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*भोगों को पूरी तरह भोगे बिना नहीं सधेगा भगवान से योग*

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   अनामिका, प्रयागराज

    पुरुषार्थ का विशिष्ट महत्त्व है। यह महत्त्व तभी है, जब यह भाग्य से भारी होता है, अन्यथा उसका कोई मूल्य नहीं है। पुरुषार्थ तभी सफल होता है, जब यह भाग्य को अपने पैरों तले कुचल-मसल देता है। पुरुषार्थ की तीव्रता एवं त्वरा भाग्य से अधिक होनी चाहिए, तभी भाग्य को अपने अनुकूल मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है, अन्यथा जीवन भाग्य के प्रबल आघात- प्रतिघातों से हिचकोले खाता रहता है। 

     जीवन में भाग्य का प्रभाव तभी तक होता है, जब तक इसकी तीव्रता से कम प्रयास किया जाता है, इसे हलके ढंग से आँका जाता है, परंतु जो भाग्य की सूक्ष्मता से परिचित होते हैं, वे कभी भी अपनी सामर्थ्य एवं क्षमता को बचाए नहीं रखते, बल्कि समय व भाग्य के अनुरूप अपना सर्वस्व झोंक देते हैं और सफल होते हैं।

    पुरुषार्थ कम होता है तो भाग्य अपना खेल खेलता है और इनसान इसके हाथों कठपुतली मात्र बन जाता है। भाग्य जैसे नचाता है, वह वैसे ही नाचता है। भाग्य रुलाता है तो इनसान रोता है और वह हँसाता है तो वह हँसता है, फिर उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है। भाग्य उस बाढ़ के समान है, जिसके प्रचंड प्रवाह में सब कुछ बहता जाता है।

      यह ऐसी आँधी-अँधड़ है, जो सबको उड़ाकर फेंक देता है। आँधी उठे तो फिर यह मौका नहीं रहता है कि क्या किया जाए, बस, उसके थपेड़ों को सहने एवं अपने को जितना संभव हो, बचाने की चेष्टा ही की जा सकती है। उससे लड़ा नहीं जा सकता, उसे मोड़ा नहीं जा सकता है। भाग्य का प्रवाह एवं प्रभाव कुछ इसी तरह होता है।

    भाग्य अचानक एवं औचक प्रकट हो जाता है। पता ही नहीं चलता है कि कब साफ-स्वच्छ आसमान में काले-काले बादल मँडराने लग जाते हैं और देखते-देखते मूसलाधार बारिश होने लगती है। अभी तक तो सब ठीक था, एकाएक क्या हो गया- पल भर में परिदृश्य, भयावह एवं भीषण हो गया ! हँसता-मुस्कराता पल असह्य, कठिन एवं भारी हो जाता है तो यह भाग्य की मार होती है। 

     भाग्य होता ही ऐसा है, जो चुपके से अनकहे दस्तक देता है और सब कुछ पल-क्षण में बदल देता है। भाग्य का तात्पर्य है पिछले जीवन का वह चेक एवं एटीएम कार्ड जिससे हम अपनी संचित निधि भुनाते हैं। यदि हम सजग-सचेष्ट हैं तो कब-कितना और कहाँ ड्रॉ करना है, जान-समझ सकते हैं। 

     इसके लिए भाग्य को समझना एवं पहचानना आवश्यक है, जिसके लिए उसके अनुरूप योजना भी होनी चाहिए।

    भाग्य अच्छा या बुरा, दोनों होता है और समय के अनुरूप जीवन में प्रकट होता है। हम इसकी अदृश्य घटनाओं से परिचित नहीं होते, इसी कारण यह हमें पहेली जैसा जान पड़ता है, परंतु जो इसकी चाल से वाकिफ होते हैं, वे इसकी तीव्रता एवं त्वरा के आगे और अधिक चुनौती पेश करते हैं।

      उनका पुरुषार्थ कभी भी कमजोर नहीं पड़ता है। वे यह जानते हैं कि भोगकाल में विगत एवं आगत की तपस्या की बड़ी पूँजी भी काम नहीं आती है। इस संदर्भ में महर्षि रमण कहते हैं कि भगवान जीवात्मा को जब निश्चित भोग प्रदान करता है तो उस समय उसे सभी ओर से काटकर निहत्था कर देता है। 

     कोई कितना बड़ा तपस्वी भी क्यों न हो, उस अवधि में उसकी तपस्या क्रियाशील नहीं होती है। जीवात्मा वर्तमान में जितना पुरुषार्थ कर सकता है, सूझ-बूझ एवं विवेकपूर्ण बुद्धि से परिस्थितियों से जितना बच सकता है या जूझ सकता है, उसकी पूरी छूट होती है।

    महर्षि पतंजलि कहते हैं कि भोग को यदि बिना प्रतिक्रिया करके भोग लिया जाए तो यह भोग चित्तशुद्धि का कारण बनता है। इससे वृत्तियाँ गिर जाती हैं और चित्त शुद्ध एवं परिमार्जित हो जाता है; क्योंकि प्रतिक्रिया करने से नवीन भाग्य की सृष्टि होती है, परंतु हम प्रतिक्रिया करने में सबसे आगे होते हैं। 

    यदि कोई बुरा बरताव करता है तो उसके प्रति द्वेष, वैमनस्य आदि पनपता है और कोई सहयोग, सांत्वना प्रदान करता है तो उसके प्रति मोह पैदा होता है। ये दोनों ही स्थितियाँ प्रतिक्रियात्मक हैं, जो एक नए भोग का निर्माण करती हैं। 

     महर्षि कहते हैं कि भोगकाल में दोनों ही स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं- चित्त के संस्कार उभरते हैं तो शत्रुभाव से प्रेरित व्यक्ति कष्ट देने आता है और मित्रभाव से प्रेरित व्यक्ति सहयोग देने आता है। भोग से निवृत्ति के लिए उपर्युक्त दोनों स्थितियों में स्वयं को तटस्थ एवं प्रतिक्रियाविहीन रखना पड़ता है। 

     सामने वाला कैसा भी बरताव करे, परंतु स्वयं को न तो बुरा बरताव करने वाले से दुश्मनी करनी है और न समभाव जताने वाले के प्रति प्रेम करना है- साक्षी भाव से इन दोनों ही स्थितियों से उदासीन होकर गुजर जाना चाहिए, परंतु यह इतना आसान नहीं होता है। यह अति दुष्कर कार्य है, इसी कारण तो महर्षि पतंजलि चित्तशुद्धि को संसार का सबसे भीषण पुरुषार्थ कहते हैं। 

     भोग का सबसे मज़बूत आधार सम्भोग है. काम ऐसा पुरुषार्थ है जिसके बाद सीधे मोक्ष का क्रम है. यह आज आसान नहीं है. ऋषि महर्षि ब्रह्मार्षि और भगवान कहे गए लोग इसे साकार किये, स्त्री के उद्धार के लिए. वे सिद्ध थे, सम्पूर्ण थे, स्त्री के लिए सम्भोग में उतरे. 

     सम्भोग ऐसा होना चाहिए कि मल्टीपल आर्गेज्म पाकर स्त्री परम आनंद में डूबकर बेसुध हो जाए. क्या ऐसा मर्द मिलता है स्त्री को? नहीं. सारे सेक्स ड्रग्स ठूसकर भी एक पुरुष किसी स्त्री को यह स्टेज नहीं दे सकता. बदचलनी यानी कई से यूज होकर स्त्री यह पा नहीं सकती. यह तो मन तन को सड़ाकर बे मौत मरने का पथ है.

    नेचुरल और कम्प्लीट सम्भोग कोई वास्तविक योग-ध्यान सिद्ध पुरुष ही स्त्री को दे सकता है. उसका अपने स्पर्म डिस्चार्ज सिस्टम पर कंट्रोल रहता है. जब तक वह खुद न चाहे, वीर्य नहीं बहता. जब तक वीर्य नहीं निकले, पेनिस काम करता है. यही कारक है की हमारे डॉ. मानवश्री एक रात में 15 हॉटेस्ट गर्ल्स तक को भी हाइएस्ट सटिस्फैक्शन देने में सक्षम हैं.

      भोगकाल में जो सबसे बड़ी बाधा होती है, वह है बुद्धि-विवेक में संतुलन नहीं बन पाना। इसमें व्यतिक्रम आ जाता है। दुःख के समय हम इसके कारण को स्वयं में खोजने के बजाय दूसरों में आरोपित करने लगते हैं और दूसरों से बैरभाव पैदा कर लेते हैं। भोग की तीव्रता भोग काटने के सभी अस्त्र-शस्त्र छीन लेती है। इनसान चीखने-चिल्लाने के अलावा और कुछ कर नहीं पाता।

    सृष्टि में तपस्या को सर्वोपरि पुरुषार्थ कहा जाता है। यह पुरुषार्थ ही भोग को काटने में समर्थ एवं सक्षम होता है, परंतु घनघोर विपरीतताओं में स्वयं को संतुलित करके इस महापुरुषार्थ में झोंक पाना अपने आप में बड़ा पुरुषार्थ है। सामान्य क्रम में ऐसा नहीं हो पाता है, परंतु यह असंभव नहीं है, कठिन कितना ही क्यों न हो। यहाँ पर विवेक की आवश्यकता पड़ती है। 

    दुर्द्धर्ष तपस्वी ऋषि विश्वामित्र ने अपने शिष्य को एक संदर्भ में कहा था कि जो व्यक्ति अपने चरम भोगकाल में अपने विवेक को संतुलित कर लेता है तो समझना चाहिए कि उस पर भगवत्कृपा की वृष्टि हो रही है। वह भोगकाल में भी भगवान की सुरक्षा एवं संरक्षण में निश्चिन्त होता है। भक्त प्रह्लाद अपने बाल्यकाल में उभरे सभी भोगों को भोगने के बावजूद कभी विचलित नहीं हुए और हरिनाम का स्मरण एवं कीर्तन करते रहे.

    भोग का एक अर्थ पाप पुण्य का फल भोगना भी होता है. प्रह्लाद के अपने भोग तो थे ही, उसके साथ उनके भोग को और भी भारी करने के लिए उसके पिता हिरण्यकशिपु एवं महान तांत्रिक एवं दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी, परंतु प्रह्लाद का चरम पुरुषार्थ उसकी भक्ति थी। 

    उन्हें यह पता था कि भोग की अवधि सीमित एवं निश्चित होती है, परंतु पुरुषार्थ सीमातीत एवं अनंत होता है। भोग की लहरें झंझावात के समान समूल नष्ट कर देने के लिए उठती हैं। सामान्यजन इन लहरों में उठते-गिरते एवं नष्ट भी हो जाते हैं, परंतु परम पुरुषार्थी जानता है कि लहरें कितनी भी भीषण एवं भयानक क्यों न हों, गिरेंगी ही।

      हाँ, उन लहरों के थपेड़ों एवं आघात को सहन कर लेने की क्षमता अर्जित कर लेनी चाहिए। पुरुषार्थी जब अपने पुरुषार्थ को भगवत् अर्पित कर उसी के अनुरूप कार्य करने लगता है, अपनी इच्छाओं एवं आकांक्षाओं से स्वयं को निवृत्त कर लेता है तो भगवत्कृपा उसे हर भीषण एवं विनाशकारी कष्ट से भी बचा लेती है और वह साफ सुरक्षित हो जाता है।

    प्रभास नामक शिष्य के जीवन में भोगों का अंतहीन सिलसिला जो प्रारंभ हुआ तो वह १३ साल २ महीने और १७ दिन तक चला। उस अवधि में उसने अपने जीवन में सैकड़ों बार मौत को अपने करीब से गुजरते देखा। अपनों का अपमान, तिरस्कार, उपेक्षा एवं निंदा रूपी घोर मानसिक यंत्रणा सही। 

    अभाव एवं बीमारी ने उसके तन-मन को जर्जर कर दिया था। भावनात्मक पीड़ा उसने इतनी पाई कि लगा कि अब आत्महत्या ही इसका एकमात्र निदान है। सामाजिक एवं आर्थिक विपन्नता ने उसको दरिद्र एवं भिखारी बना दिया था, परंतु इतने दीर्घकाल की इस भीषण पीड़ा के बीच उसकी एक विशेषता थी कि वह अपने गुरु के प्रति अगाध निष्ठा एवं पुरुषार्थ के प्रति प्रबल आस्था रखता था। 

     इन्हीं दोनों अस्त्रों के कारण वह भीषण कष्टों में भी मुस्कराता ही नहीं, हँसता रहता था। हजारों विरोधियों एवं शत्रुओं के बीच भी निर्भय विचरता था, जैसे उसे अपने आस-पास बुने हुए षड्यंत्रों से कोई सरोकार नहीं है। वह जानता सब कुछ था, परंतु भावभरे हृदय से क्षमा भी कर देता था।

    प्रभास का दुःख कम होने का नाम नहीं लेता था। जन्मांतरों के भोग संघनित होकर उसे चित्र-विचित्र परिस्थितियों से अचंभित करते रहते थे। किसी भी रूप में उसका जीवन सामान्य नहीं था। रात और दिन का उसे फरक नहीं था, उस पर भी विभिन्न प्रकार के कार्यों का दबाव। गिरते-पड़ते वह कार्य करता और अपने मार्गदर्शक की हर कही हुई बात को मंत्र मानकर यथासंभव अमल करता था। 

     उसकी यही खासियत थी कि जो कहा गया, सो करना है, फिर चाहे उसका परिणाम कैसा भी क्यों न हो और आश्चर्यजनक रूप से उसे सफलता भी मिलती थी। वह सफलता से कभी उन्मादित नहीं होता और गुरु के चरणों में सभी सफलताओं को अर्पित कर देता था। उसका पुरुषार्थ यही था कि वह अपने गुरु के प्रति निष्ठा को कभी भी डिगने नहीं देता था। हजारों आते और उसके गुरु को ठगकर चले जाते, परंतु उसने कभी भी अपनी निष्ठा पर आँच आने नहीं दी।

    प्रभास अपनी प्रशंसा में मुस्कराकर कहता था-“सब कुछ गुरुकृपा है, प्रभु का वरदान है।” उसने अपनी इस निष्ठा एवं आस्था रूपी पुरुषार्थ से पिछले सभी जन्मों के भोगों को काट दिया; क्योंकि उसने अपने जीवन में सभी कष्टों एवं पीड़ाओं को तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से, बिना प्रतिक्रिया किए झेला। भोगों की त्वरा एवं तीव्रता में चीखता-चिल्लाता वह कभी भी अपने पुरुषार्थ से विचलित नहीं हुआ और न डिगा।

      ईश्वर की कृपा एवं गुरु के सतत मार्गदर्शन से उसके भोगों की तीव्रता की तुलना में उसका वर्तमान में किया गया पुरुषार्थ कभी भी कमजोर नहीं पड़ा और परिणामस्वरूप प्रभास जन्मांतरों के भोगों को भोगकर गुरुभक्ति के सागर में मग्न हो गया।

    ऋषि कहते हैं- जीवन में कुछ अनिवार्य भोग होते हैं और उन्हें भोग लेना चाहिए; इसी में भलाई है। भले ही यह भोग कितना भी भयावह एवं विप्लवी क्यों न हो, परंतु उससे डरे बिना तपस्या रूपी चरम पुरुषार्थ से उसका सामना करना चाहिए। तपस्या से भोग समाप्त तो नहीं होता, परंतु इसकी तीव्रता घटकर सहने योग्य हो जाती है। 

     यदि तपस्या सतत चलती रहे तो तप की भट्ठी में सूक्ष्म में स्थित भोग के बीज गल जाते हैं और स्थूल में उतरे भोग कमजोर हो जाते हैं। यह अलग बात है कि हर भोग के अनुरूप उसको काटने एवं कमजोर करने का अपना निश्चित विधान होता है। (चेतना विकास मिशन).

Ramswaroop Mantri

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