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‘खाद्य सुरक्षा को महंगा बताकर इसके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश…… नीति आयोग ने दिया कम लोगों को राशन देने का सुझाव

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 अविनाश द्विवेदी

नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 (NFSA, 2013) के तहत शहरों और गांवों में कम लोगों को राशन दिया जाना चाहिए। खाद्य सब्सिडी को घटाकर देश की सिर्फ 50% जनता को ही राशन उपलब्ध कराने की बात सुझाव में कही गई है, जबकि फिलहाल सरकार 67% जनता को इस कानून के तहत अनाज उपलब्ध कराती है। 2020-21 में सरकार ने 4 लाख करोड़ से ज्यादा की फूड सब्सिडी दी। नीति आयोग का अनुमान है कि कवरेज को घटाने से सरकार को सालाना 47,229 करोड़ रुपए की बचत होगी। आयोग के पेपर में लिखा है, ‘पिछले दशक में हुआ विकास इस कमी की अनुमति देता है। खासकर महामारी के समय में NFSA के तहत कवरेज कम किए जाने का सुझाव दिया जाता है ताकि सरकार इससे होने वाली बचत का प्रयोग दूसरे जरूरी क्षेत्रों जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा पर कर सके।’

NFSA के तहत अंत्योदय अन्न योजना (जिसके तहत 1 फरवरी तक 2.37 करोड़ घर और 9 करोड़ से ज्यादा लोग थे) के तहत आने वाले हर घर को हर महीने 35 किलो अनाज दिया जाता है। वहीं प्राथमिकता परिवार राशन कार्ड (जिसके अंतर्गत करीब 70.35 करोड़ लोग थे) पर हर माह प्रति व्यक्ति 5 किलो राशन दिया जाता है।

18 करोड़ लोगों के राशन पर मंडरा रहा खतरा
नीति आयोग ने जनसंख्या के आंकड़ों को अपडेट करने की बात भी कही है क्योंकि फिलहाल जनसंख्या की माप के लिए सरकार 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करती है। और 5 जुलाई, 2013 को लागू किए जाने के बाद से अब तक NFSA के अंतर्गत आने वाले लोगों के आंकड़े को अपडेट नहीं किया गया है।

अगर सरकार पहले से चले आ रहे आंकड़ों के मुताबिक ही खाद्य सुरक्षा कानून को जारी रखने का फैसला करती है तो 2011 के 81.35 करोड़ लोगों के मुकाबले अब कानून के तहत राशन पाने वाले लोगों की संख्या 89.52 करोड़ हो चुकी है। यानी इसमें 8.17 करोड़ लोगों की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि अगर नीति आयोग का सुझाव मान लिया जाता है तो राशन पाने वालों की संख्या घटकर 71.62 करोड़ हो जाएगी। यानी 18 करोड़ लोग NFSA के तहत मिलने वाली कवरेज से बाहर हो जाएंगे।

सिर्फ संसद के जरिए ही हो सकता है कवरेज में संशोधन
इस सुझाव को लागू किए जाने के बारे में खाद्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘अभी इस बारे में कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं दिया गया है। विभाग के पास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में बदलाव के अधिकार भी नहीं हैं। इसमें संशोधन सिर्फ संसद कर सकती है।’

FCI के मूल्यांकन और बदलाव के लिए पहले बनी एक उच्च-स्तरीय कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, ‘कमेटी वर्तमान के 67% कवरेज के फिर से मूल्यांकन का सुझाव देती है। कमेटी के परीक्षण में सामने आया है कि 67% जनसंख्या का कवरेज बहुत ज्यादा है और इसे कम करके 40% के स्तर पर लाया जाना चाहिए। इस सीमा में भी गरीबी रेखा के नीचे के सभी परिवारों और इसके ऊपर के भी कुछ परिवारों को आसानी से कवर किया जा सकता है।’

‘खाद्य सुरक्षा को महंगा बताकर इसके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश’
दिल्ली IIT में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली रीतिका खेड़ा इन सुझावों से सहमत नहीं हैं, वो कहती हैं, ‘सिर्फ NFSA के लाभार्थियों को घटाने का सुझाव ही नहीं बल्कि ऐसे 3 और सुझाव और घटनाएं हैं, जो परेशान करने वाले हैं। इनमें पहला, आर्थिक सर्वेक्षण में सस्ते राशन का दाम बढ़ाए जाने का सुझाव है। अभी बांटे जाने वाले राशन में मोटा अनाज, गेहूं और चावल क्रमश: 1, 2 और 3 रुपए किलो दिए जाते हैं। दूसरा सुझाव, इस साल फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) की गेहूं खरीद के नियम सख्त करने का है। इसमें खरीद के लिए नमी का पैमाना 14% से घटाकर 12% करने का प्रस्ताव है। पहले नमी ज्यादा होने पर कम दाम मिलता था, अब ऐसा गेहूं खरीदा ही नहीं जाएगा। साथ ही पहले गेहूं में 0.75% तक की मिलावट वाला गेहूं खरीद लिया जाता था, अब यह पैमाना भी 0.50% किया जा सकता है। तीसरी बात यह कि FCI पिछले 4 सालों से नेशनल स्मॉल सेविंग्स फंड (NSSF) से कर्ज ले रहा था, लेकिन इसे बजट में नहीं जोड़ा जा रहा था। जब राजकोषीय घाटे को छिपाने पर सवाल पूछे जाने लगे तो वित्त मंत्री ने चारों साल का लोन एक साथ 2020-21 के रिवाइज्ड बजट में दिखा दिया। जिससे एक लाख करोड़ के आसपास रहने वाली फूड सब्सिडी अचानक 4 लाख करोड़ रुपए (यानी GDP की 2-3%) दिखने लगी।’

रीतिका कहती हैं, ‘ये सभी बातें जुड़ी हुई हैं। और इनके जरिए यह माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि खाद्य व्यवस्था बहुत महंगी है।’

‘ऐसे किसी भी कदम का सबसे बुरा असर गरीब जनता पर होगा’
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर हिमांशु कहते हैं, ‘केंद्र सरकार NFSA के तहत भेजे जाने वाले राशन को तो कम कर सकती है, लेकिन उसके लिए यह तय करना असंभव होगा कि कवरेज घटने से हर गांव और मोहल्ले के स्तर पर कौन-कौन PDS प्रणाली से बाहर होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि गरीबी के निर्धारण का हमारे पास सुनिश्चित पैमाना ही नहीं है। ऐसा हुआ तो परिणाम भयानक होंगे क्योंकि अभी जितने लोग राशन पा रहे हैं, उतने ही बने रहेंगे, लेकिन जारी किया जाने वाला राशन कम हो जाएगा। और इसका असर सबसे ज्यादा गरीब तबके पर पड़ेगा।

प्रो हिमांशु कहते हैं, ‘सोचकर देखिए कि राशन दुकान पर कम राशन आया तो कोटेदार सबसे पहले किसका राशन काटेगा? क्या वह गांव के किसी प्रभावशाली या ठीक-ठाक व्यक्ति का राशन काट सकेगा, जाहिर है वह सबसे गरीब व्यक्ति का राशन काटेगा क्योंकि उसे पता है वह आवाज नहीं उठा सकता।’

वह कहते हैं, ‘इसके अलावा किसी भी जनसंख्या में 0-6 साल के बच्चों का स्वास्थ्य सबसे ज्यादा मायने रखता है क्योंकि ये कुपोषित हुए तो कुपोषण का चक्र कई पीढ़ियों तक चलता रह सकता है। इस कटौती से इन पर भी बहुत बुरा असर होने की संभावना है।’

देश की 75% जनता को फायदा पहुंचाने वाली योजनाओं पर GDP का 2-3% खर्च महंगा नहीं’
रीतिका कहती हैं, ‘आंकड़ों में खाद्य सुरक्षा बेशक महंगी लग सकती है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि इस पर होने वाले GDP के 2-3% खर्च से एक ओर जहां देश के लगभग 15% गेहूं-धान किसानों को लाभ पहुंचता है, वहीं दूसरी ओर सस्ते अनाज से देश के 67% लोगों को फायदा मिलता है। क्या सरकार वह खर्च नहीं उठा सकती, जिससे देश के 75% से ज्यादा लोगों को आर्थिक सहायता मिलती है। कोरोना लॉकडाउन में इस व्यवस्था ने देश की बड़ी आबादी को राहत दी।’

सरकार के भारी खर्च के मसले पर वो कहती हैं, ‘राजस्व बढ़ाने के और उपाय भी हैं, लेकिन सरकार उन्हें लागू करने से शायद इसलिए घबराती है क्योंकि देश के सक्षम वर्ग पर उसका भार आएगा। जबकि देश के सिर्फ 1 हजार लोगों पर मामूली संपत्ति कर लगाकर GDP का 1% राजस्व प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन सरकार उनको नाराज करने के बजाय आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के अधिकारों में कटौती के लिए आम सहमति बनाने की कोशिश करती नजर आ रही है।’

Ramswaroop Mantri

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