आज से करोड़ों साल पहले हमारी ये धरती एक ऐसी चरम स्थिति से गुजरी थी, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर डाला था. इस काल को ‘स्नोबॉल अर्थ’ के तौर पर पहचाना जाता है, जब पूरा ग्रह बर्फ की मोटी चादर में लिपट गया था. इस रिसर्च ने संकेत दिया है कि इस भयानक शीत युग को और भी अधिक गहरा करने में ‘नमक’ की एक बड़ी भूमिका हो सकती है.अपनी यह दुनिया बहुत ही रोचक है. धरती के इतिहास से लेकर वर्तमान और भविष्य तक की हर बात अनंत राज को समेटे हुए है. ऐसी ही एक रिसर्च में फिर से नई बात पता चली है. यह बात अबसे करीब 72 करोड़ से लेकर 63 करोड़ साल पहले तक की है. हमारी ये धरती एक ऐसी चरम स्थिति से गुजरी थी जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था. भूवैज्ञानिक इस काल को ‘स्नोबॉल अर्थ’ (Snowball Earth) कहते हैं, जब दोनों ध्रुवों से लेकर भूमध्य रेखा तक पूरा का पूरा ग्रह बर्फ की मोटी चादर में लिपट गया था. इस रिसर्च ने संकेत दिया है कि इस भयानक शीत युग को और भी अधिक गहरा करने में ‘नमक’ की एक बड़ी भूमिका हो सकती है. आइए समझते हैं पूरी बात.
क्या है ये नया खुलासा?
हाल ही में क्लाइमेट ऑफ द पास्ट पत्रिका में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार समुद्र की बर्फ से निकलने वाली नमक ने धरती की ठंड को सोखने की बजाय उसे अंतरिक्ष में वापस रिफ्लेक्ट कर पहुंचाने में मदद की. वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि धरती जब गर्म जलवायु से पूरी तरह जमने की ओर बढ़ रही थी, तब नमक ने एक ‘एक्सिलेटर’ की तरह से काम किया था.
‘आइस-अल्बेडो’ और नमक का घातक मेल
वैज्ञानिक लंबे समय से यह बात जानते हैं कि ‘आइस-अल्बेडो फीडबैक’ ने धरती को जमाने में मदद की थी. ‘अल्बेडो’ वह माप है जो बताता है कि कोई सतह कितनी धूप को वापस भेजती है. बर्फ सफेद और चमकदार होती है, इसलिए वह सूरज की ऊर्जा को सोखने की बजाय वापस अंतरिक्ष में ही भेज देती है, जिससे ग्रह और भी अधिक ठंडा हो जाता है.
यूआईटी- द आर्कटिक यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्वे के रिसर्चर्स ने पाया कि जब समुद्री जल जमता है, तो नमक बर्फ से बाहर निकल जाता है. भीषण ठंड और शुष्क परिस्थितियों में यह नमक बर्फ की सतह पर क्रिस्टल के रूप में जमा हो जाता है. जैसे-जैसे बर्फ का वाष्पीकरण होता है, उसके पीछे नमक की एक चमकदार सफेद रंग की परत बच जाती है. यह ‘सॉल्ट-अल्बेडो’ साधारण बर्फ से भी ज्यादा चमकदार होता है, जो सूरज की रोशनी को और अधिक परावर्तित करके ठंड को कई गुना तक बढ़ा देता है.
मॉडल में दिखे चौंकाने वाले नतीजे
इसके शोधकर्ताओं ने एक क्लाइमेट मॉडल के जरिए इस प्रक्रिया को समझने की कोशिश की. सिमुलेशन से पता चला कि नमक के प्रभाव के कारण धरती उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से और गहराई से जम गई. इसके बाद पिघलने में बाधा हुई. एक बार जब नमक की परत बन गई, तो ग्रह को वापस गर्म करने के लिए सामान्य से कहीं अधिक गर्मी की आवश्यकता पड़ी. इसे ऐसे समझें कि नमक ने धरती को ‘फ्रीजर’ में लॉक कर दिया था.
अब इस बारे में एक्सपर्ट्स का मत है कि पिछले मॉडल में नमक की इस भूमिका को नजरअंदाज किया गया था. लेकिन हमारे रिसर्च से पता चलता है कि नमक ने धरती की सतह को इतना परावर्तक बना दिया होगा कि उससे बाहर निकलना नामुमकिन सा हो गया था.
भविष्य के रिसर्च की दिशा
हालांकि यह एक शुरुआती स्टडी है, लेकिन यह समझाता है कि आखिर क्यों धरती कई लाख सालों तक इस जमी हुई अवस्था में ही रही. वैज्ञानिकों का कहना है कि बादल, हवा और बर्फ की गतिशीलता जैसे कारकों को शामिल करके और अधिक डिटेल में स्टडी की जरूरत है. यह समझना ना केवल हमारे ग्रह के इतिहास को जानने के लिए जरूरी है, बल्कि यह भी बताता है कि जलवायु प्रणाली में छोटे-छोटे बदलाव कैसे पूरी दुनिया का नक्शा बदल सकते हैं.
वैज्ञानिकों का यह भी तर्क है कि अगर धरती ‘स्नोबॉल’ ना बनी होती, तो शायद जीवन आज भी केवल बैक्टीरिया के स्तर पर ही अटका रहता. इस भारी आपदा ने ही विकास की गति को बढ़ा दिया. वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘स्नोबॉल अर्थ’ की चरम स्थितियों ने ही असल में जटिल जीवन के विकास के लिए ‘स्पार्क’ का काम किया था. यहां बताया गया है कि उस भीषण ठंड के दौरान और उसके ठीक बाद जीवन कैसे विकसित हुआ.
सूक्ष्मजीवों का ‘शरणार्थी’ जीवन
धरती जब पूरी की पूरी बर्फ से ढकी थी, तब जीवन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. सूक्ष्मजीव (Microbes) और साधारण शैवाल (Algae) कुछ खास जगहों पर जीवित रहे. गर्म झरने (Hydrothermal Vents) मौजूद थे, समुद्र की गहराई में जहाँ ज्वालामुखी की गर्मी थी. बर्फ की दरारें थी, जहां पर सूरज की रोशनी कुछ हद तक पहुँच सकती थी. क्रायोकोनाइट होल यानी बर्फ की सतह पर छोटे धूल भरे गड्ढे, जहां पिघला हुआ पानी जमा होता था.
पोषक तत्वों का ‘धमाका’
जैसे ही ‘स्नोबॉल अर्थ’ का दौर खत्म हुआ और बर्फ पिघली, तो हजारों सालों से जमा हुआ फास्फोरस और अन्य खनिज पिघलकर समुद्र में मिल गए. इसने समुद्रों को ‘खाद’ की तरह पोषण दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि साइनोबैक्टीरिया और शैवाल की आबादी में भारी विस्फोट हुआ, जिससे वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से बढ़ी.
आनुवंशिक बदलाव और विकास
चरम स्थितियों ने ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया को तेज कर दिया. जीवित रहने के लिए जीवों को आपस में सहयोग करना पड़ा, जिससे बहुकोशिकीय जीवन की शुरुआत हुई. स्नोबॉल अर्थ के ठीक बाद एडियाकरन (Ediacaran) काल शुरू हुआ, जिसमें पृथ्वी पर पहली बार नरम शरीर वाले जटिल जीव दिखाई दिए.
स्नोबॉल अर्थ के बाद जीवन का विकास क्रम हुआ. पहले मुख्य रूप से एककोशिकीय जीव आए. स्नोबॉल अर्थ के दौरान जीवन का अस्तित्व केवल गर्म छिद्रों और दरारों तक सीमित रहा. स्नोबॉल अर्थ के तुरंत बाद ऑक्सीजन में वृद्धि और जटिल शैवाल का उदय हुआ. कैम्ब्रियन विस्फोट की घटना में रीढ़ की हड्डी वाले जीवों और आधुनिक प्रजातियों का उदय हुआ.






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