सनत जैन
डॉलर के मुकाबले में रुपए में तेजी के साथ गिरावट दर्ज की गई है। एक दिन में 54 पैसे की गिरावट के साथ रुपया 87.48 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। भारतीय रुपया ने सारी दुनिया में डॉलर के मुकाबले एक नया इतिहास बनाया है। वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है, जिस तरीके से रुपया पीछे की ओर दौड़ लगा रहा है। जल्द ही रुपया 92 के स्तर पर पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। डॉलर के मुकाबले एशिआई देशों की मुद्रा में गिरावट देखने को मिल रही है। भारत में रुपया अन्य देशों की तुलना में सबसे तेजी के साथ गिर रहा है।
डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमतों से भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगना तय माना जा रहा है। भारत में खाद्य तेल, दलहन, तिलहन, डीजल, पेट्रोल, खाद, दाल, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, दवाई एवं मशीनों के उपकरण महंगे होंगे। यह सभी सामान विदेश से आयात किए जाते हैं। चीन से भी पिछले वर्षों में आयात बढ़ा है, जिसके कारण भारतीय बाजार में आयातित सामग्री के मूल्य बढ़ेंगे। इसका असर भारत मे महंगाई एवं बेरोजगारी के रूप में बड़े पैमाने पर पड़ना तय है। जिस तरह से डॉलर के मुकाबले रुपया तेजी के साथ गिर रहा है, उतनी ही तेजी के साथ भारत की आर्थिक चुनौतियां बढ़ती चली जा रही हैं। लाखों छात्र विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं। इन्हें विदेश में डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को विदेश में पढ़ाई के लिए भेजा था, वह बड़े आर्थिक संकट में फंस गए हैं। वह अपने बच्चों की फीस और अन्य खर्च की राशि नहीं भेज पा रहे हैं। विदेश भेजने के लिए बैंक से लोन उठाया था, उसे भी चुका पाने की स्थिति अब नहीं रही। विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को दो वक्त का खाना, खाना भी मुश्किल हो गया है।
ऐसी स्थिति में पढ़ाई को बीच में छोड़कर ही बच्चों को भारत वापस आना पड़ सकता है। कच्चे तेल और आयातित गैस के दाम डॉलर के कारण बढ़े हैं। जिसके कारण भारत में ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ेगी। बेतहाशा महंगाई बढ़ेगी। खाने-पीने की चीजें और भी महंगी होंगी। भारत का निर्यात कम है। भारत में बड़े पैमाने पर आयात किया जा रहा है। आयात निर्यात, व्यापार घाटा लगातार बढ़ता चला जा रहा है। भारत को डॉलर के मुकाबले रुपए का दाम गिरने से ज्यादा भुगतान करना होगा, वहीं शेयर बाजार में पिछले कई महीनो से विदेशी निवेशक अपनी पूंजी निकालकर भाग रहे हैं। जिसके कारण भारत सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार दिनों-दिन कम होता चला जा रहा है। एक बार फिर भारत गहरे आर्थिक संकट में फंसता हुआ दिख रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो गया था, ऐसी स्थिति में सोना गिरवी रखकर कच्चा तेल आयात करना पड़ा था। उस समय वैश्विक व्यापार संधि जैसी कोई सुविधा नहीं थी, जिसके कारण सोना गिरवी रखना पड़ा था। वैसी ही स्थिति एक बार फिर भारत में बनने लगी है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत की जीडीपी का चार गुना ज्यादा कर्ज भारत सरकार के ऊपर है। ब्याज और किस्त के रूप में केंद्रीय बजट की आय की 25 फ़ीसदी राशि ब्याज के रूप में सरकार को खर्च करना पड़ रही है। जिसके कारण भारत की विकास योजनायें समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं। महंगाई और बेरोजगारी के कारण आम आदमी अपनी रोजाना की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं, जिसके कारण 140 करोड़ की आबादी में लगातार सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ता चला जा रहा है। एक तरह से हम श्रीलंका और बांग्लादेश जैसी आर्थिक स्थिति में फंस रहे हैं। अर्थव्यवस्था का जो ढिंढोरा पिछले 10 साल से सरकार पीट रही है, अब उसकी असलियत खुलकर सामने आने लगी है। पिछले 10 वर्षों में सरकार टैक्स लगातार बढ़ाती जा रही है। गरीबों से भी बड़े पैमाने पर टैक्स वसूल किया जा रहा है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की टैक्स की आय पिछले वर्षों में लगातार बढ़ती चली गई। इसके बाद भी केंद्र एवं राज्य सरकारों ने पिछले वर्षों में सरकारी खर्च को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर कर्ज लिया है। सरकार ने अपने खर्च खूब बढ़ा लिए हैं। दुनियाभर के देशों में सबसे ज्यादा टैक्स इस समय भारत में आम आदमी से वसूल किया जा रहा है। भारत के लोगों की बचत खत्म होती जा रही है। गरीब और मध्यम वर्ग पर कर्ज बड़ी तेजी के साथ बढ़ता जा रहा है। जीवन जीने के लिए जो जरूरी है, वह भी गरीब और मध्यम वर्ग को उपलब्ध नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण लोगों में अब गुस्सा देखने को मिलने लगा है।
डॉलर के मुकाबले जिस तरह रुपए की कीमत गिर रही है, उसने भारत को गहरे आर्थिक संकट में फंसाने का काम किया है। केंद्र सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है इसको लेकर आर्थिक विशेषज्ञ चिंतित हो उठे हैं। दुनिया के देशों में आर्थिक मंदी का जो संकट देखने को मिल रहा है। वर्तमान स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगना तय माना जा रहा है। सरकार को इस स्थिति में अपनी आर्थिक नीतियों में बड़े बदलाव की जरूरत है। आय के मुकाबले खर्च करने की रणनीति अपनाना होगी। कर्ज लेने से बचना होगा। आयात को कम करना होगा, निर्यात को बढ़ाना होगा।
देश में शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाना होगा। रोजगार के अवसरों को बढ़ाना होगा। सरकारी लाल फीता शाही और कानून के मकड़जाल से असंगठित क्षेत्र को बाहर निकालना होगा। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व रीढ़ की हड्डी की तरह है। भारत में जब फसलें अच्छी होती हैं, तभी भारत की अर्थव्यवस्था में बहुआयामी परिवर्तन देखने को मिलते हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों को किसानों को आत्मनिर्भर और फसलों को बेहतर बनाने की दिशा में काम करना होगा। तभी भारतीय अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। उसके अलावा अन्य और कोई विकल्प नहीं है।





