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*1971 युद्ध के हीरो को पेंशन का विरोध करने पर केंद्र को हाई कोर्ट की फटकार*

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नई दिल्‍ली। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (Indo-Pakistani War) में अपनी आंखों की रोशनी गंवाने वाले भारतीय जवान साम सिंह के अधिकारों को बरकरार रखते हुए उन्हें ‘युद्ध क्षति की पेंशन’ का हकदार बताया। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया कि सैनिक के परिवार की तरफ से इस पेंशन का दावा काफी देर से किया गया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र का ऐसा कहना उन लोगों के साथ अन्याय है, जिन्होंने देश की रक्षा में अपनी जान और स्वास्थ्य को बलिदान कर दिया।

न्यायमूर्ति हरसिमरन सिंह सेठी और न्यायमूर्ति विकास सूरी की पीठ ने केंद्र सरकार को नसीहत भी दी। उन्होंने कहा, “सरकार को ऐसे मामलों में स्वयं आगे आकर सैनिकों को लाभ देना चाहिए, इन लोगों ने अपने स्वास्थ्य और जान को देश की खातिर दांव पर लगाया था।” दरअसल हाई कोर्ट की यह टिप्पणी केंद्र के उस तर्क के बाद आई, जिसमें कहा गया था कि सैनिक और उनके परिवार ने पेंशन के लिए सेवामुक्ति के बहुत समय बाद (44 साल बाद) आवेदन किया है। इतना ही नहीं उनके पहले अनुरोध को रक्षा लेखा विभाग की तरफ से पहले ही अस्वीकार कर दिया गया है। अधिकारियों के मुताबिक इतनी लंबी देरी के बाद लाभ देना कानूनी सीमाओं के खिलाफ होगा।

केंद्र के इस रुख को अस्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, “देश की रक्षा के लिए अपनी आँखों की रोशनी गंवाने वाले सैनिक से बार-बार आवेदन करने की उम्मीद करना गलत है… उनकी यह चोट सेना के काम का सीधा परिणाम थी, इसके इससे अलग नहीं माना जा सकता।” पीठ ने आगे कहा कि सरकार का कर्तव्य है कि वह स्वयं कार्रवाई करे और यह सुनिश्चित करे की पूर्व सैनिक के परिवार के लाभ को बढ़ाया जाए। इसके साथ ही पीठ ने चेतावनी दी कि अगर सरकार की तरफ से ऐसा नहीं होता तो यह “सैनिकों के बलिदान को कम करके आंकने जैसा होगा।”

क्या है पूरा मामला?
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत और पाकिस्तान के युद्ध के दौरान दिसंबर 1971 में एक पाकिस्तानी बम सीमा पर तैनात शाम सिंह के पास गिरा। इससे वह बुरी तरह से घायल हो गए। विस्फोटक के छर्रे और भारी धुएं के कारण उनकी आंखें हमेशा के लिए खराब हो गईं और वह अंधे हो गए। इसके बाद सेना के अस्पताल में ही उनका इलाज किया गया। आँखों के खराब होने की वजह से 22 जनवरी 1973 को उन्हें सेना से सेवामुक्त कर दिया गया। जवानी में ही विकलांग हो जाने की वजह से सिंह ने अपना बाकी जीवन कठिनाइयों में बिताया। युद्ध में अपनी आंखों को गंवाने के बाद भी सिंह को युद्ध क्षति वाली पेंशन का हकदार नहीं माना गया।

आपको बता दें कि 23 अगस्त 2023 को एएफटी चंड़ीगढ़ पीठ ने निर्देश दिया था कि शाम सिंह को 22 जनवरी 1973 से 21 जनवरी 1975 तक के समय के लिए युद्ध क्षति पेंशन के भुगतान किया जाए और उसके बात 19 मई 2021 को उनकी मृत्यु तक उन्हें नियमित पेंशन मिलनी थी। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी करनैल कौर पेंशन की हकदार हैं।

हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से, लगभग आधी सदी के संघर्ष के बाद शाम सिंह के परिवार को आखिरकार मान्यता और राहत मिली है। न्यायालय ने कहा कि यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि यदि कोई सैनिक अपने अधिकारों से अनभिज्ञ है, तो यह सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है कि औपचारिक आवेदन के बिना भी, उसके अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ।

Ramswaroop Mantri

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