मुनेश त्यागी
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2020 के आंकड़ों के अनुसार भारत की जेलों में 4, 88,511 कैदी हैं जिनमें से 3,71,848 कैदियों पर मुकदमे चल रहे हैं। भारत की जेलों में बंद कैदियों में 76% गरीब और अनपढ़ कैदी हैं। फिलहाल देश की विभिन्न अदालतों में 5 करोड से भी ज्यादा मुकदमे पेंडिंग है और निचली अदालतों में चार लाख 4 करोड़ 20 हजार से भी ज्यादा मुकदमे लंबित हैं। यहां पर यह बताना भी जरूरी है की अनेक वर्षों से जेलों में सड़ रहे इन कैदियों के बिहा होने के कोई आसार नहीं हैं।
भारत की सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि मामूली मुकदमों में अभियुक्तों ने अधिकतम सजा में से, एक तिहाई से ज्यादा जेल में बिता दी है तो उनके खिलाफ केस बंद करके, उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह सुझाव भारत की आजादी के 75वें साल पर मनाई जा रहे अमृत महोत्सव के अवसर पर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि भारत की जेलों में पड़े कैदियों को रिहा करने के लिए, सरकार कुछ लचीला रुख अपनाकर, कैदियों को रिहा कर सकती है।
अगर सरकार आजादी के 75वें साल के अवसर पर यह कदम उठाती है तो ऐसा करने से जेल के कैदियों की संख्या कम हो जाएगी और जेल में बढ़ते बोझ को कम किया जा सकेगा। आजादी के 75 साल के अवसर पर ऐसा करने से वर्षो से लंबित वादों में कमी आएगी और जेल में कई कई वर्षों से कैदियों को राहत मिलेगी। इस पावन अवसर पर ऐसा करना जरूरी है। अन्यथा ये कैदी हजारों वर्षों तक यूं ही जैल में पड़े सडते रहेंगे और कोई इनकी सुध लेने नहीं आएगा।
इससे पहले, भारत के प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसा ही कह चुके हैं। वे आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर, ज्यादा से ज्यादा कैदियों को जेल से रिहा करने की बात भी कह चुके हैं। इस मौके पर जिन कैदियों पर अपनी जिंदगी में पहली दफा अपराध करने का आरोप है और जो छोटे-छोटे अपराधों में अभियुक्त हैं और कई कई वर्षों से जेल में बंद हैं, उन्हें भी व्यक्तिगत मुचलके भरने के बाद छोड़ा जा सकता है।
जो आरोपी कैदी 10 साल से जेल में हैं मगर हाईकोर्ट में उनकी अपीलों की सुनवाई नहीं हो रही है, तो उनको भी जमानत देकर जेल से रिहा किया जा सकता है। ऐसा करने से जो कैदी वर्षों से जेल में बंद है और उनकी सही ढंग से सुनवाई नहीं हो रही है, उनको जेल से बाहर आने का मौका मिलेगा और न्यायालयों और जेलों पर और अनुचित रूप से बढ रहे बोझ में कमी आएगी। अन्यथा हर केस की अपील हाईकोर्ट और फिर सर्वोच्च न्यायालय में होगी, तब न्यायालय और जेलों पर पड़ रहे अतिरिक्त बोझ को कम नहीं किया जा सकता और मामलों को शीघ्रता से नहीं निपटाया जा सकता।
न्यायालयों और जेलों पर पड़ रहे अतिरिक्त बोझ को कम करने के लिए हमारा एक सुझाव यह भी है कि भारत के विभिन्न न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में लंबित 5 करोड़ से अधिक मुकदमों को शीघ्र निस्तारित करने के लिए, मुकदमों के अनुपात में, जज नियुक्त किए जाएं। यह नियुक्तियां हजारों की संख्या में हो सकती हैं और मुकदमों के निस्तारण तक यह नियुक्तियां जारी रहनी चाहिए।
यहां पर कोई भी आदमी कह सकता है कि ऐसा कैसे हो सकता है, क्या कानून ऐसा करने की अनुमति देता है? तो उपरोक्त मामलों के निस्तारण के विषय में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हमारा कानून, ऐसे कदम उठाने की अनुमति देता है। तो सरकार को इस मौके का फायदा उठाकर जेल में सड़ रहे इन लाखों कैदियों को रिहा कर देना चाहिए।
हम यहां पर यह भी कहना चाहेंगे कि छोटे-छोटे मुकदमों में जेल में सड़ रहे कैदियों को वर्षों तक, जेल में रखने के कोई मायने नहीं है। आजादी के 75वें अमृत महोत्सव के अवसर पर, सरकार को एक नीति के तहत, ऐसे जरूरी कदम उठाने चाहिए ताकि जेलों में सड रहे छोटे-छोटे मामलों में कैदियों को मुक्ति मिल सके।





