अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*केन्द्र से परिधि तक : संस्मरण….स्वांत-सुखाय कविता से सत्ता कभी भी नहीं डरती*

Share

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

तीन दिसंबर दो हज़ार पांच की बात है। मैं डॉ. तेजसिंह को वैसे ही फोन कर बैठा। पत्रिका (अपेक्षा) के विषय मेंकुछ बात हुई। और कुछ यहां-वहां की। उन्होंने इस बीच बताया कि आज साहित्य अकादमी के सभागार में 'वरवर राव' केकाव्य संग्रह पर साढ़े चार बजे एक गोष्ठी है, वहां मिलिए। मैंने हां कर दी। शनिवार का दिन था। बैंक कर्मी शनिवार कोलगभग दो बजे कार्यमुक्त से हो जाते हैं। मेरे एक मित्र हैं पी.आर.तंवर। मैंने उनसे इस विषय में कुछ बातें कीं। हम दोनोंअक्सर घर से दफ्तर, दफ्तर से घर, साथ-साथ आते-जाते हैं। उन्होंने कहा, 'ठीक है। तंवर जी बोले,”कुछ देर कनॉट प्लेस मेंविन्डो-शॉपिंग करेंगे। मेरी ट्रेन का समय हो जायेगा और आपका संगोष्ठी में जाने का। शंकर बाज़ार में एक-एक चाय जरूरपिएंगे।” घूमते-घूमते लगभग साढ़े तीन बजे, हम कनाट प्लेस के शंकर बाज़ार पहुंच गए जो सुपर बजर के पास है। चायवाले के पास गए। कम चीनी की चाय बनवाई। बातों-बातों में चाय समाप्त की। और फिर बिछुड गए अपने-अपने गंतव्यकी ओर। तंवर साहब शिवाजी ब्रिज रेलवे स्टेशन से ट्रेन से घर जाने के लिए चले गए और मैं साहित्य अकादमी केसभागार में आयोजित 'वरवर राव' की 'साहस गाथा' कविता संग्रह पर आयोजित परिचर्चा में शामिल होने।

वहां पहुंचा तो पाया कि मुझे जानने वाले कुछ कम ही लोग थे। मुझे न्यौता देने वाले डॉ. तेजसिंह स्वयं हीहाज़िर नहीं थे। खैर! जे एन यू के कुछ रंगकर्मी छात्र ऐसे थे जो मुझे काम और नाम दोनों से जानते थे। वो इसलिए कि कुछवर्षों पूर्व वे हमारी बस्ती ‘बैंक कॉलोनी’ में लोकसभा चुनावों के दौरान एक नुक्कड़ नाटक का प्रदर्शन कर रहे थे। मुझे उनकाप्रदर्शन अच्छा लगा। मैं उन सबको अपने घर ले आया। चाय-पानी की व्यवस्था की। चाय-पानी के साथ-साथ कुछवैचारिक छेडछाड़ भी हुई। मेरे और उनके विचार कमोबेश एक से लगे। उसी दौरान मेरा कविता संग्रह 'वेताल दृष्टि'प्रकाशित हुआ था। मैंने सभी रंग-कर्मियों को उसकी एक-एक प्रति भी सादर समर्पित की थी। 'बरवर राव' की 'साहस-गाथा' पर आयोजित परिचर्चा में मुझे पहचानने वाले लगभग वे ही रंग-कर्मी थे। महज विचार के संबंध ने उन्हें मेरा अपनाबना दिया था। अशोक वाजपेई, पंकज बिष्ट, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. कंचन, मैनेजर पांडे जैसे अनेक चर्चित लेखकसभागार में उपस्थित थे, किन्तु मुझे आने का न्यौता देने वाले डॉ. तेजसिंह सबसे बाद में आए। यह बात अलग है किसंयोगवश उन्हें मेरे आगे की सीट ही मिल गई। सो मौका मिलने पर काना-फूसी भी कर लेते थे। उनके आने से पूर्व, बसत्रिपाठी जी से कुछ बातें हुईटाई थी…शायद वो मुझे पहचानते थे। मैं उन्हें नहीं।

संगोष्ठी के शुरू में, एक समूह गान प्रस्तुत किया गया। यहां, यह उल्लेख करना जरूरी है, वरवर राव की किताब'साहस-गाथा' पर आयोजित परिचर्चा पूरी की पूरी जनवादी सोच पर आधारित थी। संचालक महोदय ने यह उद्घोष भीकिया था कि यह मूलतः केवल साहित्यिक संगोष्ठि नहीं है, अपितु 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक हमला' इस संगोष्ठि काकेन्द्र बिन्दु है। यह हमला 'वरवर राव' पर इसलिए हुआ क्योंकि वरवर राव एवं उनके एक अन्य साथी नक्सलवादियोंऔर सरकार के साथ शांति-वार्ता में शामिल थे। अतः उन्हें भी नक्सलवादी मान लिया गया और तमिल सरकार ने यानीकि केन्द्र में शासित कांग्रेस की सरकार ने उन पर कई आरोप लगाकर जेल में डाल दिया। वो आज भी जेल में हैं।

संचालक महोदय ने सर्वप्रथम डॉ. मैनेजर पांडे जी को बोलने का मौका दिया। वो माइक पर आए। बोले,आज कविता में संघर्ष पर बात करने की ज्यादा आवश्यकता है। उन्होंने वरवर राव की कई कविताओं का उल्लेख करते हुएसारांशतः इतना कहा कि स्वांत-सुखाय कविता से सत्ता कभी भी नहीं डरती। किंतु हां! जो कविता जनता की आवाज़ बनजाती है, सत्ता उससे अवश्य डरती है। आज वरवर राव की कविताएं कबीर, सूरदास, मीरा, और नागार्जुन की तर्ज पर,कम से कम तमिल में जनता की जुबान पर हैं। सत्ताएं तो बनती-बिगड़ती रहती हैं किंतु जनकवि अमरता का चोला सदैव-सदैव पहने रहता हैं। उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि जिनको जनता के सामने बीच रहना चाहिए, वेजेलों में बन्द हैं और इस भारत में कांग्रेसी रुग्ण-संस्कृति के चलते जिन लोगों (मंत्रियों) को जेल में रहना चाहिए था, आजवो लोकतंत्र को जोक बन खा रहे हैं। सच तो ये है कि आज का लोकतंत्र सही अर्थों में लोकतंत्र नहीं, बस! लूट-तंत्र है।

संचालक महोदय ने वरवर राव को नागार्जुन जैसे कवि होने की संज्ञा दी। बरवर राव की कविताओं कीनागार्जुन की कविताओं में समानता दर्शाते हुए वरवर राव को ‘जन-कवि’ यानि कि ‘ज़मीनी कवि’ होने की उपाधि दी।इसके बाद वरवर राव की पत्नी (हेमलता) के द्वारा वरवर राव के तमिल गीत का सस्वर पाठ किया गया। इससे पहलेउसका हिन्दी पाठ भी प्रस्तुत किया गया था। इस बीच बरबर राव द्वारा भेजे गए संदेश को हिन्दी और अंग्रेज़ी में दोनोंभाषाओं पढ़कर सुनाया गया।

चार बजे शुरू होने वाली परिचर्चा लगभग पौने पांच बजे शुरू हुई। सभागार में लगभग लेखक, कवि एवंपत्रकार ही उपस्थित थे। कई कैमरे वाले भी थे। अच्छी खासी भीड़-भाड़ थी। कुर्सियां न मिलने से जे.एन.यू के ज्यादातरछात्र अपने हाथों में कलम और डायरी लिए कुर्सियों के बीच कैरीडोर में बिछे कालीन पर बैठे थे। सब कुछ न कुछ लिखनेमें व्यस्त थे। पता नहीं वे क्या लिख रहे थे । किन्तु कैमरामैन उनसे ही से ज्यादा मुखातिब थे । अब तक लगभग छह बजचुके थे। आमंत्रित वक्ताओं में से अभी तक केवल डॉ. मैनेजर पांडे को ही बोलने का अवसर मिला था। मुझे लगा किकार्यक्रम काफी लम्बा खिंचेगा। मैंने चलना ही बेहतर समझा। कमर दर्द की वजह से मुझे बैठने में भी काफी परेशानीउठानी पड़ रही थी। डॉ. तेजसिंह को धीमे से कान में बताकर मैं चलता बना।

सन्नाटा मुझे खाए जा रहा थामैं रोज़ाना ट्रेन से कार्यालय और कार्यालय से घर आता-जाता हूं। शालीमार गार्डन से साहिबाबाद औरसाहिबाबाद से संसद मार्ग का सफर कम से कम लगभग एक घंटा पन्द्रह मिनट में तय हो जाता है। हां! संध्या काल मेंभीड़भाड के कारण आनंद विहार के रास्ते घर जाना कष्टपूर्ण होता है। ट्रेन में चढ़ना भी मुश्किल और उतरना भी। इसलिएमैं शाम को अक्सर बारास्ता पुरानी दिल्ली होकर साहिबाबाद होकर बुलन्दशहर को जाने वाली ट्रेन से आता हूं। आजतिलक-ब्रिज तक आने में तनिक देरी हो गई और स्टेशन पर खड़ा रहा। दस पन्द्रह मिनट बाद मेरठ छावनी को जाने वालीदिल्ली होकर साहिबाबाद को जाने वाली ट्रेन भी छूट गई। मैं शिवाजी ब्रिज पर ही खड़ा रहा। शनिवार होने के कारणआज गाड़ी में सवारियां कुछ कम ही थीं। मैं मूंगफली खाते-खाते उसमें सवार हो गया। लेकिन मानवीय मूल्यों की गिरावटके चलते कुछ देहाती लोग ऐसे पसरकर बैठे थे कि जैसे ये उनका शयन कक्ष हो । समूह में चलने वालों का रवैया अक्सरतानाशाही का होता है। सीटें खाली पड़ी होती हैं। किन्तु समूह के दादा किसी को बैठने नहीं देते। मना करने का सीधा-साबहाना होता है कि हमारे साथी आ रहे हैं। अब समूह से कौन लड़े? मैं चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया। भला हो एकसज्जन का, जिन्होंने मुझे बुलाकर अपने पास बैठा लिया। आपस में बातों का ऐसा दौर चला कि पता ही नहीं चला,

साहिबाबाद कब आ गया। आज सीजनल पास की भी अंतिम तारीख थी। ट्रेन से उतरकर सीधे पास काउंटर पर गया। नयापास बनवाया। घर चला तो स्टेशन से ही दो किलो उबले हुए सिंघाड़े खरीदे और सीधे घर आ गया। रास्ते में एक सिगरेटभी पी। हाथ-मुंह धोए। कपड़े बदले। थोड़ी देर टी.वी. के सामने बैठा। सरसों के साग से मक्का की रोटियां खाई। कुछ घूमा-फिरा और सो गया।

तपाक से नींद भी आ गई। सोया ही था कि मुझे सपने ने घेर लिया। मेरे एक घनिष्ठ मित्र जिसकी वर्षों पूर्वमौत हो चुकी थी, एक असामान्य-सी औरत के साथ आ धमके। मैं उन्हें देखकर चौंक उठा। थोड़ा पलक झपकने के बादजान पाया कि वे ग्रीन सत्ता' के प्रबंध संचालक डॉ. के. एस. गौतम थे। वे यकायक कह उठे, 'चौंक गए ना मुझे देखकर किमैं आज भी जिन्दा हूं। गौतम जी बोले, “ जानते हो, मुझे गलती से महाकाल के दूत असमय ही उठाकर ले गए थे। चार-पांच साल तक मुकदमा लड़ा है मैंने महाकाल से। जान-बूझकर उठवाया गया था मुझे। एक चुड़ैल थी जिससे कभीअनजाने में मेरा संबंध हो गया था। बाद में संबंध टूट गया था। ये सब उस ही की चाल थी कि उठवा दिया मुझे।

कुछ समझ नहीं पा रहा था। मुझे तो वो सचमुच जिन्दा इंसान लग रहे थे। वे बातें भी उसी अंदाज में कर रहे थे।पर मेरे हृदय के किसी न किसी कोने में शंका विद्यमान थी। उनके साथ आई महिला जैसे मौनग्रस्त थी। मेरे बच्चे व बीवीउन्हें जिंदा देखकर चौंके तो थे हीं भयग्रस भी थे। मगर घर के बाहर चबूतरे पर मेरे और गौतम जी के बीच हो रहेवार्तालाप को सुनकर अच्छी-खासी भीड़ एकत्र हो गई। वर्षों बाद देखा था गौतम जी को मेरे साथ। वह भी मरने के बाद।

मैं और गौतम जी उठे और बस्ती में घूमने चल निकले। किन्तु जिधर से भी गुजरते उधर के लोग गौतम जी को मेरे साथजीवित देखकर चकित होते और मुंह मोड़कर चलते बनते। मैं था कि गौतम जी के साथ-साथ चले ही जा रहा था। ठीकवैसे ही जैसे उनके जीवन काल में। रास्ते के एक छोर पर पान-बीड़ी वाले की दुकान पड़ी। गौतम जी अचानक कह उठे,आज सिगरेट नहीं पिलाओंगे ?' मैंने कहा, 'क्यों नहीं? दो छोटी गोल्ड फ्लेक सिगरेट खरीदी और हंसते-खेलते पी डाली।घर को वापिस चल पड़े। मुझे लग ही नहीं रहा था कि यह वह के. एस. गौतम नहीं है जो वर्षों पूर्व मर चुका था। वो हीमिलन-सारिता, वो ही फक्कड़पन, वो ही उठने-बैठने का अन्दाज घर वापिस आए तो देखा कि घर पर भीड़ अब भी जमाथी। किंतु गौतम साहब के साथ आई महिला अब गायब थी। जैसे ही घर लौटे मेरी पत्नी मुझ पर बरस पड़ी, "तुम्हें पतानहीं तुम एक भूत के साथ घूम रहे हो?" मैंने उसकी बात आई-गई कर दी|

गौतम जी ने फिर अपनी मृत्यु गाया सुनानी शुरू कर दी। उनका प्रयास था कि वे अपने जिन्दा होने का यकीनदिला पाएं। मैं पूछ ही बैठा, 'तुम्हारा महाकाल से चल रहा मुकदमा कब खत्म हुआ और तुम्हें अपने प्राण कब वापिस मिले'? गौतम जी शायद मेरे प्रश्न का आशय समझ गए थे। कुछ सोचकर बोले, 'अभी दो दिन पहले ही। सबसे पहले में आपसे हीतो मिलने आया हूं। जीते-जी तुमने बहुत साथ दिया था मेरा। मुझे आज भी याद है कि जब में अस्पताल में भर्ती था, एकतुम ही थे जो बराबर मेरी देख-रेख में लगे थे। मेरे पास-पल्ले कुछ नहीं था-सो अपने-पराये सब मुझसे कन्नी काट रहे थे।

किंतु तुमने एक मौका खो दिया था कि मेरे जनाज़े में तुम हाज़िर नहीं थे। मैंने बात काटते हुए पूछा, तुम्हारे साथ वहमहिला कौन थी।' 'कौन-सी महिला? नहीं… नहीं…मेरे साथ कोई महिला-वहिला नहीं थी।' गौतम जी कुछ तेवर में बोले।

भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। मैंने सोचा, घर के अंदर बैठकर बात करें। मैं गौतम जी को घर के अन्दर ले गया।

घर में मरम्मत का काम चल रहा था। मकान को तोड़कर नए सिरे जो बनाया जा रहा था। सब कुछ ऊबड़-खाबड़ था। बरामदे में चारपाई पड़ी थी और दूसरी कीचड़ भरे आंगन में । गौतम जी दूसरी चारपाई पर आकर बैठ गये।मैंने उनसे बरामदे में आने के लिए कहा। वो इतना सुनकर मुस्कराये और बोले, 'यहां क्या बुरा है? आखिर सबकों एक दिनमिट्टी में ही तो मिलना है।' इतना सुनकर मैं मन ही मन तिलमिला उठा। लगा कि ये सचमुच का गौतम नहीं है। किन्तुउनके हाव-भाव एवं व्यवहार से ऐसा लगता ही नहीं था। मेरे दोबारा कहने पर गौतम जी बरामदे में पड़ी चारपाई पर आगए। मैं चारपाई पर लेटा था। वे बैठे थे। मैं उनकी आंखों में झांकने लगा। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति आ पहुंचा। वह भीगौतम जी को साक्षात देखकर हैरत में था। इससे पहले वह कुछ कहता, गौतम जी मुझ पर हावी होते चले गए। उनकाचेहरा-मोहरा एक दम भयानक एवं आंखें गहरी हरी व पुतलियां लाल हो चली थीं। वो मुझ पर निरन्तर दबाव बनाए जारहे थे और मैं उनसे मुक्त होने को प्रयासरत था। किन्तु मैं पूरी तरह दबाव नहीं बना पा रहा था। आगन्तुक भी चुपचापडरा-डरा सा मौन था। मुझे अब लगने लगा था कि गौतम जी जिन्दा होने का नाटक कर रहे हैं। मैं झुंझला उठा। मन मेंविरोध उत्पन्न हुआ और मैंने पूरे जोर से एक ऐसा झटका दिया कि गौतम जी उछलकर दूर जा पड़े। इसी क्षण मेरी नींद भीटूट गयी। उठकर देखा कि सन्नाटे के अलावा वहां कुछ भी मौजूद नहीं था । हक्का-बक्का खाट से उतरा और सारे घर में एक सांस में घूम गया। बीवी-बच्चे सब अपने-अपने स्थान पर सो रहेथे। किन्तु गौतम जी का भूत मेरे सिर पर बरकरार था। सन्नाटा मुझे खाए जा रहा था। मैंने यकायक पत्नी को जगाया। चायबनवाई। चाय पीते-पीते मैंने सपने का सारा घटनाक्रम पत्नी को सुनाया। जब कहीं सिर हल्का हुआ। किन्तु पत्नी माथापीटकर रह गई और बुदबुदाते हुए बोली, “जब सारा दिन दिमाग उधर-उधर घूमता रहेगा तो ऐसे सपने तो आएंगे ही।”इतना कह वो अपनी चारपाई पर जाकर सो गई

आदमी नितांत भ्रमित है… अभिमानी है… स्वार्थी है

संवेदनशील लोगों की एक खास बात यह होती है कि वो कोई अप्रिय घटना देखकर मन से दुखी तो होते ही हैअपितु उनका दिमाग अंदर-अंदर कुछ विशेष विचार को आकार देने में लग जाता है। अक्सर बुद्धिजीवी लोग अपने-अपनेविद्वत क्षेत्र के अनुसार कुछ विशेष रचनात्मक संरचना करने में खो जाते हैं। यदि कोई साहित्यकार है तो वह उसमें किसीकहानी, कविता, गीत-ग़जल आदि की रचना को शब्द देने में खो जाता है। अपनी नई रचना को जन्म देता है। अकेलेपन मेंयह मानसिक अवस्था जोरों से दिमाग में अपना घर बना लेती है। जो लोग निरंतर अपनी जिंदगी में अकेलेपन को जीते हैंतो उन्हें अकेलापन इतना भाने लगता है कि एक अच्छा इंसान जब रोना चाहे रोने लगता है और जब हंसना चाहे हंसनेलगता है लेकिन जिस दिन वो रोना बंद कर देता है, तो उसके साथ गलत करने वाले लोग रोने लगते हैं।

इंसान जिंदगी में कब टूटता है? जब उसे समझने वाला…उसका साथ देने वाला कोई नहीं होता। खैर! यह यादरखने की बात है कि जो इंसान आपका साथ देता है, वो हर परिस्थिति में आपका साथ देगा और जो इंसान छोड़ने कीजल्दी में होता है, उसे जाने दो। तुम्हारे रोकने पर भी वो नहीं रुकेगा। और उस समय जब आप अकेले हों, तो कभी भी येसोचने से मत डरिए कि मैं अकेला हूँ। ये सोचना कि मैं अकेला हूँ, ये ही क्या कम है न?

मैं आफिस अक्सर बस से फिर ट्रेन से जाता था। एक दिन ट्रेन से आफिस जाते हुए एक ऐसा मंजर देखा कि मैंअसहज हो गया और न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गया। धूमिल सी एक ऐसी कहानी मेरे दिमाग में उपज आई जो आज केसमाज की कलुषित मानसिकता के चलते आए दिन देखने-सुनने कौ मिलती रहती हैं। उस समय मेरे दिमाग में जो चित्रउभर कर मेरे अकेलेपन पर प्रहार कर रहा था वो इस प्रकार था।

घने जंगल में एक वीरान किला था। किले का दरवाजा सजा-धजा, मन-भावन, कला का एक ऐसा संगम कि कोईभी देखता रह जाए। पता नहीं कि मैं यहां कब और कैसे पहुंच गया। किले के आसपास पतझड़े पेड़ व झाड़-झंकाड़ का दर्शनथा। सूखे पेड़ मकड़ी के जालों से भरे-पूरे थे। यह सब देखकर किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि किले के अन्दरजाए। यह सारा नजारा मैंने जब देखा, तब मैं किले की ओर ही जा रहा था। इसी बीच मुझे आभास हुआ कि कोई मेरेपीछे-पीछे आ रहा है। मुड़कर देखा तो पाया कि एक महिला बड़ी ही सहज अवस्था में मेरे पीछे-पीछे धीरे-धीरे चली आ

रही थी। सच जानो… सुन्दरता की ऐसी प्रतिमूर्ति, मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। लहराती घनी काली जुल्फें, होठों परमधुर मुस्कान, दमदमाती जालीदार धवल पौशाक, लम्बी कद-काठी. मदभरी आंखें, कलाईयों में गुलाबी चूड़ियां, मन कोऐसे छू गयीं कि मै देखता ही रह गया।

देखते ही देखते मैं किले के बाहर वीरान मैदान में पड़े एक जर्जर तख्त पर धड़ाम से गिर गया । जैसे-तैसेसंभलकर उठा-बैठा । मन ही मन सोचने लगा कि प्रियतम से मिलन का कितना प्यारा अंदाज है इस महिला का । इश्कजीवन की सबसे बड़ी अमानत है, जरूरत भी। पर दुर्भाग्य की बात कि बात-बात पर मारा-मारी, बात-बात पर मन-मुटाव, बात-बात पर तेरा-मेरा, फकत पैसे के लिए सबसे ज्याद मशक्कत होती है। क्यों…? इश्क-विश्क सब बकवास बनकररह गया है। आदमी नितांत भ्रमित है… अभिमानी है… स्वार्थी है।….जाने कैसे-कैसे विचार मेरे जहन में आने लगे। किन्तुमेरी नज़रें उसी महिला पर ही टिकी रही। वह अचानक मेरे पास आकर खड़ी हो गई। न कोई हरकत न कोई शरारत,कतई शान्त एवं सहज अवस्था में परन्तु उसकी आंखें किले के दरवाज़े पर ही टिकी थीं। शायद उसे किसी के आने काइन्तजार था।

किन्तु उसे सम्पर्क में पाकर, मैं एकदम सिहर-सा गया। मेरी सांसें उखड़ने लगीं। उसके साथ-साथ मैं भी किले केदरवाज़े की ओर देखने लगा। न किले के अन्दर से कोई आया और न कोई अन्दर ही गया। थोड़ी देर बाद किले के अन्दरअचानक एक गीत उभरा। नितान्त ही कर्णप्रिय… ऐसा कर्णप्रिय गीत कि मन को छू गया। गीत का उभरना था कि मेरेपास खड़ी महिला धीरे-धीरे किले के दरवाज़े की ओर बढ़ने लगी। वह जैसे ही किले के दरवाज़े के पास पहुंची तो किले सेएक प्यारी-सी, छोटी-सी, बच्ची दरवाज़े से बाहर आती हुई नज़र आई। महिला के जैसी ही धवल पौशाक, हंसती-खिल-खिलाती, उछलती-फुदकती, अच्छे बने केश, हाथ में गुलाब का फूल। यह देखकर मैं सकते में आ गया। सोचने लगा कि क्यायही बच्ची इस महिला का प्रेमी है। क्या यह इसी बच्ची से मिलने आई है? हो सकता है कोई और भी हो, ऐसे कितने हीसवाल मेरे जहन में उभर रहे थे। खैर! जैसे-तैसे खुद को संयत किया। बच्ची खिलखिलाती हुई, उस महिला की ओर बढ़ीऔर गुलाब का फूल उसे थमा दिया। दोनों की आंखे चार हुईं और हंसी के फव्वारे छूट पड़े। पर ये क्या वो महिला यकायकरी ओर मुखातिब हुई और खारिश-भरी नज़रों से मुझे देखने लगी और मेरी ओर उंगली का इशारा करके जैसे वहअचानक गायब हो गई। उंगली का इशारा पाकर बच्ची मेरी ओर बढ़ी और मुझे छूकर वो भी गायब हो गई। मैं हक्का-बक्काइधर- उधर देखता रह गया। यह सिलसिला कई रोज तक चलता रहा। मैं किले की ओर जाता। वह महिला अपने उसीअंदाज में मेरे पीछे-पीछे आती। बच्ची से मिलती। गुलाब का फूल हाथ में लेकर मेरी ओर उंगली का इशारा करती औरगायब हो जाती।

इसके बाद अचानक कुछ लोग-लुगाइयों ने मुझे चारों ओर घेर लिया। सबके बिखरे-उलझे बाल, फटे-पुराने मैलेकपड़े, आड़े-तिरछे काले-पीले दांत, लम्बे-लम्बे तीखे नाखून। यह सब देखकर मैं न केवल भयभीत था अपितु भविष्य केप्रति खासा चिंतित भी था। सबके-सब निरंतर मेरे चारों ओर नाच-कूदकर नाना प्रकार की विचित्र आवाज़ों में चिल्ला रहेथे । अन्त में सब एक स्वर में चीख उठे, 'अब आयेगा मजा… अब आएगा मजा.. अब…. '। इसके बाद यकायक एकजोरदार आवाज़ उभरी कि जरूर तुम ही इस बच्ची के पिता रहे होगे। बड़े कहते हैं कि किसी मर्द ने प्यार के जाल मेंफंसाकर इसकी मां को अपनी हवश का शिकार बनाया था और प्रेम-प्रीत के सारे रिश्ते तोड़कर इस बच्ची की मां कोअकेला छोड़कर चलता बना। सुना है कि इस बच्ची की मां इसे जन्म देते ही मर गई थी । उसके मरने के बाद, इस बच्ची कोकिसी अपने ने भी नहीं पाला । नाजायज़ औलाद जानकर सबने इससे पल्ला झाड़ लिया । अन्ततः भूख-प्यास की मारी येबच्ची भी मौत के मुंह में समा गई। सगे-संबंधी भी दूर-दूर नज़र आए। बस! यही एक ऐसा कारण है कि ये दोनों मां-बेटीमर्दों से घृणा करती हैं।

मेरे चारों तरफ छाई भीड़ में से बड़े जोर से एक और आवाज़ उठी कि अब तुम नहीं बचोगे । कोढ़ी हो जाओगेऔर धीरे-धीरे घुल-घुलकर मर जाओगे। पता है?… पता है? ये बच्ची जिसे भी छू लेती है, वो जिंदा नहीं रहता। दरअसल !

इस बच्ची की माँ हर किसी उस मर्द को जो यहाँ पास आता है, दोषी मानती है। इतना ही नहीं जो भी शख्स इस तख्त परआ बैठता है, उसका यही हाल होता है। मैं हक्का-बक्का-सा सब कुछ सुनने को मजबूर था । किन्तु ये क्या? अब सारे के सारेनर-नारी व बच्चे, कोई भी तो नज़र नहीं आ रहा था। सब गायब थे। मैं अकेला ही था अब । मैं घबराहट के चलते मृत प्रायः

था। अनाप-सनाप कुछ न कुछ बड़बड़ाए जा रहा था। ऐसा लगने लगा कि जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ। मुझे कुछ ऐसा

लगा कि जैसे अचानक मेरी तंद्रा टूट गई। मैंने धीरे-धीरे घबराहट से उभरने का प्रयास किया। कुछ सहज हुआ तो सोचा

कि मानसिक उद्वेक सपने से भी बड़ा पागलपन होता है। प्रीत और प्रतिकार जैसे एकाकार हो जाते हैं। आज आखिर

सामाजिक मुल्यों का अधोपतन कहां ले जाएगा नई पीढ़ी को ? कुछ भी तो सत्य से परे नहीं लग रहा था । 0000

 लेखक के बारे में –

वरिष्ठ कवि/लेखक/आलोचक तेजपाल सिंह तेज एक बैंकर रहे हैं। वे साहित्यिक क्षेत्र में एक प्रमुख लेखक, कविऔर ग़ज़लकार के रूप ख्याति लब्ध हैं। उनके जीवन में ऐसी अनेक कहानियां हैं जिन्होंने उनको जीना सिखाया। उनकेजीवन में अनेक ऐसे यादगार पल थे, जिनको शब्द देने का उनका ये एक अनूठा प्रयास है। उन्होंने एक दलित के रूप मेंसमाज में व्याप्त गैर-बराबरी और भेदभाव को भी महसूस किया और उसे अपने साहित्य में भी उकेरा है। वह अपनीप्रोफेशनल मान्यताओं और सामाजिक दायित्व के प्रति हमेशा सजग रहे हैं। इस लेख में उन्होंने अपने जीवन के कुछ उनखट्टे-मीठे अनुभवों का उल्लेख किया है, जो अलग-अलग समय की अलग-अलग घटनाओं पर आधारित हैं। अब तक उनकीविविध विधाओं में लगभग तीन दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्यपुरस्कार (1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से भी आप सम्मानित किए जा चुके हैं। अगस्त 2009 मेंभारतीय स्टेट बैंक से उपप्रबंधक पद से सेवा निवृत्त होकर आजकल स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें