इंदौर
मध्य प्रदेश चुनाव के जीत में सबसे अहम किरदार निभाती हैं मालवा-निमाड़ की सीटें। प्रदेश में 230 में से 66 सीटें इसी क्षेत्र में आती हैं। देखा जाए तो इन 66 में से अधिकतर सीटें जीतने वाली पार्टी सत्ता में आती है लेकिन यहां 17 सीटें जहां कांग्रेस बरसों से जीत के लिए तरस रही है। इनमें इंदौर शहर की भी 3 सीटें हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह खुद ऐसी लगातार हार वाली कई सीटों का दौरा कर चुके हैं। कुछ सीटें तो ऐसी हैं जहां 7-7 बार से बीजेपी के विधायक बन रहे हैं। कांग्रेस ने हर संभव कोशिश की लेकिन बीजेपी के गढ़ को भेजने में कामयाब नहीं हो सकी।
जानिए सिलसिलेवार उन सीटों के बारे में…
धार शहर – इस सीट पर 2003 से बीजेपी का कब्जा है, तब बीजेपी के जसवंत सिंह राठौर ने कांग्रेस के करण सिंह पवार को हराया था। इसके बाद 2008 में बीजेपी की नीना विक्रम वर्मा ने एक वोट से कांग्रेस प्रत्याशी बालमुकुंद सिंह गौतम को हराकर जीत हासिल की। मामला कोर्ट में पहुंचा और बाद में एक महीने के लिए बालमुकुंद सिंह गौतम विधायक बने। नीना वर्मा तीन बार की विधायक हैं।
मंदसौर शहर – ये सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है। 2003 में बीजेपी के ओमप्रकाश पुरोहित ने कांग्रेस के नवकृष्ण पाटिल को हराया था, तब से लगातार बीजेपी ये सीट जीत रही है। 2008 से बीजेपी के यशपाल सिंह सिसौदिया यहां से तीन बार के विधायक है। 2018 में उन्होंने कांग्रेस के पूर्व मंत्री नरेंद्र नाहटा को हराया था।
नीमच – 2003 से ये सीट बीजेपी के पास है। तब भाजपा उम्मीदवार दिलीप सिंह परिवार ने कांग्रेस विधायक नंदकिशोर पटेल को हराया था। 2008 में बीजेपी के खुमानसिंह शिवाजी विधायक रहे। उनके बाद दो बार से 2013 और 2018 में लगातार दिलीप सिंह परिहार विधायक है। कांग्रेस को आखिरी बार 1998 में ही यहां जीत मिली थी।
उज्जैन दक्षिण – 2003 में बीजेपी उम्मीदवार शिवनारायण जागीरदार यहां से जीते और तब से लगातार बीजेपी ये सीट जीत रही है। 2008 में भी जागीरदार ही विधायक बने। 2013 और 2018 में बीजेपी के डॉ.मोहन यादव ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराया। 1998 में कांग्रेस की प्रीति भार्गव विधायक बनी थी।
पंधाना – खंडवा जिले की पंधाना सीट 2003 से बीजेपी के पास है। तब बीजेपी के किशोलीलाल वर्मा ने कांग्रेस विधायक हीरालाल सिलावट को हराया था। 2008 में बीजेपी के अनार भाई वास्कल ने चुनाव जीता। 2013 में बीजेपी की योगिता नवलसिंह बोरकर विधायक बनी। 2018 में भी भाजपा प्रत्याशी राम दांगोरे ने चुनाव जीता। 1998 के बाद से कांग्रेस इस सीट पर नहीं जीती है।
महू – 2008 से ये सीट बीजेपी के पास है। कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेस प्रत्याशी अंतरसिंह दरबार को चुनाव हराया था। 2013 में भी विजयवर्गीय यहां से विधायक बने। 2018 में बीजेपी की उषा ठाकुर ने चुनाव जीता। 2003 में कांग्रेस के अंतर सिंह दरबार विधायक रहे थे।
शुजालपुर – शाजापुर जिले की ये सीट 2003 से बीजेपी के कब्जे में है, तब बीजेपी उम्मीदवार कुंवर फूल सिंह मेवरा ने कांग्रेस विधायक केदार सिंह मंडलोई को चुनाव हराया था। 2008 और 2013 में बीजेपी के जसवंत सिंह हाडा विधायक बने। 2018 में बीजेपी के इंदर सिंह परमार ने कांग्रेस प्रत्याशी को चुनाव हराया था।
बागली – देवास जिले की ये सीट वैसे बीजेपी का गढ़ मानी जाती है। 2003 में बीजेपी के दीपक कैलाश जोशी ने कांग्रेस प्रत्याशी को चुनाव हराया था। उनके पिता भी इस सीट से विधायक बने। फिर 2008 और 2013 में बीजेपी के चंपालाल देवड़ा विधायक बने। 2018 में बीजेपी उम्मीदवार पहाड़सिंह कन्नौज ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराया। 1998 में इस सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी को जीत मिली थी।
खातेगांव – देवास जिले की इस सीट पर 1998 में बीजेपी के बृजमोहन बद्रीनारायण ने कांग्रेस प्रत्याशी विधायक कैलाश पप्पू कुंडल को चुनाव हराया था। इसके बाद 2003 और 2008 में भी बीजेपी के बृजमोहन धूत विधायक बने। 2013 और 2018 में बीजेपी ने आशीष गोविंद शर्मा को टिकट दिया और वे भी लगातार दो बार से विधायक हैं। आशीष शर्मा के पिता भी इस सीट से 1990 में विधायक रह चुके हैं।
ये सीटें दो बार से जीत रही बीजेपी
वहीं ऐसी भी कई सीटें है, जो बीजेपी लगातार दो बार से जीत रही है और ये भी कांग्रेस के लिए चुनौती बनी हुई है। इसमें रतलाम शहर, रतलाम ग्रामीण, जावरा, महिदपुर आदि सीटें शामिल हैं। इनमें सेंध लगाने के लिए कांग्रेस रणनीति बनाने में जुटी है और प्रत्याशियों के चयन में भी यहां विशेष ध्यान कांग्रेस रख रही है।
यहां मिल रही है बीजेपी को कांग्रेस से चुनौती
दूसरी तरफ कांग्रेस के गढ़ में भी बीजेपी को जीत का परचम लहराने के लिए जमकर पसीना बहाना पड़ रहा है। लेकिन इसके बावजूद भी सफलता नहीं मिल रही है। राऊ सीट से कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी, गंधवानी से उमंग सिंघार, राजपुर सीट से बाला बच्चन, झाबुआ से कांतिलाल भूरिया, कसरावद सीट से विधायक सचिन यादव, सोनकच्छ विधायक सज्जनसिंह वर्मा, कुक्षी विधायक सुरेंद्र सिंह हनी बघेल आदि नेताओं ने यहां कभी भी बीजेपी को अंगद के पैर की तरह जमने का मौका नहीं दिया।




