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चार दशक बाद भी नर्मदा जल का पूरा उपयोग करने में मप्र असफल

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सरकार का खजाना खाली, लक्ष्य हासिल करने की राह में सबसे अधिक रोड़ा पैसों की कमी
भोपाल।
 मध्यप्रदेश में बीते चार दशकों से रही राज्य सरकारों की लापरवाही अब प्रदेश पर भारी पड़ रही हैं। यह लापरवाही नर्मदा जल के उपयोग को लेकर की गई है। यही वजह है कि अब अगर अगले चार सालों में मप्र अपने कोटे के पूरा पानी का उपयोग नहीं कर पाता है तो फिर उसे इस पानी से हाथ धोना पड़ जाएगा। यही वजह है कि अब सरकार की इस मामले में नींद खुली तो इसे आत्मनिर्भर मप्र के रोडमैप में शामिल करना पड़ा है। इसके तहत अब नर्मदा के पानी का पूरा उपयोग हर हाल में वर्ष 2024 तक पूरा करने का लक्ष्य तय करना पड़ा है। इसमें मुश्किल यह है कि सरकार का खजाना खाली है, ऐसे में इस लक्ष्य को हासिल करने की राह में सबसे अधिक रोड़ा पैसों की कमी का बना हुआ है। अब सरकार इससे जुड़ी योजनाओं के लिए कर्ज लेने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यही वजह है कि इसके लिए सरकार को अलग से नर्मदा बेसिन प्रोजेक्ट कंपनी लिमिटेड का भी गठन करना पड़ा है। जबकि इसके पहले से ही प्रदेश में नर्मदा विकास प्राधिकरण काम कर रहा है। इसकी कमान प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अफसर के पास रहती है। अब गठित की गई कंपनी द्वारा नर्मदा नदी से मप्र के हिस्से के पानी का पूरा उपयोग करने के लिए आठ परियोजनाओं की योजना तैयार की गई है। इन पर फिलहाल 13544 करोड़ रुपए खर्च आने का अनुमान है। फिलहाल इस समय मप्र द्वारा नर्मदा से 15.41 फीसदी एमएएफ पानी ही लिया जा रहा है, जबकि मप्र के हिस्से में मप्र को 18.25 एमएएफ  पानी मिला हुआ है। पूर्व की भाजपा सरकार में भी अपने हिस्से के पूरे पानी के उपयोग के लिए वर्ष 2024 तक नर्मदा के पानी का पूरा उपयोग करने का लक्ष्य तय किया था, लेकिन कोविड-के बहाने इस काम को आगे ही नहीं बढ़ाया गया।  
किस राज्य को कितना पानी
नर्मदा जल का बंटवारा करीब चालीस साल पहले किया गया था , जिसमें मप्र को सबसे अधिक 73 फीसदी पानी आवंटित किया गया था। इसके अलावा तीन अन्य राज्यों को भी पानी का कोटा तय किया गया था। इसमें गुजरात को 36 फीसद , महाराष्ट्र के लिए 2 फीसदी और राजस्थान के लिए एक फीसदी पानी का के उपयोग पर सहमति बनी थी। इसके लिए पानी का आवंटन शंगलु कमेटी ने किया था। इसके लिए सरदार सरोवर बांध को लेकर सर्वाधिक विवाद होता रहा। इसके विवाद की वजह बांध को पूरी क्षमता से भरने के कारण बनी रही थी। इसके बाद कमेटी ने नर्मदा में कुल 34537.44 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी होने का अनुमान लगाया था। जिसके हिसाब से ही चारों राज्यों के बीच पानी का बंटवारा किया गया था। इसके तहत मप्र को 18.25 एमएएफ यानी 22511 मिलियन क्यूबिक लीटर ,  गुजरात के लिये 9 एमएएफ यानी 11101 एमसीएम पानी , राजस्थान को .50 फीसदी एमएएफ और महाराष्ट्र को दशमलव 25 फीसदी पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया था।
77 फीसदी पानी हो रहा बर्बाद
मप्र ही नहीं अन्य राज्य भी तय कोटे का पानी उपयोग करने में असफल साबित हुए हैं। इसकी वजह से सिर्फ चार दशकों बाद भी चारों राज्य मिलकर कुल पानी का 23.64 फीसदी ही उपयोग कर पा रहे हैं जिसके चलते 77 फीसदी पानी बर्बाद हो रहा है।

Ramswaroop Mantri

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