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*दवाएं फेल – फिर चुनावी बांड – फिर बाजार – फिर जनता की जान की कीमत पर – भरपूर मुनाफा*

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*पीएम मोदी ने 7 साल में 2300 करोड़ प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों पर खर्च किए, मतलब हर घंटे 4 लाख*

विजय दलाल

 *दुनिया का शायद ही कोई लोकतांत्रिक तो छोड़िए तानाशाह देश हो जो अपने विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को मारने के लिए तो किसी भी हद तक गया हो मगर सत्ता कायम रखने के लिए और धन उगाही के लिए  देश की आम जनता की जिंदगी के साथ ऐसा खिलवाड़ किया हो इन दो सौ – ढाई सौ वर्षों के आधुनिक दुनिया के इतिहास में ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है।*

*वह भी विधान बनाकर।*

*सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद परतें दर परतें रोज खुल रही है।*हफ्ता वसूली या चंदे का धंधा*और सुप्रीम कोर्ट में पहले तो सरकार की दलील कि ” जनता को इसको जानने का अधिकार नहीं है।” उसके बाद एसबीआई द्वारा जानबूझकर चुनाव आयोग को अधूरी जानकारी देने के बाद उसके बचाव में सालिसिटर जनरल हरीश साल्वे व एसोचैम, फिक्की इत्यादि व्यापार और उद्योग के बड़े बड़े संगठन भी बचाव में आने के बाद भी इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती थी कि क्रोनी पूंजीवाद का यह संसदीय संस्करण देश की आम के लिए इतना क्रुर और इतना विभत्स होगा।*

*देश के दवा उद्योग और सत्तारूढ़ पार्टियों का यह* *कारनामा टेस्ट की पुरी प्रमाणित और स्टेंडर्ड प्रक्रिया के गुजरे बगैर कोरोना के टीके से बांड से चंदे का यह धंधा शुरू हुआ था और कहां तक पहुंचा देश का बिका हुआ या डरा हुआ मीडिया तो इसे उजागर नहीं कर सका लेकिन* *बीबीसी ने इसे उजागर किया है*सारी नामी दवा की कंपनियां है।*

*पीएम मोदी ने 7 साल में 2300 करोड़ प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों पर खर्च किए, मतलब हर घंटे 4 लाख।*

*इतने रुपए में 2 साल तक 10 लाख बच्चों का पेट भरा जा सकता था।*

*4 ने एम्स और आईआईटी खोले जा सकते थे।*

रवीश कुमार

Ramswaroop Mantri

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