–सुसंस्कृति परिहार
यूं तो देश में गठबंधन सरकार कई बार बनी हैं चलीं भी और गिरीं भी।इस बार एनडीए गठबंधन में चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार के सोलह और बारह सांसदों के दम पर एनडीए को प्राणवायु मिली है।जबकि ये दोनों ईडी मामलों में भाजपा द्वारा लपेटे में लिए जा चुके हैं इसलिए दोनों मज़बूरी में भाजपा की तारीफ के पुल बांध रहे हैं।जनता का मूड इन दोनों के ख़िलाफ़ खौल रहा है। आंध्रप्रदेश में नायडू का डटकर विरोध हो रहा है तो बिहार में चाचा वादी तेजस्वी गुट उनसे आशान्वित हैं कि वे भाजपा के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।ये पुरानी बातें हैं आज की राजनीति में इस तरह की आशा नहीं लगानी चाहिए।बार बार पलटीमार के नाम से जाने, जाने वाले नीतेश अब अलोकप्रिय हो चुके हैं बिहार की जनता की नज़रों में गिर चुके हैं वरिष्ठ राजनेता होने के बावजूद मोदीजी के चरणस्पर्श को झुकना उनकी मनोदशा को अभिव्यक्त करता है।वे घिर चुके हैं मोदी के जंजाल में।

अब देखना यह है कि वित्त मंत्री कौन बनता है इसकी डिमांड नायडू और नीतीश दोनों कर रहे हैं ताकि अपने मामले खुर्द-बुर्द कर सकें। मगर डगर आसान नहीं। इसके साथ ही तेलुगू देशम लोकसभा स्पीकर का पद भी चाहती है जो दूरदर्शी सोच का परिचायक है।
उधर ममता बनर्जी भी संपूर्ण परिदृश्य पर नज़र रखें हुए हैं कब मोदीजी दीदी ओ दीदी की पुकार लगाते हैं
उनके अकेले के पास 29सीटें हैं जबकि नायडू और नीतीश की कुल मिलाकर 28 सीट हैं। ममता का इंतजार इन दोनों की गतिविधियों के बाद भाजपा को सुरक्षा कवच दे सकता है।आज जब राजनीति नीति और संस्कार विहीन हो गई है तब यह सब मुनासिब है।दीदी को भी भाजपा अपने लपेटे में लिए हुए है। पुकार आते ही वे सरेंडर कर सकती है।वे प्रदेश की तरक्की का बहाना बनाकर भाजपा समर्थक बन सकती है।
इन दुर्दांत परिस्थितियों में भी बड़े राजनीतिक यह कयास लगा रहे हैं कि केर बेर का ये संग साथ ज्यादा लंबा नहीं चल सकता।इन तीनों का शर्तनामा जब सामने आएगा तब बात साफ़ हो सकेगी।यह सत्य है कि फिलहाल दो और आगे ममता इस जुगलबंदी में कैसा खेला करती हैं। फिलहाल मंत्रीमंडल के गठन के बाद ही स्थितियां यह बता पायेंगी कि इस गठबंधन की उम्र कितनी लंबी होगी।
इधर इंडिया गठबंधन को इन तीनों के संग साथ की बिल्कुल अपेक्षा करने की ज़रूरत नहीं है।ऐसे दौर में विपक्ष की भूमिका अहम् होती है।वह लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएं यह उसकी बड़ी जीत होगी।सबसे बड़ी जीत तो यह ही है कि नई सरकार दिव्यांग है।उसके संविधान हटाने के इरादे दफ़न हो गए। मोदी को संविधान के सामने माथा झुकाना पड़ा। सारी ऐंठ काफ़ूर हो गई।उनकी जीत मामूली बढ़त से हुई जबकि कई उनके साथी पांच लाख मतों से जीते इंदौर सांसद ने दस लाख का रिकॉर्ड बनाया तो शिवराज सिंह चौहान ने आठ लाख से विजय पाई। शिवराज सिंह तो सही मायने में पीएम के हकदार हैं।
बहरहाल अब देखना यह है कि भाजपा का अंदरुनी विरोध,संघ की नापसन्दगी,वैशाखी सरकार कितने दिनों तक चलती है। जितने दिन भी चले अब यह तय है कि मोदी-शाह की नहीं चलने वाली। इसलिए उम्मीद यह बंध सकती है कि शायद यह कथित भाजपा सरकार अपना रुख बदले।। हुज़ूरेआला तो अभी बदले बदले नज़र आ रहे हैं।आगे आगे देखिए होता है क्या? मोदी की गति सांप छछूंदर जैसी होने की संभावना है।यह देशहित में है और अप्रत्यक्षत: कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की मेहनत का सुफल है।




