएगा
उनके अनुभव अदभुत नहीं रहेंगे
वो जीवन का गहन आनंद नहीं ले पाएंगे

उनकी जिंदगी में तो आराम होगा
उनके अंदर की शक्तियां कभी नहीं जगेंगी
वो जिंदगी भर एक डुप्लीकेट कॉपी की तरह जियेंगे
आप समझ पा रहे होंगे
कि क्यों आजतक दूसरा अम्बेडकर नहीं पैदा हुआ
क्यों दूसरा बुद्ध पैदा नहीं हुआ
जबकि लाखों लोग उनकी जय जयकार कर रहे हैं

वस्तुतः रास्ता दिखाने वाला ही
मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है
दूसरों को रास्ता दिखाने मात्र में ही
वह उन्हें भटका देता है

भटका देता है
या यूं कहिए लोग भटक जाते हैं
वह कुछ ऐसी लकीरें खींच जाता है
जो कभी नहीं मिटती ही नहीं
लोग इन लकीरों को हमेशा पीटते रहते हैं
इसका मुख्य कारण यह है
कि एक का अनुभव दूसरे तो स्थानांतरित नहीं हो सकता
हर एक को ताजा बनाना होगा
और ताजा खाना होगा

जो आदमी झुंड का हिस्सा बन गया
वो फिर कभी अकेला नहीं चल पाएगा
भीड़ का हिस्सा बनने से
अकेला होने का डर सताने लगता है
और अदभुत रास्तों पर कभी भीड़ नहीं चलती
भीड़ तो सिर्फ अनुसरण करती है
और अनुसरण में जीवन खत्म हो जाता है

जीवन हर क्षण एक अन्वेषण है
एक उत्सुकता है
एक जिज्ञासा है
लेकिन धर्म ये सारी जिज्ञासा खत्म कर देता है
क्योंकि वह कहता है
कि जो ग्रंथ में लिख दिया
जो गुरु ने कह दिया
बस वही करना है
वही दोहराना है
यानी आपको हमेशा बासी खाना खाना है

नया नहीं सोचना
जो भीड़ को तोड़कर नई दिशा में चला गया
वह अधर्मी है
आप किसी ग्रंथ या गुरु पर कोई नई बात नहीं कह सकते
आपको बस मानना है
आपको जो कह दिया गया
उसको अपने जीवन में उतारना है

अब दूसरे के अनुभव आप
अपनी जिंदगी में कैसे उतार सकते हो
हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रुटि यही है
कि हमें प्रवचनों, कीर्तनों,
यहां तक सारी शिक्षा में
दूसरों के अनुभवों को निगलने के लिए कहा जाता है

जबकि सच्चाई यह है
कि आप जीवन में अनुसरण करने के लिए नहीं बने
आप सिर्फ नेतृत्व करने के लिए बने हो
जीवन एक अनुकरण नहीं
बल्कि एक खोज है
और धर्म हमेशा खोज के विरुद्ध खड़ा है
वो कहता है
आपको कुछ नहीं करना
क्योंकि हर चीज पहले से निश्चित है

हर चीज उसकी मर्जी से होती है
और जब उसी की मर्जी चलनी है
तो आपकी मर्जी कोई मायने नहीं रखती
इस तरह का भाग्यवादी आदमी
अपनी गरीबी, लाचारी, बीमारी को भगवान के नाम पर
सहर्ष स्वीकार कर लेता है

धर्म के सारे सिद्धान्त जीवन के विरुद्ध है
ये सिद्धान्त जीवन में उल्लास नहीं पैदा करते
ये मायूसी पैदा करते है
यही कारण है
धर्म और धार्मिक लोगों का आपको जीवन को
कोई योगदान नजर नहीं आएगा

जोगा सिंह


सवाल ही सवाल है

कोपरनिकस ने
सबसे पहले सवाल किया था
उसे देश छोड़ कर भागना पड़ा
ब्रूनो ने
जोरदार सवाल किया
उसे जिंदा जला दिया गया
गैलीलियो ने
सवाल उठाया
उसे फाँसी की सजा सुनाई गई
जूलियस फ़्यूचीक ने
विरोधात्मक सवाल किया
उसे फाँसी दी गई
बिस्मिल, लाहड़ी,
रोशन, अशफाक
भगत सिंह, सुखदेव,
राजगुरु खुद सवाल बन गए
उन्हें भी फाँसी दी गई
दाभोलकर सवाल थे
पानसरे सवाल थे
कलबुर्गी सवाल थे
गौरी लंकेश सवाल थी
सब मारे गए
आम्बेडकर
आज भी उनकी छाती पर सवाल हैं
सुधा भारद्वाज, वरवरा राव,
गोंजाल्विस, गौतम नवलखा,
आनंद तेलतुंबड़े, रतन लाल
सवाल ही सवाल हैं
निर्देश सिंह सवाल हैं
आर डी आनंद भी सवाल हैं
सवाल न होता
तो दिन न होता
रात न होती
सुबह न होता
शाम न होती
हम न होते
आप न होती
हर तरफ सवाल है
कि इंकलाब चाहिए
इंकलाब ज़िंदाबाद
ज़िंदाबाद इंकलाब।

आर डी आनंद


एका तुकबन्दी समझा जाइ

कइसा हिंदुस्तान होइ गवा
मजहब के दूकान होइ गवा
गाजर मूली जइसे मनई
पाथर तौ भगवान होइ गवा
जब से आइ आवारा बादल
सावन भी बेइमान होइ गवा
अइसी बही बिकास के गंगा
मंत्री सुत धनवान होइ गवा
चारिउ ओर मची बा भौं भौं
देखौ, मानुष श्वान होइ गवा
कौआ वेद पुरान पढ़ावै
हंसा तौ नादान होइ गवा
जब से ठग कुर्सी पे बैठा
बेआबरू किसान होइ गवा
मारौ मारौ! काटौ काटौ!
इहै राष्ट्र के गान होइ गवा
गोबर बोला सुन बे चंदन
तू कबसे गुनवान होइ गवा?

मोहन लाल यादव


विश्वगुरु बनने का खेल

आओ खेलें ऐसा खेल,
जहां न हो कोई मेलजोल,
न हो किसी का किसी से मेल,
बैलगाड़ी लाओ,हटाओ रेल,
सबका सबसे झगड़ा हो,
रात-दिन सबका रगड़ा हो,
मारपीट और दंगा हो,
फिर भी सब कुछ चंगा हो,
कहीं कोई न घर रहेगा,
हर कोई बेघर रहेगा,
समाजवाद ऐसा लाएंगे,
सबको भूखे सुलाएंगे,
सब कोई होगा बेरोजगार,
होंगे सारे बच्चे होनहार,
ना स्कूल , न होगी शिक्षा,
मांगेगा अब हर कोई भिक्षा,
एक कटोरा सबके हाथ,
देगा सबको जगन्नाथ,
ना कोई चिंता ना कोई फिकर,
ना कोई किसी का जिकर,
रहेगा अब सब कोई निफिकर,
हरिनाम का होगा जाप,
नहीं होगा कोई संताप,
सामने सदा होंगे भगवान,
होंगा हम सबका कल्याण,
नंगे, भूखे बिलबिलाएंगे,
कीच लगी आंख मटमटाएंगे,
दिन-रात प्रभु गुण गाएंगे,
सीधे बैकुंठ को जाएंगे,
बात-बात में, जात-जात में,
थप्पड़, घुस्सा, लात-लात में,
कर लेंगे हम सिरफुटव्वल,
जो पीटा वह होगा अव्वल,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई,
सब के सब ही होंगे कसाई,
कोई किसी का सर काटेगा,
कोई किसी का धन बांटेगा,
समाजवाद का नारा होगा,
हर कोई थका और मारा होगा,
रामनाम की होगी लूट,
लूटेगा वह होगा संत,
सबसे बड़ा होगा महंत,
सिंहासन पर होगा विराजमान,
प्रभु होंगे उन पर मेहरबान,
हम विश्वगुरु बन जाएंगे,
और विश्वशक्ति कहलाएंगे।

राम अयोध्या सिंह


इन्सान और कुत्ता

जंगल में जहां खुली जगह थी
वहां सभी जानवर इकठ्ठे हुए
सबने अपना परिचय दिया
कुत्तों ने कहा….हम कुत्ते हैं
उनमें कई कदकाठी के
कई काले सफेद भूरे
लेकिन सबने कहा हम कुत्ते हैं….
फिर भेड़ें आई
वे भी छोटी बड़ीं काली सफेद
सब बोलीं हम भेड़ें हैं
सबने अपना परिचय बारी बारी से दिया
भेड़िए और शेर ने कहा
कि ये जो हमसे अलग आदमी हैं
सब यकसां हैं
अपने को इन्सान नहीं कहते
जैसे हम सब भांति भांति के जानकार हैं
कुत्ते हैं तो कुत्ते हैं
शेर हैं तो शेर हैं
इन इन्सानों को क्या हो गया
ये ख़ुद को इन्सान नहीं कहते
हिन्दू मुस्लिम करते हैं
कुत्ते भी आपस में नहीं ऐसे लड़ते
जितने ये लड़ मरते हैं…
एक बूढ़ा गधा बोला..
सुनो भाईयो… इस दुनिया में आए हो
आज़ाद रहो
मेहनत करके खाओ
पर इन्सानों सा मत बनना
इनको हिन्दू मुस्लिम करने दो
आपस में लड़ मरने दो।

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से प्राप्त


दुनिया बदल रही है

दास दासियों से घिरा
छप्पन भोग का आनन्द लेता राजा
सोचता था कि
दुनिया हमेशा ऐसी ही रहेगी
लेकिन चाबुक और लगान से दोहरा हुआ किसान
सोचता था कि दुनिया बदलनी ही चाहिए..

गुलामों के मालिक कुत्तों के साथ
गुलामों पर निगरानी रखते
और सोचते कि दुनिया हमेशा ऐसी ही रहेगी
लेकिन जलते सूरज
और मालिक के कोड़े की मार पीठ पर लिए
खेतों से कपास चुनते गुलाम
सोचते थे कि दुनिया बदलनी ही चाहिए..

मजदूरों को मशीन में डालकर
उसका रस चूसने वाला पूंजीपति
सोचता है कि दुनिया ऐसी ही रहेगी
लेकिन पूंजीपति के लिए
कच्चा माल बनने से इंकार करता मजदूर
भविष्य का सपना देखता मजदूर
सोचता है कि दुनिया बदलनी ही चाहिए..

स्त्री को फूली रोटी और
बिस्तर की सलवट समझने वाला मर्द,
स्त्री से उसके सारे रंग छीनने वाला पुरूष
सोचता है कि दुनिया ऐसी ही रहेगी
लेकिन दुनिया को विविध रंगों से रंगने का ख्याल लिए स्त्री
सोचती है कि दुनिया बदलनी ही चाहिए

और दुनिया बदल रही है,
निरंतर बदल रही है!
किसी के सोच के इंतज़ार में नहीं
बल्कि भविष्य के बच्चों की खिलखिलाहट देखने की चाहत में
दुनिया लगातार बदल रही है…

मनीष आज़ाद

Ramswaroop Mantri

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