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*फडिंग रोकने के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार*

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सनत जैन

तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा फंडिंग रोकने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। तमिलनाडु सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना, भारत के संघीय ढांचे के अस्तित्व पर एक अहम सवाल खड़ा करता है। यह विवाद केवल आर्थिक संसाधनों के वितरण का नहीं है। इससे कहीं अधिक संवैधानिक अधिकारों, राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर एक बड़ा विवाद है।

तमिलनाडु सरकार का आरोप है, समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत तमिलनाडु को 291.30 करोड़ की राशि मिलनी थी। जिसे केंद्र सरकार ने रोक लिया है। तमिलनाडु राज्य ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेप-2020) और पीएम श्री योजना को लागू नहीं किया है। तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार के इस निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अनुच्छेद 131 के तहत दाखिल किया है, जो दर्शाता है, यह केवल वित्तीय अड़चन नहीं, बल्कि केंद्र एवं राज्य के बीच एक संवैधानिक संकट बन चुका है। यह पहली बार नहीं है, जब किसी राज्य को केंद्र सरकार द्वारा फंडिंग में कटौती या देरी का सामना करना पड़ा हो। पहले भी पश्चिम बंगाल, पंजाब, दिल्ली और हिमाचल जैसे राज्यों ने इसी प्रकार की शिकायतें की हैं।

सवाल यह है, क्या केंद्र सरकार अपने नीतिगत कार्यक्रमों को लागू कराने के लिए राज्यों पर वित्तीय दबाव डाल सकती है? क्या यह भारत के संघीय ताने-बाने को राजनीतिक हितों की पूर्ति करने के लिए केंद्र सरकार राज्यों के साथ इस तरह की कार्रवाई कर रही है। संविधान में स्पष्ट है, शिक्षा केंद्र एवं राज्य सरकार की समवर्ती सूची का विषय है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका अहम है। यदि कोई राज्य किसी नीति से असहमति रखता है। ऐसी स्थिति में उसे फंडिंग से वंचित करना संविधान के मूलभूत ढांचे के खिलाफ है। सहयोगात्मक संघवाद की परिकल्पना केवल भाषणों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे व्यवहार में भी उतारना केंद्र एवं राज्य सरकार दोनों के लिए ही आवश्यक है। तमिलनाडु सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना केवल एक राज्य के संघर्ष का मामला नहीं है।

उन सभी राज्यों के लिए एक संदेश है जो अभी तक केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के हितों के खिलाफ जो निर्णय किए जा रहे हैं, उसके विरोध में न्याय की गुहार लगाने कोर्ट नहीं पहुंचे थे। केंद्र सरकार के लिए यह एक चेतावनी है। केंद्र सरकार अपनी नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार राज्यों पर शासन करना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच दूरियां पैदा करने वाला होगा। तमिलनाडु की याचिका पर न्यायालय का फैसला केंद्र-राज्य संबंधों को पारदर्शी और संतुलित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम भी हो सकता है या अन्य नए विवाद भी खड़ा कर सकता है।

तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपाल और राष्ट्रपति की समय सीमा निर्धारित करने के बाद जिस तरह से यह विवाद तूल पकड़ता जा रहा है इसी तरह के कई अन्य विवाद भी केंद्र एवं राज्यों के बीच खड़े हो सकते हैं। भारतीय लोकतंत्र की ताकत संघीय शासन की विविधता और विकेंद्रीकरण में निहित है। आवश्यक है, केंद्र सरकार शक्ति के केंद्रीकरण की बजाय राज्यों को विश्वास में लेकर भागीदार बनाए। राज्य सरकारें केंद्र के अधीनस्थ नही हैं। केंद्र एवं राज्य दोनों ही निर्वाचित सरकारें हैं। तभी भारत एक मजबूत और न्यायसंगत राष्ट्र है। पिछले एक दशक में केंद्र एवं राज्यों के बीच जिस तरह के विवाद देखने को मिल रहे हैं, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल निर्वाचित राज्य सरकार के ऊपर जिस तरह का अंकुश लगा रहे हैं, उसे लेकर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ चुके हैं।

उनके पक्ष में फैसला आया था, लेकिन दिल्ली केंद्र शासित राज्य की तरह था केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी कर उपराज्यपाल के अधिकारों को ज्यादा प्रभावी बना दिया था। लेकिन अब जिन राज्यों के साथ विवाद खुलकर सामने आ रहे हैं यह पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त किए हुए हैं। संविधान में इन्हें विशेष अधिकार प्राप्त हैं। केंद्र सरकार यदि इन्हें अपने अधीनस्थ मानकर व्यवहार करेगी तो ऐसी स्थिति में भारत का संघवाद जो राष्ट्रीय एकता और अखंडता का प्रतीक बना हुआ है, इसे ज्यादा दिन तक एकजुट नहीं रखा जा सकेगा। भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, कई भाषाओं, विभिन्न खान-पान, विभिन्न संस्कृति के साथ एकजुट होकर पिछले 75 वर्षों से संविधान के अनुसार काम करता रहा है। यह कोई छोटी अवधि नहीं है। पिछले एक दशक में जिस तरह से केंद्र एवं राज्यों के संबंध में लगातार तनाव उत्पन्न हो रहा है, राज्य सरकारों को लग रहा है कि केंद्र सरकार उनके हकों और अधिकारों को छीन रही है।

राज्यपालों के जरिए निर्वाचित सरकार के पंख कतरे जा रहे हैं। इसके खिलाफ में अब सभी विपक्षी दल एकजुट होते चले जा रहे हैं। यह केंद्र सरकार के लिए एक खतरे की घंटी हो सकती हैं। केंद्र सरकार किसी तरह से मुकाबला कर भी ले लेकिन संघीय व्यवस्था को बनाए रख पाना भारत के लिए कठिन होगा। केंद्र सरकार राज्य सरकारों और न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय हित में सब अपने अधिकार और कर्तव्यों का ध्यान रखते हुए संविधान के अनुरूप कार्य करें। समय रहते हुए यदि सही चिंतन नहीं किया गया। भविष्य में इसके परिणाम बड़े घातक साबित होंगे।

Ramswaroop Mantri

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