( ‘चूके तो फिर लख चौरासी’ : अस्वाभाविक, असम्भव और अवैज्ञानिक !)
डॉ. विकास मानव
पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुनापढ़ा होगा। हम जिस योनि को जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है।
अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है।
कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं।
सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है – हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है।
अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है।
अब प्रश्न ये है कि यहाँ “योनि” का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है।
इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है।
आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है।
इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं।
अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है।
इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम “मोक्ष” की प्राप्ति करना कहते है।
मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर परम आनंद में लीन हो जाना है। यह जीवन में संभव होगा तभी मृत्यु के बाद संभव होगा.
ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है।
मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है।
चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है।
विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। किन्तु दुर्भाग्य ये है कि लोग इस बात का महत्त्व समझते नहीं हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है।
एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है – नहीं।
मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है।
मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं।
इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे।
महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ।
विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे।
ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में “यमल” एवं “अर्जुन” नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था।
वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है – नहीं।
हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो।
इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है; जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके।
मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, तब भी मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग 75 है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है।
कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है।
स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते।
रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन “राम-नाम” है. यह महज बकवास है धूर्त पंडितों की. सत्कर्म और परहित के अलावा कोई विकल्प नहीं. अगर है तो वो है ध्यान साधना और सम्भोग साधना. यह तो असम्भव जितना मुश्किल हो गया है आजकल.
पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है:
जलज नवलक्षाणी,
स्थावर लक्षविंशति
कृमयो: रुद्रसंख्यकः
पक्षिणाम् दशलक्षणं
त्रिंशलक्षाणी पशवः
चतुरलक्षाणी मानव
अर्थात,
जलचर जीव – ९००००० (नौ लाख)
वृक्ष – २०००००० (बीस लाख)
कीट (क्षुद्रजीव) – ११००००० (ग्यारह लाख)
पक्षी – १०००००० (दस लाख)
जंगली पशु – ३०००००० (तीस लाख)
मनुष्य – ४००००० (चार लाख)
इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है।
जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार:
पृथ्वीकाय – ७००००० (सात लाख)
जलकाय – ७००००० (सात लाख)
अग्निकाय – ७००००० (सात लाख)
वायुकाय – ७००००० (सात लाख)
वनस्पतिकाय – १०००००० (दस लाख)
साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) – १४००००० (चौदह लाख)
द्वि इन्द्रियाँ – २००००० (दो लाख)
त्रि इन्द्रियाँ – २००००० (दो लाख)
चतुरिन्द्रियाँ – २००००० (दो लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) – ४००००० (चार लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (देव) – ४००००० (चार लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) – ४००००० (चार लाख)
पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) – १४००००० (चौदह लाख)
इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४०००००
अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। यह उसके बस का नहीं तो, मात्र 24 घंटे के लिए खुद को मुझे दे. मैं उसे सभी योनियों का सफर करा दूंगा और उसके खुद के जीवन-सफर का सफर भी.
चूके तो फिर लख चौरासी’ अस्वाभाविक और अवैज्ञानिक!
मनुष्य कभी पशु हुआ हो सकता है, लेकिन दुबारा पशु नहीं हो सकता। ऐसा होना डेवलपमेंट की थ्योरी के खिलाफ है. ऐसा होना अस्वाभाविक है. पीछे लौटना नहीं होता है।
पीछे की योनि में से आगे आना स्वाभाविक है लेकिन यह नहीं हो सकता कि आगे की योनि में से पीछे लौटना पड़े। इस जगत में पीछे लौटना होता ही नहीं, पीछे लौटने का उपाय ही नहीं है। दो ही उपाय हैं —या तो आगे बढ़े, या जहां हैं वहां ही रुक जाएं।
स्कूल में बच्चा पहली कक्षा में पढ़ता है। वह उत्तीर्ण हो जाए तो दूसरी कक्षा में चला जाए, और अनुत्तीर्ण हो जाए तो पहली कक्षा में ही रह जाए, लेकिन पहली कक्षा से उसे निकालने का कोई उपाय नहीं है। जब दूसरी कक्षा में कोई असफल हो जाए, तो उसे पहली कक्षा में उतारने का भी कोई उपाय नहीं।
जिस योनि में हम होते हैं, हम या तो उस योनि में टिक सकते हैं बहुत लंबे समय तक, या हम आगे जा सकते हैं, लेकिन पीछे नहीं लौट सकते।
अगर हम अपने पिछले जन्मों में उतरेंगे, तो हमें याद आएंगे वह सब जन्म, जब हम चिड़िया भी रहे होंगे, पशु भी रहे होंगे, स्त्री भी रहे होंगे, पक्षी भी रहे होंगे। और— और नीचे, और— और नीचे, इतनी जड़ता रही होगी जहां कि चेतना का कोई सूत्र ही खोजना मुश्किल है।
पहाड़ भी जीवन है। वहां भी जीवन है, लेकिन चेतना न के बराबर है। निन्यानबे प्रतिशत जड़ता है, एक प्रतिशत चेतना है। निरंतर चेतना बढ़ती चली जाती है और जड़ता कम होती चली जाती है।
परमात्मा है, वह सौ प्रतिशत चेतन है। पदार्थ और परमात्मा में प्रतिशत का अंतर है। पदार्थ और परमात्मा में कोई क्वालिटी का अंतर नहीं है, क्वांटिटी का अंतर है। कोई गुण का अंतर नहीं है, मात्रा का अंतर है। इसलिए पदार्थ परमात्मा हो सकता है।
यह बहुत हैरानी या कठिनाई की बात नहीं है कि कोई आदमी पिछले जन्मों में पशु रहा हो। बड़ी कठिनाई तो तब होती है, जब कुछ लोग आदमी होते हुए भी पशु ही होते हैं। आदमी होते हुए भी हमारी चेतना इतनी क्षीण हो सकती है कि सिर्फ देह के तल पर हम आदमी मालूम हो सकते हैं। अगर हम अपनी वृत्तियों को खोजने जायें, तो हमें ऐसा ही लगेगा कि हम पशु तो नहीं हैं, लेकिन आदमी भी नहीं हो गए हैं। कहीं बीच में अटक गये हैं। इसलिए जब भी मौका आता है, तो हम फिर से पशु हो जाने में देर नहीं लगाते। बहन, बेटी ही नहीं माँ तक को बलात भोगना क्या है? बहन भाई, बाप बेटी, माँ बेटे के बीच सहमति से सेक्स क्या है? ऐसा क्यों हो जाता है?
हमारी आदमियत बहुत स्किन डीप है। जरा—सा हम खरोंच दें तो भीतर का पशु निकल आता है। वह निकल इसीलिए आता है क्योंकि हम वह रहे हैं। क्योंकि वह जो ग्रोथ है हमारी, वह जो आदमी होना है, वह ऊपर से तो आ गया, लेकिन भीतर अभी भी पशु मौजूद है।
इसलिए उसको खोदने में देर नहीं लगती। हिंदुओं को कह दो कि हिंदू धर्म खतरे में है, कूद जाता है। मुसलमान को कह दो कि मुसलमान धर्म खतरे में है, कूद जाता है। कहीं गहरे नहीं जाना पड़ता है। आदमी, जो बिलकुल भला दिखाई पड़ता है, सफेद कपड़े पहने हुए, खादी पहने हुए, वह भी वही है। वह भी सब स्किन डीप है। जरा सा खरोंच दो तो भीतर का पशु निकल आये।
जब पशु निकलता है, तो इतने जोर से प्रकट होता है कि ऐसा लगता है कि यह आदमी कभी आदमी रहा होगा, यह भी संदिग्ध है।
यह जो हमारी स्थिति है, उसमें हमारा वह सब मौजूद है, जो हम कभी रहे होंगे। उसकी परतें हैं भीतर, और अगर जरा खोदा जाए तो भीतर की परतों तक हम पहुंच सकते हैं।
हम पत्थर की परत पर भी पहुंच जा सकते हैं, वह भी हमारी परत है। क्योंकि बहुत गहरे अंतःकरण में हम अब भी पत्थर हैं। इसलिए अगर वहां तक हमें खरोंचा जाये, तो हम पत्थर की तरह भी व्यवहार करते हैं, कर सकते हैं। पशु की तरह भी व्यवहार करते हैं, कर सकते हैं।
आगे की हमारी सिर्फ संभावनाएं हैं, वे हमारी परतें नहीं हैं। इसलिए कभी —कभी छलांग लगाकर छूते हैं, लेकिन फिर जमीन पर वापस लौट आते हैं। वह हमारी संभावनाएं हैं। देवता भी हम हो सकते हैं, लेकिन हम कभी रहे नहीं। परमात्मा हम कभी हो सकते हैं, लेकिन… जो हम रहे हैं, वह हमारी स्थिति है।
तो ये दो बातें हैं कि अगर हमारे अंदर थोड़ा खोदा जाए, तो हमारे भीतर की स्थितियां मिल जाएंगी; और अगर हमें और आगे फेंका जाए, तो हमारी आगे की स्थितियों का अनुभव होता है। लेकिन जैसे कोई आदमी जमीन पर छलांग लगाए, तो एक सेकेंड को जमीन के बाहर हो जाता है, आकाश में होता है, लेकिन फिर वापिस जमीन पर खड़ा होता है। ऐसे ही हम छलांग लगा—लगाकर आदमी होते रहते हैं।
हम कभी —कभी आदमी होते हैं, बाकी हम पीछे खड़े हो जाते हैं। अगर बहुत गौर से देखें, तो चौबीस घंटे में हम कभी—कभी किसी क्षण में ठीक आदमी होते हैं। हम सब जानते भी हैं।
भिखमंगे आपने देखे हैं। वह सुबह भीख मांगने आते हैं, शाम नहीं आते। क्योंकि शाम तक आदमी होने की संभावना कम हो जाती है। सुबह—सुबह ताजा आदमी होता है, रात भर का विश्राम किया हुआ। न कोई झगड़ा, न कोई कलह, न गाली, न गलौज, न उपद्रव। सुबह उठता है, ताजा—ताजा होता है। भिखारी सामने आ जाता है, तो आशा होती है कि वह थोड़ी आदमियत का व्यवहार करेगा। लेकिन सांझ ऐसी आशा नहीं होती है। इसलिए सांझ भिखारी नहीं आता है। वह जानता है कि दिन भर की खरोंच ने आदमी के भीतर की परतों को जगा दिया होगा—दफ्तर ने, दुकान ने, बाजार ने, दंगा—फसाद ने, अखबार ने, नेताओं ने गड़बड़ कर दिया होगा। और वह भीतर की जो परतें हैं, वे जग गई होंगी। सांझ को कोई भिखमंगा भीख मांगने नहीं आता, क्योंकि सांझ को आदमी थक गया होता है, जानवर हो गया होता है।
इसलिए रात को जो क्लब पैदा होते हैं, उनमें जानवरियत दिखाई पड़ती है। इसका और कोई कारण नहीं है। रात के क्लब, नाइट क्लब, जरूर वह पशुओं की प्रवृत्तियों के हो जाते हैं। वह दिन भर का थका हुआ आदमी आदमियत से थक जाता है। वह कहता है, हमें पशु चाहिए, शराब चाहिए, जुआ चाहिए, नाच चाहिए, नंगापन चाहिए, हो —हुल्लड़ चाहिए। तो रात के जो क्लब हैं, वे आदमी की पशुता के इर्द—गिर्द निर्मित होते हैं।
इसलिए प्रार्थना करनी हो, तो सुबह ही अच्छा है। सांझ जरा शक है कि प्रार्थना संभव हो पाए। इसीलिए मंदिर सुबह घंटियां बजा देते हैं। रात में क्लबों के द्वार खुल जाते हैं, ज़ुआघर खुल जाते हैं, शराबखाने खुल जाते हैं। वेश्या सुबह—सुबह नहीं आमंत्रण दे पाती, रात में ही आमंत्रण दे पाती है।
दिन भर का थका हुआ आदमी जानवर हो जाता है। इसलिए रात के अलग धंधे हैं और सुबह की अलग दुनिया है। ये चर्च सुबह, ये मस्जिद सुबह अजान दे देती है, मंदिर सुबह घंटी बजा देते हैं। थोड़ी—सी आशा है कि सुबह का जागा हुआ आदमी शायद परमात्मा की तरफ थोड़ी आंख उठा ले। सांझ को थके हुए आदमी से कम आशा रह जाती है।
इसीलिए बच्चों से ज्यादा आशा होती है कि वे परमात्मा की तरफ झुक जाएं। बूढ़ों से कम आशा होती है, क्योंकि वह सांझ है जिंदगी की। वह जिंदगी भर ने उनका सब उघाड़ दिया होगा, सब उखाड़ दिया होगा।
इसलिए जितनी जल्दी हो सके, जितनी सुबह हो सके, उतनी जल्दी यात्रा पर निकल जाना चाहिए। सांझ आ ही जाएगी। इसके पहले कि सांझ आए, अगर हम सुबह यात्रा पर निकल गए हों, तो यह भी हो सकता है कि सांझ भी हम खुद को मंदिर में पाए। मंदिर से यहाँ मेरा अर्थ आत्म मंदिर है, बुत मंदिर नहीं.





