अरूण डीके,
पर्यावरण विद
आनंदवन के निर्माता महामानव बाबा आमटे केवल समाजसेवी ही नहीं थे उत्कृष्ट कवि विचारक और वक्ता थे।महायोगियों को रोगमुक्त कर उन्होंने सुधारित रोगियों का अद्भुत सृजनात्मक संसार आनंदवन में सन १९४९ में खड़ा किया।
अपने समाजकार्य को संस्कारित करने उन्होंने आनंदवन में सन १९७८ में मित्र मिलन समारोह प्रारंभ किया जिसमें देश विदेश के लेखक कवि समाजसेवी कलाकार आकर आनंदवन के रोगमुक्त रहिवासियों के सामने अपनी कला का और विचारों का प्रदर्शन करते(आनंदवन के अंध एवं विकलांगों ने स्वयं का एक संगीत समूह भी बनाया है)।
मित्र मिलन समारोह का प्रमुख आकर्षण वृक्षारोपण होता था जिसकी मूल कल्पना महाराष्ट्र के जाने-पहचाने लेखक व्यंग्यकार पु.ल. देशपांडे ने कोलकाता में गुरुदेव की संस्था से ली थी।”बालतरु की पालकी” नाम के इस भावनात्मक समारोह में नन्हे पौधे को एक पालकी में सजाकर उसकी पदयात्रा निकाली जाती है।सभी श्रेष्ठजन गाते बजाते और युवा अखाड़े निकाल कर उस स्थान पर एकत्रित होते हैं।
सन १९७८ में बाबा डिके राहुल बारपुते और कलागुरु चिंचालकरजी आमंत्रित थे।मैं भी बिना बुलाए मेहमान की तरह शरीक हो गया(और हमेशा के लिए आमटे परिवार से जुड गया).
पालकी समारोह जहॉं समाप्त हुआ वहॉं पौधे को भूमि में सौंपने के पहले मंत्रोच्चार हुआ,महाराष्ट्र के ख्यात कवि ग.दि.माडगुळकर के पृथ्वी सूत्र जैसी कविता को शिव चरित्रकार पुणे के बाबा साहब पुरंदरे की प्रतिभावान कन्या माधुरी पुरंदरे ने मधुर आवाज़ में गाते हुए पौधे को धरतीमाता को सौंप दिया।कविता का संक्षेप यह था- माँ इस बालक को आपकी गोदी में रख रहे हैं।कृपया इसे संस्कारित कर बड़ा कर ताकि ये जन सामान्य के काम आए।
फिर तो बाद में वृक्षारोपण मित्र मिलन समारोह का अविभाज्य अंग हो गया।जिन्होंने आनंदवन देखा है वे बताएँगे कि सन ५० के पहले वीरान इस धरती को रोग मुक्त महारोगियों ने इतना हराभरा कर दिया है कि आनंदवन की एक एक इंच भूमि लहलहा उठी है यहॉं तक की वहॉ की स्म़शान भूमि भी।
इंदौर में वृक्ष मित्र डॉ राकेश त्रिवेदी को मैंने सुझाया था कि महाराष्ट्र की तरह यहॉं भी स्कूल कॉलेज के छात्रों की मदत से वृक्ष गणना प्रारंभ हो और आनंद वन की तरह भावनात्मक वृक्षारोपण प्रारंभ हो।उन्होंने हामी भरी भी थी लेकिन बहुत जल्द वे चल बसे।
मेरे गुरु श्रीपाद अच्युत दाभोलकरजी की २००१ में मृत्यु होने के बाद पुणे में आयोजित शोकसभा में मैने वहॉ के पर्यावरणवादी डॉ वसंत परांजपे से पूछा था कि स्वस्थ पर्यावरण के लिए प्रति व्यक्ति कितने पेड़ होना चाहिए? १.४ उनका ज़बाब था(अब तो शायद आँकड़ा २ पर पहुँच गया होगा).इंदौर आ कर मैने कैट के डायरेक्टर डॉ भवालकर को कहा था कि इंदौर की जनसंख्या २० लाख है(सन २००१) तो यहाँ २८ लाख पेड होना चाहिए।वे हंसकर बोले २८ हज़ार भी नहीं होंगे
क्या हम पहल कर सकते हैं कि इंदौर में वृक्ष गणना हो और ६० लाख पेड न केवल रोपे जाए उन्हें वृक्ष बनाए जाए?
अरूण डीके, पर्यावरण विद






