ओमप्रकाश मेहता
आज भारत की आजादी के पचहत्तर साल बाद देश का हर जागरूक नागरिक मौजूदा हालातों को देखकर यह सोचने को मजबूर है कि क्या सुभाष, पटेल, गांधी व भगत सिंह ने इसी ‘प्रजातंत्र’ के लिए अपनी जिंदगियां दांव पर लगाई थी? आज हर भारतीय यह सोचने विचारने को मजबूर है कि ‘हम अंगेजों से अवश्य आजाद हो गए, किंतु हमारे देश में ‘अंग्रेजियत’ आज भी जीवित है’, जो हमारे भारतीय राजनेताओं ने अंग्रेजों से ‘वसीयत’ में हासिल की है, इसी कारण कई मायनों में हम आज भी ‘परतंत्र’ है और हमारी मजबूरी यह कि हम अपनी ‘जांघ’ उघाड़कर विश्व में किसी को दिखा भी नहीं सकते, हमारे देश में प्रजातंत्र के नाम पर हर पांच सालों में चुनाव होते अवश्य है और वे किस तरह करवाये जाते है, क्या-क्या खेल खेले जाते है और उनमें विजयश्री कैसे हासिल की जाती है? यह किसी से भी छुपा हुआ नही है,
आज देश में हम इसी दौरा से गुजर रहे है, चुनाव का आखरी चरण शेष है और देश के आम मतदाता को अभी से यह पता है कि उसे अगले पांच साल तक किसकी ‘चरणवंदन’ करना है, क्योंकि आज के चुनाव जनता के वोट से नहीं, तिकड़मों और छल-कपट से जीते जाते है, इसीलिए देश के मतदाताओं को भी ऐसी कोई गलत फहमी नही है कि सरकार उनके ही मतों से बनी है और चूंकि अब चुनावों को आम मतदाताओं से कोई विशेष सरोकार नही रहा, इसलिए देश के मतदाताओं को भी कोई मुगालता नही है। अर्थात् कुल मिलाकर हमारे देश में ऐसा ‘प्रजातंत्र’ चल रहा है, जिसका न तो ‘प्रजा’ से कोई वास्ता है और न ही ‘तंत्र’ से, देश तो तीसरा तंत्र जिसे ‘राजनीति’ कहा जाता है, वह चला रहा है और फिर चूंकि इस ‘तंत्र’ में ‘प्रजा’ का कम, ‘तानाशाही’ का तत्व अधिक है, इसलिए इसे ‘प्रजातंत्र’ से जोड़ना तो इसके साथ नाइंसाफी ही होगी। इसलिए ऐसी स्थिति में यदि हम देश को ‘प्रजातंत्र’ के बजाए ‘तिकड़मतंत्र’ से जोडकर इसका नामकरण करें तो वह इसके साथ सही न्याय होगा।
यद्यपि आज देश में जिस प्रजातंत्र का सपना जिन नेताओं ने देखा था, उनमें से तो अब कोई भी हमारे बीच नही है और उस समय की ‘स्वप्न दृष्टा’ जनता भी नही है, किंतु आज जो देश के वृद्धजन है, जिन्होंने आजादी के संघर्ष को अपनी आंखों से देखा है और जो आदर्श आजाद भारत के स्वप्न दृष्टा रहे है, उन्हें तो मौजूदा हालातों को देखकर यही विचार आता होगा कि वे आज ये दिन और ये भारत देखने को जीवित क्यों है? किंतु इस सबसे मौजूदा हमारे भाग्यविधाताओं का क्या लेना-देना? उन्हें तो अपनी स्वार्थी जेब भरना है, जो इतने सालों से भर ही नही पा रही है और उसी में आज की राजनीतिक पीढ़ी व्यस्त है, कहने को चाहे उनका अपना कोई परिवार नही है, किंतु क्या वे अपने स्वयं के ‘दीर्घजीवी स्वार्थ’ के बारे में नही सोच रहे है? फिर परिवार की चिंता करने वालों और परिवार विहिनों में क्या फर्क रहा?
वास्तव में देखा जाए तो आज इसी कारण कोई सच्चा जन प्रतिनिधि राजनीति में आना ही नही चाहता, राष्ट्र और राष्ट्रवासियों के बारे में जो भी चिंता करता है, वह आज की राजनीति से दूर ही रहना पसंद करता है, क्योंकि उसे मालूम है कि इस राजनीतिक खेल को खेलने के लिए कितने कठिन व हेय दण्ड पैलने पड़ते है, इसीलिए अब भारत की राजनीति में सच्चे जनसेवकों व राजनेताओं का ‘अकाल’ पड़ गया है।
इसलिए मुझे आज लिखना पड़ा कि चुनाव का आखरी ‘चरण’ शेष है, उसके बाद तो सिर्फ और सिर्फ ‘चरणवंदन’ ही शेष रहेगा, जो पांच साल चलेगा।





