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गुजरात दंगों को भड़काने में किन किन संगठनों की भूमिका थी?…Grokका जवाब

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प्रवीण मल्होत्रा 

मैंने Grok से पूछा था कि 2002 के गुजरात दंगों को भड़काने में किन किन संगठनों की भूमिका थी? Grok ने जो जवाब दिया है वह प्रस्तुत है – 

2002 के गुजरात दंगों की शुरुआत 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के एक डिब्बे में आग लगने की घटना से हुई, जिसमें 59 हिंदू कारसेवकों की मृत्यु हो गई थी। इस घटना को कुछ लोगों ने मुस्लिम समुदाय द्वारा सुनियोजित हमला माना, जिसके बाद गुजरात में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। इन दंगों में विभिन्न संगठनों की भूमिका पर कई आरोप और जांच-पड़ताल हुई हैं। निम्नलिखित संगठनों की भूमिका पर चर्चा हुई है:

1. **विश्व हिंदू परिषद (VHP)**:  

   कई रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने दंगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संगठन हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़ा है और इसे हिंसा को संगठित करने और भड़काने का आरोप लगाया गया। गोधरा कांड के बाद VHP ने गुजरात बंद का आह्वान किया था, जिसके बाद हिंसा और तेज हो गई।

2. **बजरंग दल**:  

   बजरंग दल, जो VHP की युवा शाखा है, पर भी दंगों में सक्रिय भागीदारी के आरोप लगे हैं। इस संगठन के कार्यकर्ताओं पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हिंसक हमलों में शामिल होने का दावा किया गया है। कई गवाहों और पीड़ितों ने इसे हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया।

3. **राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)**:  

   RSS, जो भारतीय जनता पार्टी (BJP) का वैचारिक आधार माना जाता है, पर भी अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा को समर्थन देने का आरोप लगा। हालाँकि, इसकी प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर ठोस सबूत कम हैं, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में इसके सदस्यों की संलिप्तता की बात कही गई है।

4. **भारतीय जनता पार्टी (BJP)**:  

   उस समय गुजरात में BJP की सरकार थी, जिसके मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। कई मानवाधिकार संगठनों और आलोचकों ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने हिंसा को रोकने में नाकाम रही और कुछ मामलों में दंगाइयों को संरक्षण दिया। हालाँकि, नानावटी-मेहता आयोग और विशेष जांच दल (SIT) ने सरकार और नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी।

5. **पुलिस और प्रशासन**:  

   कुछ स्वतंत्र जांचों और गवाहों के बयानों में दावा किया गया कि स्थानीय पुलिस ने दंगों के दौरान निष्क्रियता दिखाई या कुछ मामलों में दंगाइयों का साथ दिया। ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने राज्य प्रशासन पर हिंसा में संलिप्तता के आरोप लगाए।

### दंगों का परिणाम:

– सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दंगों में लगभग 790 मुस्लिम और 254 हिंदू मारे गए, हालाँकि गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि मृतकों की संख्या 2000 से अधिक थी।

– हिंसा मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के खिलाफ थी और इसे “पोग्रोम” (नरसंहार) कहने की मांग भी उठी।

### जांच और निष्कर्ष:

– **नानावटी-मेहता आयोग**: इस आयोग ने गोधरा कांड को सुनियोजित बताया और राज्य सरकार को हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया।

– **विशेष जांच दल (SIT)**: सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित SIT ने भी नरेंद्र मोदी और राज्य सरकार के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं पाया।

– **स्वतंत्र रिपोर्ट्स**: ह्यूमन राइट्स वॉच, सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) जैसे संगठनों ने दंगों में राज्य की मिलीभगत और हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की सक्रिय भूमिका का दावा किया।

यदि आप किसी विशेष संगठन या पहलू के बारे में और विस्तार से जानना चाहते हैं, तो मुझे बताएँ। धन्यवाद!

दूसरा प्रश्न : इसमें मैंने Grok से बीबीसी की डाक्यूमेंट्री फिल्म के बारे में पूछा था. Grok ने जो उत्तर दिया वह प्रस्तुत है. 

2002 के गुजरात दंगों पर बीबीसी ने “इंडिया: द मोदी क्वेश्चन” (India: The Modi Question) नाम से एक दो-भाग वाली डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसका पहला भाग जनवरी 2023 में यूके में प्रसारित हुआ। यह फिल्म गुजरात दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका और उनके नेतृत्व की जांच करती है। दंगे 27 फरवरी 2002 को गोधरा में सबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगने की घटना से शुरू हुए थे, जिसमें 59 हिंदू तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी। इसके बाद गुजरात में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी, जिसमें आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1,044 लोग मारे गए, जिनमें से 790 मुस्लिम और 254 हिंदू थे। हालांकि, कुछ अनुमानों में मृतकों की संख्या 2,000 से अधिक बताई गई।

डॉक्यूमेंट्री में मुख्य रूप से एक गोपनीय ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट पर ध्यान दिया गया, जो दंगों के बाद तैयार की गई थी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि हिंसा “सिस्टमैटिक” थी और इसमें “नरसंहार के लक्षण” थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नरेंद्र मोदी ने पुलिस को हस्तक्षेप करने से रोका और हिंदू चरमपंथियों को “निहित रूप से प्रोत्साहित” किया, जिससे हिंसा को बढ़ावा मिला। इसके अलावा, तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव जैक स्ट्रॉ का साक्षात्कार शामिल किया गया, जिसमें उन्होंने कहा कि मोदी की भूमिका को लेकर “बहुत गंभीर आरोप” थे और यह उनकी प्रतिष्ठा पर “धब्बा” था।

फिल्म में यह भी दावा किया गया कि विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने हिंसा को पहले से नियोजित किया था, और गोधरा की घटना केवल एक बहाना थी। यह आरोप लगाया गया कि राज्य सरकार ने एक ऐसी माहौल बनाया, जिसमें हिंसक तत्वों को खुली छूट मिली। डॉक्यूमेंट्री में 2002 में मोदी का एक पुराना बीबीसी साक्षात्कार भी दिखाया गया, जिसमें उन्होंने दंगों के लिए माफी मांगने से इनकार किया और कहा कि पुलिस ने “उत्कृष्ट काम” किया था।

भारत सरकार ने इस डॉक्यूमेंट्री की कड़ी आलोचना की और इसे “प्रोपेगैंडा” करार दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इसे “पक्षपाती” और “औपनिवेशिक मानसिकता” का प्रतीक बताया। भारत में इसे प्रसारित नहीं किया गया, और सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करके यूट्यूब और ट्विटर पर इसके लिंक को ब्लॉक कर दिया। इसके बाद फरवरी 2023 में बीबीसी के भारतीय कार्यालयों पर आयकर छापे मारे गए, जिसे कई लोगों ने सरकार की प्रतिक्रिया के रूप में देखा।

बीबीसी ने अपने बचाव में कहा कि यह डॉक्यूमेंट्री “गहन शोध” पर आधारित थी और इसमें विभिन्न आवाजों को शामिल किया गया था, जिसमें बीजेपी के लोगों की राय भी थी। हालांकि, भारत सरकार ने इसे जवाब देने से इनकार कर दिया था। यह फिल्म भारत में व्यापक विवाद का विषय बनी, क्योंकि यह उन आरोपों को फिर से उठाती है, जिन्हें भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने 2012 में खारिज कर दिया था, जिसमें मोदी को हिंसा में संलिप्तता के सबूत नहीं मिले थे। यह फैसला 2022 में भी बरकरार रहा।

कुल मिलाकर, यह डॉक्यूमेंट्री गुजरात दंगों के एक संवेदनशील और जटिल अध्याय को फिर से सामने लाती है, जिस पर आज भी भारत में गहरे मतभेद हैं।

Ramswaroop Mantri

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