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ब्रेकिंग समाचार -इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट की परीक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में दे सकेंगे छात्र,चंद्रयान-3 की टीम को मिला US के अंतरिक्ष क्षेत्र का शीर्ष पुरस्कार,

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 बाबा तरसेम सिंह हत्याकांड के मुख्य आरोपी को उत्तराखंड STF ने एनकाउंटर में मार गिराया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने कहा कि ये याचिका जमानत के लिए नहीं है। केजरीवाल के खिलाफ ईडी के आरोपों को अदालत ने दोहराया। हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की दलील को ठुकरा दिया कि उनकी गिरफ्तारी लोकसभा चुनावों को देखते हुए की गई। इसी के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

जब मुख्य न्यायाधीश ने उठाया जूनियर वकीलों को कोर्ट में बैठाने का मुद्दा, लग गई स्टूलों की कतार

DY Chandrachud Interrupting Solicitor General Tushar Mehta on Seating Junior Lawyers In Courtroom

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को टोकते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने मंगलवार को सुनवाई के बीच में शीर्ष वकील के पीछे खड़े जूनियर वकीलों के लिए बैठने की व्यवस्था पर स्टूलों के इंतजाम का मुद्दा उठाया।मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘मैंने अभी कोर्ट मास्टर से यह पता लगाने के लिए कहा है कि क्या वह कुछ स्टूल लगा सकते हैं… हम कोशिश करेंगे और कुछ स्टूल लगाएंगे।’ लंच के बाद जब कोर्ट में दोबारा मामले की सुनवाई हुई तो हर कोई हैरान रह गया। 

मुख्य न्यायाधीश ने मेहता से कहा, ‘मिस्टर सॉलिसिटर, हमारे सभी युवा जूनियर दिन-ब-दिन अपने लैपटॉप हाथ में लेकर खड़े रहते हैं। दोपहर में, कोर्ट मास्टर देखेंगे कि क्या वह उन्हें तुरंत आपके पीछे बिठा सकते हैं।’ 

इसपर मुख्य न्यायाधीश को जवाब देते हुए, मेहता ने कहा कि वह भी इसे देख रहे हैं, उन्होंने अदालत कक्ष में उन वकीलों से अनुरोध किया है जो मामले से संबंधित नहीं हैं कि वे उनके लिए कुर्सी खाली कर दें।

अदालत कक्ष में लग गई स्टूलों की कतार
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘मैंने अभी कोर्ट मास्टर से यह पता लगाने के लिए कहा है कि क्या वह कुछ स्टूल लगा सकते हैं… हम कोशिश करेंगे और कुछ स्टूल लगाएंगे।’ लंच के बाद जब कोर्ट में दोबारा मामले की सुनवाई हुई तो हर कोई हैरान रह गया। अदालत कक्ष में स्टूलों की एक कतार दिखाई दी। 

सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक, चीफ जस्टिस ने युवा वकीलों के लिए बैठने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए।

संविधान पीठ कर रही थी एक अपील पर सुनवाई
दरअसल, मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस अपील पर सुनवाई कर रही थी कि क्या राज्यों के पास 1990 में सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा उनके खिलाफ दिए गए फैसले के बाद औद्योगिक शराब की बिक्री और निर्माण को विनियमित करने की विधायी शक्ति है। 

सूत्र ने बताया कि अदालत शुरू होने से पहले सीजेआई ने बैठने की व्यवस्था का निरीक्षण किया। वह अदालत कक्ष में उस स्थान पर पहुंचे जहां वकील खड़े थे और यह जांचने के लिए कि क्या चीजें व्यवस्थित हैं, स्टूल पर बैठ गए। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी निरीक्षण किया कि वकीलों के विचार को अवरुद्ध नहीं किया गया था और यह सॉलिसिटर जनरल के लिए कोई बाधा नहीं थी।

सॉलिसिटर जनरल ने बताया, ‘मुख्य न्यायाधीश उदारता के प्रतीक हैं। आज का यह कदम न केवल अभूतपूर्व है, बल्कि सभी अदालतों को इसका पालन करना चाहिए। न्यायिक पदानुक्रम के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति किसी के बताए बिना भी युवा वकीलों की परेशानी के प्रति असाधारण रूप से विचारशील है।’

चुनावी अर्थशास्त्र की चुनौतियां, क्या सार्वजनिक खर्च वास्तव में है कोई मुद्दा

It is important to consider whether public spending on elections is really an issue

अट्ठारहवीं लोकसभा के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और कुछ ही दिनों में पहले चरण का मतदान भी होने वाला है। राजनीतिक दलों के साथ चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार जोर-शोर से चुनाव प्रचार में लगे हैं। अक्सर चुनाव के दिनों में चुनावी खर्च की चिंता जताई जाती है और बढ़ते चुनावी खर्च का तर्क देकर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ पर भी विचार किया जाने लगा है।

भारत सरकार के कुल व्यय बजट, जो लगभग 45 लाख करोड़ रुपये है, में चुनावी खर्च बहुत छोटी-सी रकम है। लिहाजा, इस बात पर विचार करना जरूरी है कि क्या चुनाव पर सार्वजनिक खर्च वास्तव में कोई मुद्दा है।

जहां तक चुनावों में होने वाले खर्च की बात है, तो वैश्विक स्तर पर चुनाव कराने की प्रत्यक्ष सार्वजनिक वित्तीय लागत काफी भिन्न होती है और विभिन्न देशों के बीच और देश के भीतर भी चुनावी  लागत अलग-अलग होती है। सामान्य अर्थों में देखें तो, अपने देश में केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न चुनावों पर सार्वजनिक खर्च में प्रति वर्ष 19.98 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017-18 में चुनाव पर केंद्र सरकार के सार्वजनिक व्यय की लागत 1322.22 करोड़ रुपये थी, जो वर्ष 2024-25 के बजट आवंटन में बढ़कर 2724.26 करोड़ रुपये हो गई है। अब तक चुनावों पर सार्वजनिक लागत का सबसे उच्चतम स्तर वर्ष 2022-23 में दर्ज किया गया है, जो 3775.42 करोड़ रुपये था।

इस चुनावी खर्च में छह प्रमुख मदें शामिल हैं, जो इस प्रकार हैं -निर्वाचन अधिकारियों पर किया जाने वाला खर्च, मतदाता सूची तैयार करने और उसकी छपाई पर खर्च, लोकसभा और राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभा, विधान परिषद के चुनाव के संचालन के लिए किया जाने वाला खर्च, पंचायतों/स्थानीय निकाय चुनावों के संचालन के लिए किया जाने वाला खर्च, आदि और चुनाव संबंधी अन्य खर्च। जैसा कि सार्वजनिक व्यय की इन व्यापक मदों से स्पष्ट है, ये मुख्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा चुनाव कराने के लिए किए जाने वाले प्रशासनिक खर्च हैं।

भारत सरकार के कुल व्यय बजट, जो लगभग 45 लाख करोड़ रुपये है, में चुनावी खर्च बहुत छोटी-सी रकम है। लिहाजा, इस बात पर विचार करना जरूरी है कि क्या चुनाव पर सार्वजनिक खर्च वास्तव में कोई मुद्दा है।

आइए, अब जरा चुनावों के अर्थशास्त्र पर भी विचार कर लेते हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा चुनावों की घोषणा से लेकर चुनाव के बाद नई सरकार के गठन तक, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के खर्च में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होती है। उम्मीदवारों द्वारा चुनाव संबंधी खर्च में बढ़ोतरी को अक्सर अल्पावधि में उपभोग खर्च को बढ़ावा देने वाला माना जाता है। अल्पावधि में उपभोक्ता बाजार पर चुनावी खर्च के लाभ अलग-अलग होते हैं और इसका आर्थिक प्रभाव विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा की चुनावी प्रकृति समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।

हालांकि चुनावी प्रतिस्पर्धा की प्रकृति का सार्वजनिक वित्त पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। चुनाव के बाद जो राजनीतिक दल जीत हासिल कर सरकार का गठन करता है, उस सरकार द्वारा शुरू की गई सार्वजनिक नीतियों का सार्वजनिक खर्च पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। ऐसे खर्चों का विकास, राजकोषीय संतुलन और मानव विकास पर दीर्घकालीन असर पड़ता है। हाल के वर्षों में चुनाव पूर्व किए गए वादे के बड़े सार्वजनिक खर्च प्रतिबद्धता में तब्दील होने का एक बेहद दिलचस्प उदाहरण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) अधिनियम है। हमें चुनाव पूर्व किए गए इस तरह के वादे के ऐसे कई उदाहरण मिलेंगे, जिन्होंने सार्वजनिक खर्च को बढ़ाने के साथ नई सार्वजनिक नीतियों का भी निर्माण किया है।

भारतीय संविधान के पहले अनुच्छेद के अनुसार, विभिन्न राज्यों का एक संघ है। लिहाजा, एक संघीय देश में राष्ट्रीय निर्वाचन और राज्यों के निर्वाचन की चुनावी प्रतिस्पर्धा अलग-अलग होनी चाहिए, खासकर तब, जब राष्ट्रीय सरकार की भूमिका राज्यों की सरकारों से बहुत अलग हो। हालांकि हमारे अपने देश भारत में राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले वादे यह अंतर करने में विफल रहते हैं। राजनीतिक वादों से इस अंतर को समझना भी मुश्किल होता है।

केंद्र और राज्यों, दोनों के चुनाव में किए जाने वाले वादे बड़े पैमाने पर परिवारों को लाभ पहुंचाने के लिए पुनर्वितरण खर्च पर केंद्रित होते हैं। पुनर्वितरण खर्च उसे कहते हैं, जो संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण  से संबंधित होते हैं, इसलिए इस मामले में राज्य कुछ हद तक केंद्र पर भी निर्भर होते हैं। इसके परिणामस्वरूप समस्या यह पैदा होती है कि चुनाव के बाद केंद्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारियों में कार्यात्मक टकराव पैदा होता है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें एक ही तरह की सेवा या सुविधा उपलब्ध कराने का काम करती हैं। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों और जिम्मेदारियों का विभाजन स्पष्ट है।

संसाधनों के सांविधानिक विभाजन को देखते हुए स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और कृषि जैसे ज्यादातर पुनर्वितरण खर्च राज्य स्तर के होते हैं। आदर्श रूप में राज्यों के चुनाव इस तरह के पुनर्वितरण के मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। कानून-व्यवस्था की बहाली भी राज्य का विषय है।

इसलिए राज्यों के चुनाव कानून-व्यवस्था और शासन (गवर्नेंस) के मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। जबकि राष्ट्रीय चुनाव आदर्श रूप में अखिल भारतीय स्तर पर बुनियादी संरचनाओं के विकास, रेलवे, रक्षा और विदेशी मामलों जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़े जाने चाहिए। लेकिन अपने देश में वास्तविकता बिल्कुल अलग है।

हालांकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रमुख पुनर्वितरण संबंधी चिंताओं को लेकर राष्ट्रीय चुनावी वादों की कोई भूमिका नहीं है। कहने का मूल तात्पर्य यह है कि यदि संविधान द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों को राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी घोषणापत्र में मूलभूत सिद्धांतों के रूप में स्थान दिया जाता है, तो चुनाव के बाद सरकार का गठन होने पर चुनावी वादों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा और ऐसे वादों को पूरा करने में किसी तरह की परेशानी नहीं आएगी।

 जलवायु परिवर्तन के दौर में ‘प्राकृतिक बॉन्ड’पर चर्चा जरूरी, कब होंगे हम प्रतिबद्ध

when will we commit to the bond we have with nature In current crisis of climate change

जलवायु परिवर्तन के मौजूदा संकट के दौर में प्रकृति के साथ हमारा जो बॉन्ड है, उसके प्रति हम कब प्रतिबद्ध होंगे? अपने देश की जनसंख्या के हिसाब से प्राकृतिक संसाधनों की भारी कमी है। हमारे देश में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है, लेकिन हमारे पास वैश्विक भूमि  का 2.4 फीसदी, वन का दो फीसदी, स्वच्छ जल का मात्र चार फीसदी ही उपलब्ध है। भविष्य में जैसे-जैसे जनसंख्या का दबाव बढ़ता जाएगा, ये संसाधन और कम होते जाएंगे। अभी जिस दर से हम प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वर्ष 2030 तक हमें 25 गुना ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत होगी।

पारिस्थितिकी के खतरे बढ़ते ही जा रहे हैं, इससे अस्थिरता का माहौल पैदा होगा। इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स ऐंड पीस के अनुसार, अगर खाद्य सुरक्षा पर 25 फीसदी खतरा होगा, तो देश में टकराव/ संघर्ष की आशंका 36 फीसदी तक बढ़ जाएगी और इतने ही पानी की कमी होगी, तो संघर्ष की घटनाएं 18 फीसदी बढ़ जाएंगी। जैव विविधता की दृष्टि से हमारे देश में चार हॉटस्पॉट हैं, लेकिन ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इन स्थानों का भी 90 प्रतिशत क्षेत्र कम हो चुका है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, प्राकृतिक आपदा के कारण भारत को हर साल औसतन सात अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान होता है। यही कारण है कि पिछले पांच वर्षों में, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को पूरा करने में भारत की रैंकिंग में गिरावट आई है। वर्ष 2022 में भारत 121वें स्थान पर था। इन सब घटनाओं को देखते हुए आज प्राकृतिक बॉन्ड के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

यह प्राकृतिक बॉन्ड है क्या? हमने अब तक प्रकृति से जो लिया है या ले रहे हैं, उसे उसी अनुपात में प्रकृति को हम लौटा सकें, यह प्रतिबद्धता ही प्राकृतिक बॉन्ड है। अगर हम नहीं लौटा पाते हैं, तो हम इस प्रकृति के कर्जदार हैं। प्रकृति कोई वित्तीय संस्था नहीं है, जो पूरी जांच-पड़ताल के साथ हमें कर्ज देती है। इस पूरे ब्रह्मांड का संचालन सह अस्तित्व के सिद्धांत के तहत होता है। प्रकृति हमारे जीवन का आधार है, पर उसका ऋण चुकाना भूलकर हम सुख-साधनों की तरफ भाग रहे हैं। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को आखिर कैसी पृथ्वी सौंप कर जाएंगे? कोरोना महामारी के संकट ने हमें सिखा दिया है कि वास्तविक धन क्या है। प्रकृति की उपेक्षा करके मनुष्य आगे नहीं बढ़ सकता।  

जलवायु परिवर्तन और उसके कारण होने वाले विस्थापन का मुकाबला करने तथा पीड़ित लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए अब तक देश में कोई ठोस नीति या कार्य योजना नहीं है। यही कारण है कि एक अनुमान के मुताबिक, अकेले भारत में जलवायु आपदाओं के कारण 2050 तक 4.5 करोड़ लोगों को अपने घरों से पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के दौर में चरम मौसमी घटनाओं के परिणामस्वरूप पलायन करने वाले लोगों की संख्या वर्तमान संख्या से तीन गुना हो जाएगी।

वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक, 2021, अनुसंधान समूह जर्मनवॉच की वार्षिक रैंकिंग, भारत को जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित शीर्ष 10 देशों में रखती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, उसके चलते 2035 तक खाद्य कीमतों में सालाना 3.2 फीसदी की वृद्धि होने का अंदेशा है। यही नहीं, इससे फसलों की उपज पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु में आ रहे बदलावों के कारण आम आदमी के खाने की थाली कहीं ज्यादा महंगी हो सकती है।

इन दिनों देश में लोकसभा चुनाव की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से जनजीवन पर क्या असर पड़ेगा, और उससे निपटने के लिए राजनीतिक दलों के पास क्या कार्ययोजना है, यह इस चुनावी बहस का मुद्दा नहीं है। अगर सही में देखा जाए तो यह चुनाव भी पर्यावरणीय दृष्टिकोण से बहुत ज्यादा नुकसानदायक है। इसलिए हम अपने देश की लोकतांत्रिक संरचना को हरित लोकतंत्र के अंतर्गत शामिल नहीं कर सकते हैं। मौजूदा जलवायु परिवर्तन के दौर में यह आवश्यक है कि देश को एक हरित लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने की पहल की जाए, और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन रोका जाए। पर्यावरण के विनाश की कीमत पर किया जाने वाला विकास अंततः हमें विनाश के रास्ते पर ही ले जाएगा। इसलिए समय रहते सचेत होने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध होने की जरूरत है।

टेस्ला कंपनी के पूर्व सीईओ एबरहार्ड बोले, सस्ती कार योजना रद्द करना शर्मनाक

Former Tesla CEO Eberhard shameful to cancel cheap car plan

दुनिया में जानी पहचानी टेस्ला कार कंपनी के संस्थापक व पूर्व मुख्य कार्यकारी मार्टिन एबरहार्ड ने कहा है कम लागत वाली कार योजाओं को रद्द करने की आलोचना की है। उन्होंने हांगकांग में एचएसबीसी वैश्विक निवेश शिखर सम्मेलन के दौरान कहा, यह सुनना ‘शर्मनाक’ था कि ऑटोमेकर चीन में जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के बीच टेस्ला कंपनी ऐसी योजना बना रही है। कंपनी अब एलन मस्क के हाथों में है।टेस्ला लंबे समय से अपने ग्राहकों के साथ सस्ती कार के लिए किए गए वादे को रद्द कर रही है। जबकि इस परियोजना पर निवेशक भरोसा जता रहे थे। यह निर्णय लक्ष्य छोड़ने का मामला है, जबकि एलन मस्क ने इसे जनता के लिए सस्ती इलेक्ट्रिक कारों के तौर पर प्रचारित किया था।

टेस्ला लंबे समय से अपने ग्राहकों के साथ सस्ती कार के लिए किए गए वादे को रद्द कर रही है। जबकि इस परियोजना पर निवेशक भरोसा जता रहे थे। यह निर्णय लक्ष्य छोड़ने का मामला है, जबकि एलन मस्क ने इसे जनता के लिए सस्ती इलेक्ट्रिक कारों के तौर पर प्रचारित किया था। 

चीन के पास बढ़ने का मौका
एबरहार्ड ने कहा, हमने पढ़ा है कि टेस्ला अपने लो-एंड मॉडल में देरी कर रहा है या उसे खत्म कर रहा है। यह उनके लिए शर्म की बात है, लेकिन यह संकेत है कि चीन के पास वास्तव में वहां आगे बढ़ने का मौका है।

कंपनी की निगाहें भारतीय बाजार पर
भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में माना जा रहा है कि टेस्ला कंपनी की निगाहें भारत के बाजार पर लगी हैं। कंपनी को उम्मीद है कि यह देश अब चीन और अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा वाहन बाजार हो सकता है। टेस्ला शुरू में आयात मार्ग के जरिये इलेक्ट्रिक वाहन लाएगी। अगर कोई कंपनी कुछ शर्तों का पालन करती है, तो भारत सरकार का हालिया आयात शुल्क कम करने का फैसला मदद करेगा।

इलेक्ट्रिक कारों पर ध्यान केंद्रित
जानकारी के मुताबिक, टेस्ला ने अपनी सस्ती कार की योजना को रद्द कर दिया है, लेकिन कंपनी उसी छोटे वाहन प्लेटफॉर्म पर सेल्फ-ड्राइविंग रोबोटैक्सिस विकसित करना जारी रखेगी। टेस्ला ने टिप्पणी के अनुरोध का तुरंत जवाब नहीं दिया। लेकिन माना जा रहा है कि टेस्ला का ध्यान राइट-हैंड-ड्राइव इलेक्ट्रिक कारों का निर्माण पर लगा है।

चंद्रयान-3 की टीम को मिला US के अंतरिक्ष क्षेत्र का शीर्ष पुरस्कार, CEO बोले- यह दुनिया के लिए प्रेरणा

इसरो की चंद्रयान-3 मिशन टीम को अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए 2024 जॉन एल ‘जैक’ स्विगर्ट, जूनियर पुरस्कार मिला है। यह अमेरिका-आधारित स्पेस फाउंडेशन का एक शीर्ष पुरस्कार है। कोलोराडो स्थित स्पेस फाउंडेशन के वार्षिक अंतरिक्ष संगोष्ठी उद्घाटन समारोह में यह पुरस्कार प्रदान किया गया। ह्यूस्टन में भारत के महावाणिज्य दूत डीसी मंजूनाथ ने इसरो की टीम की ओर से पुरस्कार प्राप्त किया।स्पेस फाउंडेशन के सीईओ हीथर प्रिंगल ने कहा, अंतरिक्ष में भारत का नेतृत्व दुनिया के लिए एक प्रेरणा है। मिशन की तकनीकी-इंजीनियरिंग उपलब्धियां भी दुनिया को वैश्विक अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में भारत के निर्विवाद नेतृत्व व सरलता को दिखाती हैं। 

 भारत का नेतृत्व दुनिया के लिए एक प्रेरणा
स्पेस फाउंडेशन अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सूचना, शिक्षा और सहयोग प्रदान करता है। उसने घोषणा की थी कि अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए चंद्रयान-3 मिशन टीम का चयन किया गया है। स्पेस फाउंडेशन के सीईओ हीथर प्रिंगल ने कहा, अंतरिक्ष में भारत का नेतृत्व दुनिया के लिए एक प्रेरणा है। मिशन की तकनीकी-इंजीनियरिंग उपलब्धियां भी दुनिया को वैश्विक अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में भारत के निर्विवाद नेतृत्व व सरलता को दिखाती हैं।

 इंजीनियरिंग-मैनेजमेंट की परीक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में दे सकेंगे छात्र, सभी तकनीकी कॉलेजों को लिखा पत्र

AICTE Students able to give engineering-management exams in regional languages

इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फॉर्मेसी, ऑर्किटेक्चर जैसे पाठ्यक्रमों के छात्र शैक्षणिक सत्र 2023-24 की वार्षिक परीक्षा भारतीय भाषाओं में दे सकेंगे। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के सदस्य सचिव प्रो. राजीव कुमार के मुताबिक, स्नातक पाठ्यक्रम व डिप्लोमा छात्रों को क्षेत्रीय भाषाओं में प्रश्नपत्र हल करने की सुविधा मिलने जा रही है।तकनीकी कॉलेजों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाई के बाद क्षेत्रीय भाषाओं में ही प्रश्नपत्र हल करने की सुविधा का फैसला किया गया है। इसके लिए तकनीकी कॉलेजों को पत्र लिखकर क्षेत्रीय भाषाओं में प्रश्नपत्र तैयार करने का आग्रह किया गया है। इसमें कॉलेज एक स्थानीय भाषा चुन सकते हैं। 

तकनीकी कॉलेजों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाई के बाद क्षेत्रीय भाषाओं में ही प्रश्नपत्र हल करने की सुविधा का फैसला किया गया है। इसके लिए तकनीकी कॉलेजों को पत्र लिखकर क्षेत्रीय भाषाओं में प्रश्नपत्र तैयार करने का आग्रह किया गया है। इसमें कॉलेज एक स्थानीय भाषा चुन सकते हैं। इसके अलावा, एक अतिरिक्त भाषा में हिंदी, अंग्रेजी या अन्य हो सकती है। इसका ज्यादा फायदा दूरदराज, ग्रामीण इलाकों के छात्रों को होगा।

बेहतर समझ से दे सकेंगे जवाब
विशेषज्ञों के मुताबिक, कोई भी छात्र अपनी भाषा में बेहतर तरीके से जवाब दे सकता है। अपनी भाषा में प्रश्नपत्र होने से छात्र उसे बेहतर समझते हुए अच्छे से उत्तर लिख सकता है। इससे उसके परीक्षा मूल्यांकन में बेहतर सुधार दिखेगा।

बीच में नहीं छूटेगी पढ़ाई
अक्सर छात्र परीक्षा में फेल होने के डर से पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं, पर अब छात्रों को अपनी स्थानीय भाषा में प्रश्न पत्र मिलेगा तो वे अच्छी तरह उत्तर लिख सकेंगे।

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नई दिल्ली लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार बांसुरी स्वराज को आंख में चोट लग गई है। इस बात की जानकारी उन्होंने खुद ट्वीट करके दी है। बांसुरी स्वराज ने एक्स पर तस्वीर शेयर हुए लिखा, ‘आज चुनाव प्रचार के दौरान मेरी आंख में हल्की चोट लग गई। मेरी देखभाल करने और मुझे ठीक करने के लिए मोती नगर के डॉ. नीरज वर्मा जी को धन्यवाद।’

आरजेडी ने लोकसभा चुनाव को लेकर जारी की उम्मीदवारों की लिस्ट, सिवान से पार्टी ने नहीं किया कैंडिडेट का ऐलान

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Ramswaroop Mantri

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