मैं बनारस हूँ। उतना पुराना हूँ जितना पुराना अपना देश। देशी हो या विदेशी जो भी मेरे पास आया मेरा ही हो गया। कहते हैं कलकत्ता जाते वक़्त एक बार महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब मेरे पास ठहरे। मैं उन्हें इतना भाया कि जाते वक़्त बोल पड़े ‘ऐ ख़ुदा बनारस को बुरी नज़र से बचाना।’ मेरे चाहने वालों ने हमेशा मुझे बुरी नज़र से बचाया। लेकिन अब रंग-बिरंगे बनारस को एक रंग में रंगने की तैयारी हो रही है। मेरे चाहने वाले बाशिंदों -मेरे बच्चो! कहीं मुझे बुरी नज़र तो नहीं लगने वाली है?
जी मैं बनारस हूँ। मेरा कोई एक रंग नहीं है। मेरा कोई एक धर्म नहीं है। मेरी कोई एक जाति नहीं है। मेरी कोई एक बोली नहीं है। सभी धर्मों, जातियों, सम्प्रदायों, संस्कृतियों और बोलियों ने मुझे बनाया है। कहते हैं बनारस शिव जी के त्रिशूल पर बसा है। महादेव मंदिरों में बसने वाले भगवान नहीं है। वे मेरी रग-रग में हैं। मेरी बोली-बानी में, मेरे रहन-सहन में, मेरी चाल ढाल में, सबमें महादेव समाये हैं। यही हाल गंगा का है। वह नदी है। वह माँ है। गंगा हमारे जीवन जीने का तरीका है। इसी गंगा के किनारे पंचगंगा घाट पर घंटे, घड़ियाल और धरहरा मस्जिद में अज़ान की जुगलबन्दी होती है तो बनारस यानी मैं जागता हूँ। मैं वह शहर हूँ जहाँ विश्वनाथ बाबा के दरबार में बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई गूँजती रही है। क्या मेरे महादेव मुझसे छिन जाएंगे। और मुझे ‘हर-हर महादेव’ और ‘हर-हर गंगे’ की जगह ‘हर-हर मोदी सुनना’ पड़ेगा? क्या बिस्मिल्ला खाँ विश्वनाथ बाबा के दरबार से निकाल दिये जाएंगे? शिव के घर में अशिव कहां से आ गये? मेरे शहरियो मुझे बुरी नज़र लगने वाली है।
मैं बनारस हूँ। मैं वह शहर हूँ जहां महात्मा बुद्ध ने पहला उपदेश दिया। कई जैन तीर्थंकर बनारस से जुड़े रहे। जहाँं कबीर, तुलसी और रैदास ने कविता की गंगा बहाई। यहाँ गुरु नानक ने गंगा में डुबकी लगाई। यहाँ गाँधी जी ने कांग्रेस को जनसंगठन बनाने की ओर कदम बढ़ाया। यहाँ आचार्य नरेन्द्र देव ने समाजवाद का पाठ पढ़ाया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद और नज़ीर बनारसी की कलम मेरी पहचान है। यहाँ बी.एच.यू. में होने वाली गहन चर्चाएँ है। यहाँ घाटों के पंडे है और पानी को चीरते मल्लाह हैं। यहाँ सदियों से मुझे मेरी पहचान देने वाले बनारसी साड़ी के बुनकर हैं। यहाँ हिन्दुस्तानी संगीत को निराला ठाठ देता बनारस घराना है। यहाँ माहौल में हर ओर फैली राजनीतिक चर्चाएँ है। यहाँ चेतगंज की नक्कटैया है और भोजपुरी के मर्सिए हैं, मेला है-ठेला है, राग-रंग है। कितना रंग-बिरंगा हूँ मैं। लेकिन देखिए कैसे लोग आ रहे हैं अब मेरे आंगन में। इनकी जु़बान पर नफ़रत है। इनकी आँखों में हिंसा हैं। ये धर्मो को, जातियों को, सम्प्रदायों को आपस में लड़ाना चाहते हैं। इनकी राजनीति दंगे-फसाद की राजनीति है। बनारस एक रंग-बिरंगा मेला है ये मेले को उजाड़ देना चाहते है। मुझे बुरी नज़र से बचाओ बनारस वालो!
मैं बनारस हूँ। सादगी मेरा स्वभाव है। झूठ और पाखंड से मेरा कोई वास्ता नही। पर यह क्या? ये जो लोग आए हैं ये सिर्फ नफरत की ही नहीं झूठ की राजनीति भी करते हैं। दिखावे के लिए विकास के नारे लगाते हैं। इनका विकास सिर्फ अमीर का विकास हैं। ये गुजरात के विकास की बात करते हैं जहाँ किसानों की ज़मीने हड़पी जा रही हैं। जहाँ किसान आत्महत्या कर रहे हैं। गुजरात में जिन्होंने नदियों को बड़े पूंजीपतियों को बेच दिया वे विकास के नाम पर गंगा मैया का सौदा भी कर देंगे। जल, जंगल और जमीन की सौदागिरी से गुजरात के पर्यावरण का काफी नुकसान हुआ। विकास के नाम पर गुजरात के छोटे उद्योग चौपट हुए हैं तो मेरे बुनकरों और दूसरे छोटे उद्योगों पर ये क्या रहम करेंगे। गुजरात के झूठे आँकड़ों का पर्दाफाश हो चुका है। शिक्षा में, बच्चों के पोषण में गुजरात पिछड़ता जा रहा है। हाँ समाज का ऊपरी तबका खुशहाल हुआ है। उनकी जेबें भरी हैं। लेकिन दूरदराज के इलाके में बुनकर बदहाल हैं। नमक के किसान भूखों मर रहे हैं और पीने के पानी के लिये औरतें मीलों चल रही हैं। चन्द शहरों में चमचमाती सड़कें और शॉपिंग माल बनाने से जनता खुशहाल नहीं होती। अब इन पाखंडियों की नज़र मुझ पर है। मुझे बुरी नज़रों से बचाओ!
मैं बनारस हूँ अपने बाशिदों का प्यारा बनारस। मैं बनारस ही बना रहना चाहता हूँ। इसलिये मेरे निवासी नारा लगाते हैं बना रहे बनारस।’ लेकिन मैं बनारस कैसे बना रह पाऊँगा! क्योंकि जो लोग मुझे फ़तह करने आ रहे हैं वे मेरा स्वभाव बदलना चाहते हैं। वे मेरा ताना बाना तोड़ना चाहते हैं। इनका जो विकास का मॉडल है वह सब शहरों को एक जैसा बना देना चाहता है। वे शहरों को ऐसा बनाना चाहते हैं जिसमें गरीब उजाड़े जायें और नफ़रत का बाज़ार गर्म हो। वे मेरे रंग छीनकर मुझे एक रंग में रंगना चाहते हैं। मुझे इन हमलावरों की नज़र लग जाएगी क्या?
मैं बनारस हूँ और मुझ पर बहुत जिम्मेदारी आन पड़ी हैं। वे बाहरी हमलावरों की तरह उद्घोष कर रहे हैं कि वे ‘भारत विजय’ पर निकले हैं। इनकी नारा ही बता देता है कि इनके इरादे क्या हैं। ये भारत को विजय करना चाहते हैं। ये बनारस पर विजय हासिल करना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि बनारस को हरा दिया तो पूरब को हरा दिया-पूरब को हरा दिया तो इस देश को जीत लिया। लेकिन मुझे अपने चाहने वालों पर भरोसा है। भरोसा है वे अपने बनारस और अपने देश को हारने नहीं देंगे। मुझे पूरा यकीन है कि नफ़रत और झूठ की राजनीति करने वाले मुझे नहीं रौंद पायेंगे। वे मुझे अपनी लालच और हिंसा का मोहरा नहीं बना पाएंगे। मुझे इन हमलावरों की बुरी नज़र से बचाओ मेरे बच्चो।





