महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा चौंकाने वाली होती है. एक बार फिर यहां बड़ा खेल शुरू हो चुका है. उद्धव ठाकरे गुट में भारी उथल-पुथल मची है. पार्टी ने बैठक में न आने वाले बागी सांसदों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है. लेकिन इसी बीच एक बड़ा सस्पेंस पैदा हो गया. व्हिप जारी होने के बावजूद बैठक से गायब छह सांसदों में से कार्रवाई केवल पांच पर हुई है. इसे देखकर हर कोई हैरान है और प्रदेश की सियासत पूरी तरह गरमा गई है. जानें इसके पीछे क्या है कहानी.
महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर की भनक लगते ही उद्धव खेमा एकदम सतर्क हो गया. पार्टी ने तुरंत एक बेहद जरूरी बैठक बुला ली. सभी सांसदों को हाजिर रहने का सख्त आदेश दिया गया. इसके लिए बकायदा व्हिप भी जारी किया गया. लेकिन बैठक के दिन नजारा ही कुछ और था. कुल नौ लोकसभा सांसदों में से 6 सांसद इस बैठक में आए ही नहीं. मंच पर उद्धव के साथ सिर्फ तीन सांसद ही बैठे नजर आए. इससे साफ हो गया कि पार्टी में बड़ी बगावत हो चुकी है.
दिल्ली से जारी हुआ सख्त कारण बताओ नोटिस
सांसदों के बैठक में नहीं आने के बाद पार्टी ने फौरन कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी. शिवसेना के उद्धव गुट के संसदीय दल ने बागी नेताओं पर सीधा एक्शन लिया. इसके तहत दिल्ली से ही कारण बताओ नोटिस भेजने की पूरी कानूनी प्रकिया पूरी कर ली गई. सूत्रों की मानें तो इस नोटिस की भाषा बेहद सख्त रखी गई है. इसमें सांसदों से सीधे सवाल किया गया है कि उन्होंने व्हिप का उल्लंघन आखिर क्यों किया? और उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए?
छठे सांसद को क्यों दी गई बड़ी राहत?
अब इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ यही है. बैठक से गायब तो पूरे छह सांसद हुए थे. लेकिन जब नोटिस भेजने की बारी आई, तो सिर्फ पांच लोगों को ही नोटिस भेजी गई. राजनीतिक गलियारों में अब यही चर्चा जोरों पर है कि वह छठा सांसद आखिर कौन है? और उसे उद्धव ठाकरे ने क्यों बख्श दिया? मीडिया में छपी खबरों की माने तो पांच सांसदों को सीधा नोटिस देकर पार्टी ने अपनी ताकत तो दिखा दी. लेकिन एक को छोड़कर पर्दे के पीछे कोई नया खेल रच दिया है.
जानिए क्या है मातोश्री का असली गेम प्लान?
राजनीति को करीब से समझने वालों का कहना है कि इसके पीछे मातोश्री की कोई पुरानी और सधी हुई चाल है. मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, मातोश्री अब भी कुछ सांसदों के सीधे संपर्क में हो सकती है. या फिर उद्धव ठाकरे जानबूझकर बागी गुट में अविश्वास और फूट पैदा करना चाहते हैं. एक सांसद को नोटिस न भेजकर बाकी पांच के मन में शक के बीज बोना, एक चतुर रणनीतिक दांव माना जा रहा है. उद्धव यह देखना चाहते हैं कि बागी गुट अब अगला क्या कदम उठाता है.
जनता के सामने है सबसे बड़ा सियासी सवाल
महाराष्ट्र में आए इस नए भूचाल ने आम जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है. आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका असर जरूर दिखेगा. यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता और खुद तुलजा भवानी का असली आशीर्वाद किसे मिलता है. एक तरफ वो कट्टर शिवसैनिक हैं, जो आज भी अपने नेता उद्धव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं. वहीं दूसरी तरफ वे बागी सांसद हैं, जिन्होंने अलग राह पकड़ ली है. अब इन दोनों गुटों की लड़ाई सड़क से लेकर कोर्ट तक और तेज होने वाली है.
आगे क्या होगा बागी सांसदों का असली भविष्य?
उद्धव ठाकरे ने इन पांच सांसदों को नोटिस देकर एक बात तो साफ कर दी है. वह अब किसी भी तरह के समझौते के मूड में बिल्कुल नहीं हैं. जो पार्टी के खिलाफ जाएगा, उस पर सख्त कार्रवाई जरूर होगी. लेकिन छठे सांसद का नाम गुप्त रखकर उन्होंने पूरी कहानी में सस्पेंस का तड़का भी लगा दिया है. इस कदम से बागी खेमे के अंदर भी बेचैनी बढ़ गई है. हर कोई यही जानने को बेताब है कि वह कौन सा खास नेता है, जिस पर मातोश्री ने अपनी मेहरबानी बनाए रखी है.





