राष्ट्रगीत वंदे मातरम् लगातार चर्चा में बना हुआ है. पिछले साल 8 दिसम्बर को राष्ट्रगीत ने 150 साल पूरे किए. फिर संसद में वंदे मातरम् पर बहस हुई. गणतंत्र की परेड में वंदे मातरम् की थीम वाली झांकी निकाली गई. और अब केंद्र सरकार ने देश के राष्ट्रगीत पर नई गाइडलाइन जारी की है. इस दौरान खड़े होना अनिवार्य होगा और इसकी अवधि 3 मिनट 10 सेकंड रहेगी.राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर केंद्र सरकार ने नई गाइडलाइन जारी की है. यह पहली बार है जब देश में राष्ट्रगीत के गाने के तरीके को लेकर प्रोटोकॉल जारी किया गया है. वंदे मातरम् को 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, लेकिन यह राष्ट्रगान नहीं बन पाया. इसके कई कारण गिनाए गए. जानिए, वंदे मातरम् राष्ट्रगान क्यों नहीं बन पाया.
गाइडलाइन के मुताबिक, राष्ट्रगीत के सभी 6 पैरा गाने होंगे. अब तक पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे. यह पहली बार है जब देश में राष्ट्रगीत के गाने के तरीके को लेकर प्रोटोकॉल जारी किया गया है. वंदे मातरम् को 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रगीत का दर्जा दिया. आजादी की जंग के दौर में बंकिंम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारियों का मंत्र बना था, जिसने लोगों को एकजुट किया
वंदे मातरम् क्यों नहीं बना राष्ट्रगान?
वंदे मातरम् के साथ विवाद भी जुड़े. साल 1870 में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसकी रचना की और 1882 में प्रकाशित हुआ. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार साल 1896 में इसे गाया. उसी दौर में इसके विरोध की शुरुआत हुई. विरोध की वजह थी इसके वो शब्द जिसमें हिंदू देवी का जिक्र किया गया था. विरोध करने वाले मुस्लिम नेताओं का कहना था कि इस गीत में देवी का जिक्र है. देवी की वंदना मूर्ति पूजा से जुड़ी है यह इस्लाम के विरुद्ध है. गीत में देश को देवी दुर्गा के रूप में बताया गया है. उन्हें रिपुदलवारिणी यानी दुश्मनों का संहार करने वाला कहा गया है.
इस विवाद का समाधान करने के लिए एक समिति बनाई गई थी. समिति में सभी के पक्ष सुने और इस नतीजे पर पहुंची कि इस गीत के शुरुआती दो पद मातृभूमि की प्रशंसा में हैं और बाद में हिन्दू देवी का जिक्र किया गया है. इसलिए इस गीत के शुरुआती दो अंतरों को ही गाया जाए.

वंदे मातरम् फुल वर्जन.
ये तर्क भी गिनाए गए
वंदे मातरम् की लम्बाई ज्यादा थी. गीत की धुन और लय सैन्य बैंड, राजकीय समारोह जैसे मौकों पर गाना थोड़ा कठिन माना गया. वहीं, जन गण मन, वंदे मातरम् के मुकाबले सरल, संतुलित और औपचारिक धुन वाला था. पंडित नेहरू के विचार वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बनाने के पक्ष में नहीं थे.
21 मई, 1948 को कैबिनेट को भेजे गए एक नोट में पंडित नेहरू का मानना था कि वंदे मातरम् की तुलना में जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में अपनाना अधिक उपयुक्त है. उन्होंने जो लिखा वह इस प्रकार है- राष्ट्रगान बेशक शब्दों का एक रूप है, लेकिन उससे कहीं अधिक यह एक धुन या संगीत रचना है. इसे ऑर्केस्ट्रा और बैंड द्वारा अक्सर बजाया जाता है और बहुत कम ही गाया जाता है. इसलिए राष्ट्रगान का संगीत सबसे जरूरी फैक्टर है. यह जीवंत और गरिमामय होना चाहिए और इसे बड़े और छोटे ऑर्केस्ट्रा, सैन्य बैंड और पाइप द्वारा प्रभावी ढंग से बजाया जा सके. इसे न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी बजाया जाना चाहिए. यह ऐसा होना चाहिए जिसे इन दोनों स्थानों पर व्यापक रूप से सराहा जाए.
जन गण मन… इन मानदंडों को पूरा करता हुआ प्रतीत होता है. वंदे मातरम अपनी सारी सुंदरता और इतिहास के बावजूद ऑर्केस्ट्रा या बैंड द्वारा बजाने के लिए आसान धुन नहीं है. इसमें वे विशिष्ट विशेषताएं नहीं हैं जो जन गण मन में हैं. यह भविष्य में हमारी आकांक्षाओं की पूर्ति की अपेक्षा हमारे संघर्ष के काल को बहुत सच्चाई से दर्शाता है.
राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान में क्या है अंतर?
राष्ट्रीय गीत एक देशभक्ति गीत होता है जिसे किसी देश की सरकार द्वारा सार्वजनिक या राजकीय अवसरों पर गाने के लिए अपनाया जाता है. वहीं, राष्ट्रगान एक संगीतमय रचना है, जो किसी देश के इतिहास, परंपरा और संघर्षों को परिभाषित करती है. इसे या तो देश की सरकार द्वारा या जनता द्वारा पारंपरिक उपयोग के माध्यम से मान्यता दी जाती है और अपनाया जाता है. दोनों के प्रोटोकॉल में अंतर भी होता है.
वंदे मातरम् की कौन सी लाइनें विवादित बताकर हटाई गई थीं
देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर केंद्र सरकार ने नई गाइडलाइन जारी की है. नई गाइडलाइन में वो शब्द भी हैं जिन पर आजादी से पहले विवाद हुआ था और फिर राष्ट्रगीत के शुरुआती दो पैरा को ही गाने पर सहमति बनी थी. जानिए, वंदे मातरम् की कौन सी लाइनें हटाई गई थीं जो जोड़ी गईं और क्यों उठा था विवाद.
देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् पर केंद्र सरकार ने नई गाइडलाइन जारी की है. नए दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और आयोजनों में वंदे मातरम् गाया जाएगा. अगर राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन गण मन साथ में गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम् को गाया जाएगा. नए नियमों के अनुसार, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे. इनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकंड है. अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे.
इसकी वजह वो विवाद था जो आजादी से पहले उठा था और तय किया गया कि इसके 2 अंतरे गाए जाएंगे. जानिए, कौन सा अंतरा हटाया गया था, क्या तर्क दिए गए थे, पूरे मामले की जांच करने वाली कमेटी ने क्या तय किया गया था.

कैसे उठा था विवाद?
बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम् की रचना की थी. उन्होंने अपने संस्कृतनिष्ठ बांग्ला उपन्यास आनंदमठ में इस गीत का जिक्र किया. इस गीत में मातृभूमि और इसकी महानता का वर्णन है. साल 1870 में वंदे मातरम् लिखा गया और साल 1882 में प्रकाशित हुआ. शुरुआती दौर में यह गीत बंगाल में आजादी के आंदोलन में में गाया जाता था. धीरे-धीरे यह पूरे हिन्दुस्तान में गाया जाने लगा. खुद मोहम्मद अली जिन्ना इस गीत को पसंद करते थे.

बंकिम चंद्र चटर्जी (फाइल फोटो)
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने साल 1896 में पहली बार इसे गाया. उसी दौर से इसका विरोध शुरू हुआ. विरोध की वजह थे वो शब्द जिसमें देवी का जिक्र किया गया था. मुस्लिम नेताओं का तर्क था कि इस गीत में देवी का वर्णन है. यह मूर्ति पूजा का हिस्सा है और इस्लाम में यह नामंजूर है. तर्क यह भी दिया गया कि वंदे मातरम् में देश को देवी दुर्गा के रूप में दिखाया गया है. देवी दुर्गा यानी रिपुदलवारिणी जिन्हें दुश्मनों का संहार करने वाला कहा गया.
हिन्दू देवी पर लिखी ये लाइनें बनी थीं विवाद की वजह
कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धेत खरकरवाले,
के बॉले मां तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम्।। 3।।
तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वम् हि प्राणाः शरीरे, बाहुते तुमि मां शक्ति,
हृदये तुमि मां भक्ति, तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे।
वन्दे मातरम् ।। 4।।
त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलाम् अमलाम् अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्।
वन्दे मातरम् ।। 5।।
कमेटी ने क्या कहा?
मुस्लिमों का विरोध बढ़ने पर कांग्रेस ने 1937 में एक कमेटी बनाई. उस कमेटी में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और पंडित जवाहरलाल नेहरू को शामिल किया गया ताकि विवाद को सुलझाया जा सके.
समिति का कहना था कि इस गीत के शुरुआती दो अंतरे मातृभूमि की प्रशंसा में लिखे गए हैं बाद के अंतरे हिन्दू देवी-देवताओं पर हैं. इसलिए फैसला किया गया था कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में गाया जाए.
इस गीत वो अंश हटाए जाने के बाद भी मुस्लिम लीग के नेता संतुष्ट नहीं हुआ. मोहम्मद अली जिन्ना ने 17 मार्च, 1938 को पंडित नेहरू से इसे पूरी तरह त्यागने का अनुरोध किया. मुंबई (तब बंबई) में महात्मा गांधी से भी यही मांग की. तमाम विवादों के बावजूद आजादी के बाद 1950 में वंदे मातरम् देश का राष्ट्रगीत बना. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने का वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया.






Add comment