सुसंस्कृति परिहार
अजब संयोग है जब जब भाजपा मुश्किल भरे चुनावों के बीच होती है।जनता द्वारा चुनावी जीत के डंका की पोल खुलने लगती है तो जवानों के शहादत की हृदयविदारक ख़बरें आकर उन करतूतों पर पानी फेर देती हैं ।कश्मीर के पुलबामा की घटना में चालीस जवानों की विस्फोटक के जरिए दुर्दांत मौत के बाद सब कुछ सहम गया तब भी चुनाव थे। जवानों की मौत पर तब भी घड़ियाली आंसू आए थे और उन्हें वोट में तब्दील किया गया था।लोग चुनाव में जवानों की शहादत पर फिदा होकर साहिब के दुख में शरीक हो उन्हें जीत का सेहरा बांध देते हैं ।
गत दिनों छत्तीसगढ़ के बीजापुर में माओवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में मारे गए जवानों की संख्या बढ़कर 22 हो गई है. नक्सल ऑपरेशन के डीजी अशोक जुनेजा ने इसकी पुष्टि की है. वहीं एक कोबरा जवान शनिवार को मुठभेड़ के बाद से ही लापता है.गृहमंत्री अमित शाह ने मुठभेड़ के बाद मौजूदा हालात की दिल्ली में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक की।दिल्ली पहुंचने से पहले गुवाहाटी में संवाददाताओं से बात करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था, “मैं जवानों के परिवारों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा.”गृृह मंत्री जी सच ही कह रहे हैं छत्तीसगढ़ के आसपास विधानसभा चुनाव चल रहे हैं जहां एड़ी चोटी के जोर के बावजूद मुश्किल में है ।शायद ये बलिदान काम आ जाए तथा बंगाल के वामपंथी मोर्च को माओवादी कहकर लपेटाा जा सके।इधर मामले पर नजर रखने वाले कुछ अधिकारियों का कहना है कि कुछ जवानों की मौत की वजह डिहाइड्रेशन भी थी.उनका कहना है कि बड़ी संख्या में माओवादी भी हताहत हुए हैं लेकिन अफसोस एक की भी अब तक पुष्टि न हीं हो सकी ।
बहरहाल ,एक बात और भाजपा को बेचैन किए है वह है छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार और उसके प्रभावकारी मुख्यमंत्री ।उनकी लोकप्रियता और छग में दलबदल की असफलता के लिए इस घटना का इस्तेमाल हो सकता है ।भाजपा माओवाद से कैसे निपटती है इसके लिए यह खबर देखें। बताते चलें पूर्व सीएम रमन सिंह ने के पी एस गिल को छ्त्तीसगढ़ में माओवाद से निपटने के लिए बुलाया था और कहा था वेतन लो और मौज करो।रमन सिंह और नक्सलवादियों के काफी घनिष्ठ संबंध बताए जाते रहे हैं ।हाल ही में के पी एस गिल ने रमन सिंह की सारी पोल पट्टी खोल के रख दी है ।रमन सिंह में ना तो माओवादियों से लड़ने की मानसिकता थी और ना इच्छा शक्ति थी ये बात छग मुख्यमंत्री रमन सिंह ने सलाहकार और आपरेशन ब्लूस्टार के हीरो के पी एस गिल ने कही है।
25 मई 2013 को बस्तर के दरभा घाटी में हुए नक्सली हमले में तो कांग्रेस नेताओं की एक पूरी पंक्ति ही खत्म हो गई थी। पूर्व मंत्री, आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 लोग इस हमले में मारे गए थे। इस घटना ने भाजपा शासन की नक्सल नीति पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया था।
चुनावी रणनीतिकार के तौर पर अपनी पहचान रखने वाले प्रशांत किशोर इन दिनों पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। प्रशांत किशोर ने एक महीने पहले एक न्यूज चैनल के साथ इंटरव्यू के दौरान कहा था कि अगर चुनावों के बीच में पैरामिलिट्री फोर्स पर कोई हमला नहीं हुआ तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी और भाजपा के बीच जीत हार का बड़ा फासला रहने वाला है यानी कि टीएमसी जीतेगी और भाजपा बड़े अंतर से हारेगी।
ये तमाम बातें जाहिरा तौर पर अनिष्ट की संभावना के संकेत देती हैं ऐसा ना हुआ हो तो अच्छा है। जवानों के बलिदान को व्यर्थ ना जाने देने की बात कहना सहज है लेकिन इन हादसों के पीछे यथास्थिति जब तक टटोली नहीं जाती बस्तर की ज़मी ख़ूं से सिंचती रहेगी । माओवादियों की मांगों के औचित्य को समझने की ज़रूरत है जिनके खनिज,वन जल और मानव संसाधनों पर बाहरी कब्ज़ा हो उनके हिस्से में कुछ भी न आए तो क्योंकर वे बागी ना बनें । निश्चित तौर पर वे अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। दिल्ली और रायपुर में बैठी सरकारों को उनसे बातचीत की पहल करनी होगी।तब सचाई भी सामने आ सकती है कि उनके साथ अप्रत्यक्ष तौर पर और किनके हाथ है।जो वेतन लेकर मौज की बात करते हैं ।





