कुमार चैतन्य
कुछ लोग अपने जीवन में मन के चालाकी से कुछ ऐसा काम कर लेते है कि तात्कालिक तो उनको फायदा मिलता है लेकिन भविष्य के लिए वही चालाकी नासूर बन जाता है। वो महात्मा जी भी कुछ ऐसे ही काम अपनी चालाकी से कर लिए जो अब उनके जीवन का नासूर बन चुका था। उनका भोजन, पानी , नींद, चैन सब उड़ चुका था।
महात्मा जी को अगली सुबह सामने बैठाकर कुछ सत्संग किया हमने उनसे कहा कि सबसे पहले आप जो भी करते हो बंद कर दो। साधना, तपस्या सब बंद कर दो। आप सुबह 4 घंटे ध्यान करते हो उसे भी बंद कर दो। ये सभी पोथी पुराण भी बांधकर एक तरफ रख दो। ये सभी ध्यान, ज्ञान, साधना, तपस्या स्वस्थ व्यक्ति के लिए हैं। पहले स्वस्थ हो फिर इच्छा हो तो कर लेना आप।
अब हम बात हम शुरू करते है पहली कक्षा के विद्यार्थी की समझ से.
हमने महात्मा जी से पूछा, इस जगत, संसार, दुनियां या ब्रह्मांड कहिए इसका स्वामी कौन है?
निश्चित ही ईश्वर।
इसे किसने बनाया और कौन चलाता है?
उसने कहा वो ही ईश्वर।
हमने कहा, ये बिल्कुल सत्य है। वो ईश्वर या परमात्मा ही इस जगत का नियंता है। ये बात तो कृष्ण ने भगवत गीता में भी कही है। हम सब करके भी अकर्ता हैं | हमने एक बार फिर उनसे पूँछा इसमें तुम्हें कोई शंका है क्या ? कि इस संसार को वो ईश्वर ही चलाता है।
उसने कहा नहीं स्वामी जी। ये तो सर्वथा सत्य है।उन्होंने कहा, वो तो काल भी है, महाकाल भी है, दाता भी है, संरक्षक भी है।
हमने कहा, बातें तो तुम ज्ञानियों जैसी ही करते हो, बस ज्ञान है नहीं। हमें तो उस ईश्वर के होने में कोई शंका नहीं है पर तुम्हें क्यों है ? उस व्यक्ति ने कहा इसमें कोई शंका हो ही नहीं सकती है | ईश्वर के होने में क्या शंका हो सकती है ? अगर तुम्हें शंका नहीं है तो तुम खुद को क्यों ईश्वर मान बैठे हो ?
अब शुरू हुआ प्रहार.
आपने मुझे बताया अगर आप ऐसा नहीं करते तो वो लोग आत्मा हत्या नहीं करते। उस परिवार को समय से धन राशि दे दी होती तो उस लड़की की शादी हो जाती | कोई आत्म हत्या नहीं करता।
हमने पूँछा ऐसा ही है न ? इसका तो यही अर्थ हुआ कि आप तो विधाता हो गए |!? आप तो ये मान बैठे हो ये सब कुछ आप कर रहे हो | जब आप ही सब कर रहे हो तो इतने परेशान क्यों हो। समर्थ को तो कोई दोष लगता नहीं है और अगर आप ये मानते हो कि ईश्वर के इस जगत में, आप मात्र एक कठपुतली हो तो भी परेशानी का कोई कारण नहीं है।
भगवत गीता में कृष्ण ने ये बात साफ शब्दों में कही है। हम ही इस जगत के संचालक हैं। हम ही नियंता हैं। हम ही इस जगत के हर कण की चेतना हैं | हम ही एक मात्र कर्ता हैं | आप तो निमित्त मात्र हैं | आप ऐसे कैसे 25 साल से भगवत गीता पढ़ रहे हो ? जो खुद को ही विधाता मान बैठे?
फिर हमने उदाहरण के लिए जन्मेजय और वेदव्यास की कथा सुनाई। और कुछ महाभारत की कथा हमने उनको सुनाया।
अब आप बताइए कि आप खुद को क्यों और कैसे ईश्वर मान बैठे हो ?
वो व्यक्ति वहीं पैरों में लोट गया, बहुत देर तक उठा ही नहीं।उठाना पड़ा।रोता ही रहा। हमने कहा ठीक से अभी काम पूरा नहीं हुआ है। सिर्फ ग्लानि निकली है। अभी बहुत कुछ करना है इस नरक से निकलने के लिए।
पश्चाताप कभी नहीं करना, किसी भी परिस्थिति में नहीं होना चाहिए। प्रायश्चित करो। अभी प्रायश्चित पूरा बाकी है। तुम्हारे लिए बहुत काम बाकी है। जो लोग संवेदन शील होते हैं उनसे बहुत से जीव जन्तु भी उम्मीद लगाते हैं। इनके साथ हमारा भी उद्धार हो जाएगा।
कारण इनके ही प्रायश्चित में बहुतों के उद्धार हो पाते हैं। जिनके अंदर संवेदना नहीं वो तो अपने मरे हुए बाप को भी एक लोटा पानी नहीं देते हैं। तो यहाँ बहुत सारे जीव हैं जो इंतजार कर रहे हैं। आपके प्रायश्चित का। अगर आप लोगों को संध्या की जीवन गाथा याद हो तो वो ऐसे ही एक हवन में शरीर त्यागकर निष्पाप हुई थीं।
फिर हमने उनसे कहा कि सबसे पहले आप ध्यान करना बंद करो। इसके अलावा आप जो भी भजन, जाप आदि कर रहे हो उसे बंद कर दो। जो लोग भी ध्यान करते हैं इस सूत्र को ठीक से समझ लें। ध्यान तब किया जाता है जब मन शांत हो। तो ये और गहरी शांति में ले जाएगा। फिर वो शांति बनी रहे इसके लिए ध्यान की सजगता बनाये रखनी होती है।
अगर परेशानी में ध्यान कर रहे हो तो पहले ये बात समझ लो आप परेशानी में ध्यान नहीं कर रहे हो बल्कि परेशानी पर ध्यान कर रहे हो ये और परेशानी में डालेगा। अगर डर में ध्यान कर रहे हो, तो डर पर ही ध्यान कर रहे हो और गहरे डर में उतर जाओगे। जो लोग भी ध्यान करते है या जो संस्थाएं ध्यान करवाती हैं। वो आधा तो पातंजली ले लेती हैं, यम नियम और विपश्यना करवाती हैं। खान पीन तो पातंजली वाला है लेकिन ध्यान श्वांस पर होता है। जिन्हें व्यवसाय चलाना है कुछ तो नौटंकी करनी ही होगी।
योगतंत्र के संन्यासी का ध्यान रात्रि 12 बजे से 4 बजे के बीच होता है। उस समय विचार ठीक से जन्म नहीं ले पाता है | सुबह ध्यान करने को गृहस्थ से कहा जाता है। क्योंकि ये उससे हो नहीं पाएगा। सुबह शांति होती है वातावरण शुद्ध होता।लेकिन ध्यान कर्ता के भीतर रात का ही कचरा भरा है उसका क्या करें।
रात को जब सोये थे तब समस्या लेकर सोये थे।अवचेतन ने उस पर रात भर काम किया है। जब जागोगे तो मन और ढेर सारे विचार लेकर खड़ा है। अशांत चित्त से किया गया ध्यान आपको और रोगी बनाएगा।
अगर कोई व्यक्ति आपके दिमाग से निकल ही नहीं रहा है।इसका सीधा अर्थ है। वो भी आपका चिंतन कर रहा है। एक रोग वो है जिसे आप पकड़ लेते हो, दूसरा रोग जो आपको पकड़ लेता है।
जब रोग आपको पकड़ा हुआ है तो उसका इलाज है। लेकिन यदि आपने रोग को पकड़ा हुआ है तो उसका कोई इलाज नहीं है। जैसे पकड़ा है वैसे ही छोड़ना होगा।
जब तोतापुरी ने रामकृष्ण से कहा कि सबसे पहले ये तेरी माता काली को अंदर से बाहर निकाल। तब रामकृष्ण ने पूँछा है ये मेरे दिल में है कैसे निकालूँ। तब उन्होंने पूँछा है अंदर कैसे किया था ? जैसे अंदर किया है वैसे ही बाहर भी करना होगा ये बात ठीक से समझ लेना और अगर नहीं निकाल पाए तो अगला जन्म और जीवन का नरक तो तय हो गया|





