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लोहिया ने विपक्ष की राजनीति को धारदार और असरदार बनाया

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मोहन सिंह

भारतीय राजनीति के इतिहास में आजादी के बाद विपक्ष की राजनीति को धारदार और असरदार बनाने में राम मनोहर लोहिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। यही नहीं उनकी मौजूदगी के बिना नब्बे के दशक की कम से कम हिंदी पट्टी की राजनीति कमोबेश उस दिशा में ही आगे बढ़ी, जिसके बीज ‘गैर कांग्रेसवाद’ की रणनीति के तहत लोहिया ने रोपा था। हांलाकि उनके आलोचक आज की भाजपा और उनके समय के जनसंघ को फलने-फूलने में इसे एक ‘रणनीतिक चूक ‘ के रूप में रेखांकित करते हैं।सुपरिचित मार्क्सवादी आलोचक रामविलास शर्मा कहते है कि नब्बे के दशक की राजनीति पर जितना असर राम मनोहर लोहिया का पड़ा  उतना गांधी और आम्बेडकर दोनों का नहीं। उनके मुताबिक लोहिया का ‘गैरकांग्रेसवाद’ (तब) सोवियत संघ, कम्युनिस्ट पार्टी, जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के विरोध के धरातल पर खड़ा था। आज लगभग वही स्थिति विपक्ष की भाजपा और मोदी सरकार के विरोध की है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की धार कमजोर हो गई है और कांग्रेस से निकले कुछ क्षेत्रीय दल, मसलन- तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और लोहिया के ध्वज वाहक होने का दावा करने वाले अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी भी कांग्रेस के साथ आने के लिए फिलहाल तैयार नहीं।

एक फर्क और लक्षित किया जा सकता है कि आज का विपक्ष सत्ताधारी दल के विरुद्ध बिना किसी ठोस कार्यक्रम और बेहतर वैकल्पिक योजना के यह मानकर चल रहा है कि जैसा ये दल सोच रहे हैं और जो कुछ भी कर रहे हैं, वैसा ही मिजाज मौजूदा सरकार के बारे ही जनता का भी है। वक्त आने पर जनता विपक्षी दलों के साथ लामबंद होगी और मौजूदा सरकार को बेदखल कर देगी। पर इस खामख्याली के बावजूद जब चुनावी नतीजे कई बार उनके उम्मीदों के मुताबिक नहीं आते तो जाहिर है कि विपक्ष के लिए और कई सत्ता के करीब रहने वाले बौद्धिक अभिजनों के लिए भी  ऐसे दौर घोर निराशा के ही होते हैं।

ऐसी राजनीतिक स्थिति अपने देश में तीसरे लोकसभा के चुनावी नतीजे आने के बाद भी पैदा हुई थी। नेहरू की राजनीतिक आभा के आसपास विपक्षी राजनीति कहीं खड़ा नहीं हो पा रहा था। समाजवादी राजनीति ढलान पर थी और निराशा के दौर से गुजर रही थी। तमाम विपक्षी दलों की हैसियत हाशिए पर सिमट गयी थी। समाजवादी कार्यक्रमों के धुंआधार प्रचार के बावजूद लोकसभा चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को-12, सोशलिस्ट पार्टी को-6, स्वतंत्र पार्टी -18 जनसंघ-14और कम्युनिस्ट-29 सीटें मिली। मतलब किसी भी दल को मान्यता प्राप्त विपक्षी दल होने का दर्जा भी हासिल नहीं हुआ।

निराशा के ऐसे ही दौर में 23 जून 1962 में नैनीताल में एक बैठक को सम्बोधित करते हुए राम मनोहर लोहिया ने कहा-

अजीब हालत है, जिसको क्रांति चाहिए उसके अन्दर शक्ति नहीं है, जिसे क्रांति कर लेने की शक्ति है, उसे क्रांति चाहिए नहीं या तबियत नहीं। वे आगे चेतावनी देते हुए आगाह करते है कि कोई भी राजनीतिक दल जब तक ‘आमजन के हकों के लिए लड़ता और कीमत नहीं चुकता है, निराशा उसका पीछा नहीं छोड़ती।

अपने देश में ऐसी ही स्थिति इंदिरा गांधी की  हत्या के बाद हुए चुनाव में भी पैदा हुई।मुख्यधारा के राजनीतिक दल और उसके कई बड़े नेता कांग्रेस की आंधी में ढेर हो गए। तब दक्षिण की राजनीति से एक क्षेत्रीय नायक के रूप में  एन.टी रामाराव और उनकी तेलगुदेशम बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सन् 1989 आते-आते राजनीतिक परिस्थितियां बदल गईं। गठबंधन की राजनीति का सिलसिला शुरू हुआ।

रामजन्म भूमि आंदोलन के गर्भ से उभर रही राजनीति के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह और हरिकिशन सुरजीत के नेतृत्व में ऐसा मोर्चा बनाने की कोशिश हुई कि पक्ष और विपक्ष के ‘स्पेस’ पर धर्मनिरपेक्ष दल ही काबिज हों। हालांकि यह फार्मूला भी बहुत दिनों तक टिक नहीं पाया और भाजपा ने अभियान चला कर यह साबित कर दिया  कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब मौजूदा परिस्थितियों में मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा और कुछ नहीं है।

ram manohar lohia birth anniversary, an activist in the Indian independence

सन् 2014 तक आते-आते नरेन्द्र मोदी ने सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विमर्श को भी बदल दिया। आज और मोदी के पहले कार्यकाल में भी मोदी सरकार पर कुछ खास औद्योगिक घरानों को सत्ता का संरक्षण दिए जाने के बहाने से और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर करने के हवाले से भी मोदी सरकार को चुनौती देने की कोशिश हो रही है। पर आज के दौर में असल सवाल यह है कि जो दल और जिनके नेता इन सवालों को उछाल रहे हैं, उनकी अपनी राजनीतिक साख जनता के बीच कितनी बची है? और जनता उनके कहे पर क्या आंख मूंदकर भरोसा कर रही है?

विपक्षी दलों की एकता और साझा कार्यक्रम जैसे फार्मूले भी कितने बार आजमाए जा चुके हैं। आजादी के 75 साल बाद की संसदीय राजनीति के अनुभवों ने जनता को कम से कम इस हद तक तो परिपक्व कर ही दिया है कि वे अपनी वोट की ताकत और राष्ट्रीय और राज्यों के चुनावों के फर्क जानने-समझने लगे हैं।

सोशल मीडिया के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और खासकर कोरोना काल के बाद की वैश्विक परिदृश्य को देखने समझने के लिए जनता के पास न जाने कितने साधन उपलब्ध हैं।


अब जनता को ‘एजेंडा’ के तहत बहकाना कठिन

कुल मिलाकर उसे किसी खास ‘एजेंडा’ के तहत बहकाना और लामबन्द करना पहले के किसी वक्त के मुकाबले अब ज्यादा मुश्किल हो गया है। ऐसे वक्त में किसी भी राजनीतिक दल और नेता के लिए निराशा के गहराते संकट से उबरना भी उतना  ही श्रमसाध्य और चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। इतिहास के ऐसे ही दौर में राम मनोहर लोहिया के सामने भी यही सवाल था कि” क्या ऐसी कोई व्यवस्था बन सकती है कि सत्ता पर थोड़ा-बहुत नियंत्रण रख  सकें? क्या मनुष्य जाति कभी समर्थ होगी, ऐसे आदमी पैदा करने में जो आदतन सिविल नाफरमानी करें।

षडयंत्र और हथियार के जरिए निरंतर क्रांति तो असंगत बात है, पर सिविल नाफरमानी के जरिए निरंतर क्रांति की संभावना निश्चित है। सत्ता के दूसरे पहलू अय्याशी और रुतबे की भूख की भी यह एकमात्र दवा है। आज राजनीतिक सुचिता के अर्थ में सिविल नाफरमानी का अर्थ अच्छाई की खोज करना है। किसी भी तरह के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध अवज्ञा है।

यह भी एक विचारणीय प्रश्न है कि आजादी के आंदोलन और उसके बाद के दौर में भी सबसे प्रतिभाशाली राजनीतिक फौज समाजवादियों की थी। पर जल्दबाजों की यह बेलगाम फौज किसी निर्णायक मुकाम पर पहुंचकर भी हमेशा छोटे स्वार्थों की वजह से टूटती-बिखरती रही।

बावजूद इन विसंगतियों के आज के राजनीतिक दौर में लोहिया की यह राजनीतिक सीख कम महत्वपूर्ण नहीं  कि हार के बाद हार केवल वही झेलते हैं जो तकदीर के फेर- पलट से डरते नहीं या निःसाहस नहीं होते हैं। जीत लाजिमी तौर पर सफलता नहीं है, और न हार असफलता। राजनीतिक दौड़ -धूप में सफलता का मतलब आदमी में उन महान गुणों का उभार होना चाहिए जो अन्याय और अत्याचार से लड़ाई की प्रेरणा दें और जिससे भलाई और शान्ति की स्थापना हो सके। इस लिए दुनिया को भी एक नहीं कई पराजयों से सीखने की जरूरत है।



Ramswaroop Mantri

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