जयपुर
प्रदेश में सरकार के गठन के करीब 28 महीने बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार फिर उपचुनावों की चुनौती से निपटेंगे। 17 अप्रेल को सुजानगढ़, सहाड़ा और राजसमंद विधानसभा उपचुनाव होंगे। इसी सरकार में 21 अक्टूबर 2019 को मंडवा और खींवसर विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव हो चुके हैं। इन चुनावों में भी कांग्रेस ने अपने टिकट राजनेताओं के परिवारों को बांटे थे और इस बार भी दिवंगत विधायकों के परिवारजनों को ही टिकट दिए गए हैं। हालांकि उपचुनाव देखने में भले ही छोटे लगें लेकिन कई मौकों पर राजस्थान की सियासत में इन्होंने गहरी छाप भी छोड़ी है।
राजस्थान में उपचुनावों की जमीन से सत्ता के कई क्षत्रप प्रकट हुए हैं। इनमें से कईयों ने आगे चलकर न सिर्फ अपना वर्चस्व जमाया बल्कि सत्ता के शिखर तक भी पहुंचे। जय नारायण व्यास, पंडित नवल किशोर शर्मा, माणिक्य लाल वर्मा,राम निवास मिर्धा, शिवचरण माथुर, कमला बेनीवाल, कप्तान छुट्टन लाल मीणा, धर्मपाल चौधरी, भवानी जोशी, कृष्णेंद्र कौर दीपा, पुष्पेंद्र बाली, कमल मोरारका सुरेंद्र व्यास, यशोदा कुमारी, बृज सुंदर शर्मा, अब्दुल हादी सरीखे नेता प्रदेश में उपचुनावों की ही देन रहे।
भैरोसिंह शेखावत: विधायक तो कई बार रहे लेकिन सीएम उपचुनाव जीतकर बने
भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत की सियासत में एंट्री भले उपचुनाव से नहीं हुई। लेकिन वे पहली बार मुख्यमंत्री उपचुनाव जीतकर ही बने। हालांकि शेखावत ने पहला चुनाव 1952 में ही लड़ लिया था। लेकिन 1977 में छबड़ा में भाजपा प्रत्याशी के इस्तीफा देने के बाद वे वहां से उपचुनाव जीते और प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनाई।
जयनारायण व्यास : विधानसभा चुनाव हारे फिर उपचुनाव जीतकर सीएम बने
भैरोसिंह शेखावत की तरह ही जयनारायण व्यास भी उपचुनाव जीतकर ही मुख्यमंत्री कुर्सी तक पहुंचे। 1952 में व्यास ने दो सीट जोधपुर और जालौर से विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन दोनाें जगह से हार गए और टीकाराम पालीवाल कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन इसके बाद व्यास ने किशनगढ़ की सीट खाली करवाकर उपचुनाव जीता और टीकाराम पालीवाल को हटाकर मुख्यमंत्री बन गए।
मोरारका ने मैदान छोड़ा तो नवल किशाेर शर्मा की किस्मत चमकी
नवल किशाेर शर्मा की सियासत में एंट्री भी रोचक रही। 1969 के उपचुनाव में कांग्रेस ने आरआर मोरारका को स्वतंत्र पार्टी के प्रत्याशी के सामने उतारा। मोरारका के कवरिंग में नवल किशाेर शर्मा को फार्म भरवाया गया था। मोरारका एन वक्त पर चुनावी मैदान छोड़ मुंबई चले गए और नवल किशोर शर्मा मुख्य प्रत्याशी बन गए। नवल किशाेर ने यह चुनाव जीता। इसके बाद उनकी गिनती राजस्थान के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं में हुई। केन्द्र की कांग्रेस सरकारों में वो मंत्री भी बने और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी बने। बाद में वे गुजरात के राज्यपाल भी बने।
शिवचरण माथुर: लोकसभा उपचुनावों से सियासत में एंट्री, आगे चल सीएम भी बने
दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। शिवचरण माथुर की सियासी एंट्री 1964 में भीलवाड़ा सीट पर हुए लोकसभा उपचुनाव से हुई। इस चुनाव में शिवचरण माथुर ने अपने प्रतिद्वंदी को करीब तीन गुना अंतर से हराया। 1981 में वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 1989 में वे फिर से मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वे असम के राज्यपाल भी बने।
कमला बेनीवाल: कांग्रेस की जाट राजनीति का चेहरा रहीं कमला बेनीवाल भी उपचुनावों से ही निकलीं। उन्होंने 1954 में आमेर विधानसभा सीट से उपचुनाव जीता। इसके बाद वे राजस्थान की उपमुख्यमंत्री से लेकर गुजरात और मिजोरम की राज्यपाल तक बनीं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रामनिवास मिर्धा भी उपचुनाव से ही विधानसभा पहुंचे। आगे चलकर वे नागौर में कांग्रेस के सियासी ब्रांड बने।
पुष्पेंद्र सिंह बाली: प्रधानी से सीधे उपचुनाव जीते, फिर लगातार चार चुनाव और जीते
2002 के उपचुनावों में कांग्रेस के भीमराज भाटी के सामने वसुंधरा राजे ने पुष्पेंद्र सिंह को टिकट दिया। उस वक्त वे बाली में प्रधान रह चुके थे। इस चुनाव को पुष्पेंद्र ने जीता और इसके बाद 2003, 2008, 2013 और 2018 में लगातार भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े और जीते। 2013 से 2018 तक भाजपा की सरकार में पुष्पेंद्र सिंह ऊर्जा मंत्री भी रहे।
कनक मल कटारा : पुष्पेंद्र सिंह के साथ कनकमल कटारा की एंट्री भी 2002 के सागवाड़ा विधानसभा के उपचुनावों से हुई। इसके बाद 2003 के विधानसभा चुनाव में वे जीते। 2008 में वे हार गए और 2013 में उनका टिकट कट गया। लेकिन 2019 में उन्हें बांसवाड़ा लाेकसभा सीट का टिकट मिला और वे सांसद बन गए।





