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*193 वर्ष पुराना है इंदौर के राजवाड़ा का महालक्ष्मी मंदिर, मल्हारराव द्वितीय ने कराया था निर्माण*

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राजवाड़ा, इंदौर के सामने स्थित महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना 1832 में मल्हारराव होलकर द्वितीय ने की थी। 1933 की आग में मंदिर जल गया, पर मूर्ति सुरक्षित रही। 1942 और 2014 में जीर्णोद्धार हुआ। यह व्यापारियों व श्रद्धालुओं का आस्था केंद्र है, जहां दीपावली और नवरात्र पर विशेष उत्सव होते हैं

राजवाड़ा इंदौर की शान के रूप में नगर में होलकर राजाओं के कार्यकाल में बनकर तैयार हुआ था। इसके ठीक सामने किसी समय कोई भवन नहीं थे उस वक्त कृष्णपुरा का राम मंदिर और कान्ह नदी तक का विहंगम दृश्य दिखाई देता था। बाद में बोझांकेट माकेट और छत्रियां निर्मित हुईं। राजबाड़ा के सामने दाईं ओर भारतीय स्टेट बैंक (किसी समय स्टेट बैंक ऑफ इंदौर) के पास कॉर्नर पर देवी महालक्ष्मी का मंदिर नगर के जनमानस की आस्था का केंद्र है। महालक्ष्मी के पूजन की परंपरा महाराष्ट्र में अधिक है। इंदौर को बसाने वाले होलकर राजा भी महाराष्ट्र के थे। उन्होंने शहर का भंडार धन-धान्य से भरपूर रहे, इसलिए राजवाड़ा के सम्मुख महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना की गई थी। तब से आज तक यह मंदिर शहरवासियों का श्रद्धा केंद्र बना हुआ है। 

193 वर्ष पूर्व 1832 में राजवाड़ा के सामने महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना मल्हारराव होलकर द्वितीय (1811-1833) के कार्यकाल में हुई थी। 1818 में मंदसौर संधि के बाद इंदौर होलकर रियासत की राजधानी बना। राजधानी बनने के बाद नगर में रियासत के कार्यालय, राज्य के अधिकारियों की बैठकें राजवाड़ा में होने लगी थी, आरंभ के दिनों में  महालक्ष्मी मंदिर एक पुराने मकान में था। राजधानी बनने के बाद नगर में कई भवनों के साथ मंदिर भी निर्मित किए गए थे, तभी यह मंदिर नया बनाया गया।

1933 में जल गया था मंदिर 
राजवाड़ा के महालक्ष्मी मंदिर में कमल पर लक्ष्मीजी विराजित हैं, सुखसमृद्धि के गज (हाथी) स्थापित हैं। मंदिर में हनुमान जी, शिव, गणेश रिद्धि-सिद्धि सहित मां लक्ष्मी विराजित हैं।  1933 में हुए अग्निकांड में यह मंदिर जल गया था। लेकिन, माताजी की प्रतिमा सुरक्षित बचाकर अन्य स्थान पर सुरक्षित रखवा दी गई थी।

मंदिर का जीर्णोद्धार  
1942 में यशवंतराव होलकर द्वितीय (1926-1948) के कार्यकाल में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। आजादी के बाद 2014 में भी मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर में लाल पत्थर राजस्थान के किशनगढ़ से बुलवाए गए। दुकानों को तल मंजिल में स्थान दिया गया और मंदिर को इस तरह निर्मित किया गया कि मंदिर के स्वरूप में दिखे। महालक्ष्मी की मूर्ति इस तरह विराजित की गई कि सड़क से ही हर आने जाने वाले को देवी के दर्शन सहज हो जाते हैं। देवी अहिल्या खासगी ट्रस्ट इस मंदिर का संचालन करता है।

भक्तों की आस्था का केंद्र
रियासत काल में राजबाड़े में कार्य करने वाले कर्मचारी कार्यालय जाने से पहले लक्ष्मी जी के मंदिर दर्शन के लिए जाया करते थे। राज परिवार के सदस्य भी देवीजी के दर्शन के लिए आया करते थे। नगर का व्यापारिक क्षेत्र आसपास होने के कारण व्यापारी भी अपना दैनिक कार्य आरंभ करने से पहले मंदिर के दर्शन करने आते हैं। उनकी यह मान्यता है कि महालक्ष्मी के दर्शन से व्यवसाय में धन की अधिक प्राप्ति होगी। नगर के मध्य में और व्यस्ततम क्षेत्र में मंदिर होने के बावजूद मंदिर में श्रदालुओं की भीड़ बनी रहती है।

दीपावली पर होता है पांच दिनी उत्सव 
दीपावली पर मंदिर में विशेष पूजन और अभिषेक होता है। पांच दिवसीय उत्सव में लक्ष्मीपूजा की संध्या यानी दिवाली को भक्तों की अधिक भीड़ रहती है। नवरात्र के दौरान भी भक्तगण महालक्ष्मी के दर्शन के लिए आते हैं। शुक्रवार को यहां सामान्य दिनों से अधिक भीड़ रहती है।

Ramswaroop Mantri

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