फणीन्द्रदेव संस्थान और आजाद हिंद पाठागार/लाइब्रेरी (जलपाईगुड़ी शहर में एक प्रमुख हाई स्कूल और सार्वजनिक पुस्तकालय) का उद्घाटन किया था
कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना के समय से ही जलपाईगुड़ी (उत्तर बंगाल) में समाजवादी आंदोलन का मजबूत आधार था। जिले में समाजवादी नेतृत्व द्वारा किसान आंदोलन,चाय बागान श्रमिक आंदोलन और वंचित समाज के हक अधिकार के लिए कई महत्वपूर्ण आंदोलन किए गए। स्वतंत्रता के बाद के दौर में “संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी” और “प्रजा सोशलिस्ट पार्टी” का मजबूत संगठनात्मक आधार था। स्वाभाविक रूप से कई समाजवादी नेता जलपाईगुड़ी जिले और आसपास के अंचलों के थे।

डॉ. राममनोहर लोहिया तीन मौकों पर जलपाईगुड़ी आए थे। अगस्त 1946 में पहली बार डॉ. लोहिया अपने संगठनात्मक दौरे के तहत उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी आए थे। यहां उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों के बीच फणीन्द्रदेव संस्थान और आजाद हिंद पाठागार/लाइब्रेरी (जलपाईगुड़ी शहर में एक प्रमुख हाई स्कूल और सार्वजनिक पुस्तकालय) का उद्घाटन किया था।
पुराने वरिष्ठ समाजवादियों को ज्ञात होगा कि सोशलिस्ट पार्टी में उन दिनों एक अच्छी बात यह थी कि देशभर के गांव,शहर और कस्बे में समाजवादी पुस्तकालयों की स्थापना करना। मेरे गांव (पूर्व का मुंगेर जिला) में भी साल 1958 में डॉ.राममनोहर लोहिया समाजवादी पुस्तकालय सह सोशलिस्ट कार्यालय के उद्घाटन के निमित्त ही आए थे। सोचिए कितनी अच्छी परंपरा थी समाजवादियों की उन दिनों। आज अपने पुराने संस्कारों से दूर हुए तो नतीजा भी आपके सामने है।

आजाद हिंद पाठागार (समाजवादियों द्वारा स्थापित) में डॉ. राममनोहर लोहिया ने विजिटर डायरी/आगंतुक पुस्तिका में अपनी टिप्पणी भी लिखी थी। वरिष्ठ समाजवादी नेता और बेलाकोबा हाई स्कूल के पूर्व प्रधानाध्यापक अजय बसु ने बताया कि वर्ष 1950 में डॉ. राममनोहर लोहिया दूसरी बार जलपाईगुड़ी शहर आए थे। श्री बोस ने इस घटना का विवरण इस प्रकार दिया –
”एक शाम बादल सरकार, निर्मल सरकार और हरिपद घोष बड़गांव प्रांगण में समाजवादी पार्टी के कार्यालय में बैठे थे। उस समय पारंपरिक मारवाड़ी पोशाक पहने एक सज्जन हमारे पार्टी कार्यालय में आए और निर्मल दा को बुलाया। उन्होंने कुछ देर अलग-अलग बातचीत की और फिर साथ-साथ चले गए। अगले दिन हम निर्मल दा के घर गए और पता चला कि पारंपरिक मारवाड़ी पोशाक पहने सज्जन डॉ. राममनोहर लोहिया थे। उस समय नेपाली कांग्रेस ने नेपाल की राणाशाही के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया था। डॉ. राममनोहर लोहिया और कुछ अन्य समाजवादी नेताओं ने उस आंदोलन को सक्रिय समर्थन दिया था।
जलपाईगुड़ी आकर डॉ. राममनोहर लोहिया ने निर्मल सरकार को सिलीगुड़ी के समाजवादी नेता बसंत घोष से संपर्क करने की जिम्मेदारी दी। डॉ. राममनोहर लोहिया के निर्देशानुसार श्री बसंत घोष राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल हुए और उनके नेतृत्व में नेपाल का झापा प्रांत राणाशाही से मुक्त हुआ।

तीसरी बार डॉ. राममनोहर लोहिया साल 1965 में मयनागुड़ी में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में भाग लेने के लिए जलपाईगुड़ी आए थे।उन्होंने प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रदेश महामंत्री देवेन सरकार के घर में रात्रि विश्राम किया था। उत्तर बंगाल के प्रमुख समाजवादी नेता श्री चित्त डे और निरंजन दत्ता ने मयनागुड़ी रेलवे स्टेशन पर डॉ. राममनोहर लोहिया का स्वागत किया। वहीं अगले दिन डॉ. लोहिया मयनागुड़ी में ही एक विशाल समाजवादी कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित किया था।
उत्तर बंगाल के ज़िलों में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का पचास और साठ के दशक में एक मजबूत जनाधार था। ख़ासकर चाय बागान ट्रेड यूनियन में सोशलिस्टों का मज़बूत दख़ल था। नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय कम्युनिस्टों के हिंसक आंदोलन की वजह से कई प्रमुख सोशलिस्ट नेताओं की हत्या हुई। इस हिंसा का कोई उचित कारण नहीं था।
बहरहाल,चार साल बाद आज जलपाईगुड़ी स्थित समाजवादियों द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद पाठागार/ लाइब्रेरी आने का अवसर मिला। डॉ.राममनोहर लोहिया से जुड़ीं कई स्मृतियों से अवगत हुआ। लाइब्रेरियन श्रीमती मंजुश्री मजूमदार ने हफ़्ते-दस दिनों में कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेजों के विषय में जानकारी देंगी।
आदर सहित
अभिषेक रंजन सिंह
डॉ. राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन, दिल्ली





