वियतनाम से एक माह बाद भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष भारत वापस ले आए गए हैं। संस्कृति मंत्रालय ने बताया कि वियतनाम में एक महीने तक चलने वाली प्रदर्शनी के बाद अवशेष को भारत लाया गया। मूल रूप से 21 मई को समाप्त हुई प्रदर्शनी श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक उत्साह और श्रद्धा को देखते हुए दो जून तक बढ़ा दी गई थी। वियतनाम सरकार के विशेष अनुरोध पर 2 जून तक बढ़ाई गई प्रदर्शनी के बारे में संस्कृति मंत्रालय ने कहा, इस विस्तारित दौरे के दौरान पवित्र अवशेषों को नौ शहरों में रखा गया। इस अवधि में 15 मिलियन से अधिक भक्तों ने भगवान बुद्ध का आशीर्वाद लिया।
आईपीएल फाइनल:बारिश से धुला मुकाबला तो कौन बनेगा चैंपियन?
आईपीएल फाइनल का अब बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। खास बात ये है कि कई साल बाद ऐसा मौका आ रहा है कि फाइनल चाहे कोई भी टीम जीते, नया चैंपियन मिलना तय है। आरसीबी और पंजाब किंग्स की टीमें पहले सीजन से आईपीएल खेल रही हैं, लेकिन अभी तक उनके नसीब में ट्रॉफी नहीं आई है। इस बार भी एक टीम इससे महरूम रह जाएगी, वहीं एक टीम पहली बार चैंपियन बनने का गौरव हासिल करेगी। हालांकि तीन जून को अहमदाबाद में बारिश के चांस हैं, इसलिए हो सकता है कि मुकाबले में बाधा आए। अगर मैच बारिश के कारण नहीं हो पाया तो ट्रॉफी किसे दी जाएगी, चलिए जरा समझते हैं।

पहली बार खिताब जीतने की होगी जंग
आरसीबी की कप्तानी भले ही इस बार रजत पाटीदार कर रहे हों, लेकिन इस टीम की असली पहचान विराट कोहली से है। दुनियाभर में कई खिताब जीत चुके कोहली को पहली आईपीएल ट्रॉफी का इंतजार है। वहीं श्रेयस अय्यर की कोशिश होगी कि बैक टू बैक दो बार खिताब जीतकर इतिहास रचने का काम किया जाए। पिछली बार वे केकेआर के कप्तान थे, इस बार पंजाब की कमान उनके हाथ में है।
आईपीएल फाइनल के दिन कैसा रहेगा अहमदाबाद का मौसम?
इस बीच अगर तीन जून को अहमदाबाद के मौसम की बात की जाए तो अभी की जानकारी के अनुसार शाम को बारिश हो सकती है और ये खेल खराब कर सकती है। हालांकि ऐसा नहीं लग रहा है कि मैच के वक्त में बारिश होती रहेगी। बीसीसीआई ने इसका पुख्ता इंतजाम किया है। मैच के लिए अतिरिक्त 120 मिनट और निकाले गए हैं, ताकि अगर मैच देर से शुरू हो या फिर बीच में रुके तो एक्स्ट्रा टाइम में इसे कराया जा सके। इतना ही नहीं फाइनल के लिए बीसीसीआई ने रिजर्व डे भी रखा है, यानी अगर तीन जून को फाइनल नहीं हो पाया फिर बीच में रुक गया तो फिर चार जून को भी मुकाबला खेला जा सकता है। रिजर्व डे में भी 120 मिनट का अतिरिक्त समय रखा गया है।
दो दिन में भी मैच नहीं हो पाया तो फिर क्या फैसला होगा?
अगर दो दिन में मैच हो गया तब तो ठीक है, जो टीम जीतेगी, खिताब अपने नाम कर लेगी, लेकिन अगर दोनों दिन कहीं बारिश होती रही तो फिर क्या होगा। ये सवाल भी आपके मन में होगा। अगर दो दिन में बिल्कुल भी मैच नहीं हो पाता है तो फिर लीग चरण के दौरान जो टीम अंक तालिका में आगे थी, उसे विजेता घोषित कर दिया जाएगा। यानी पंजाब किंग्स की टीम चैंपियन बन जाएगी।
अंक तालिका में किस टीम को फायदा?
आपको याद दिला दें कि लीग फेज में 14 मैच खेलकर पंजाब किंग्स और आरसीबी ने बराबर 9 मुकाबले अपने नाम किए थे। दोनों के पास 19 अंक हैं, लेकिन नेट रन रेट के आधार पर अगर देखा जाएगा तो बाजी पंजाब की टीम मार ले जाएगी। पंजाब का नेट रन रेट 0.372 का है और आरसीबी का 0.301 का है। हालांकि आपको फिर बता दें कि ये सब तभी किया जाएगा, जब लगातार दो दिन तक पांच ओवर का भी मुकाबला नहीं हो पाएगा। मैच हुआ तो फिर जो टीम अच्छा खेल दिखाएगी, वही चैंपियन कही जाएगी।
रूस ने ऐसा क्या किया कि खुशी से झूमा तालिबान
रूस ने तालिबान के राजदूत को मान्यता दे दी है। इससे अफगान तालिबान में खुशी की लहर है। हालांकि, तालिबान अब चाहता है कि भारत भी उसके राजनयिक को मान्यता दे और दिल्ली में तैनाती को मंजूर करे। इससे पहले चीन और पाकिस्तान ने तालिबान के राजदूत को मान्यता दी है।
रूस ने मास्को में तालिबान के राजदूत के नामांकन को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया है। इसकी पुष्टि तालिबान के नियंत्रण वाले अफगान विदेश मंत्रालय ने की है। वर्तमान में अफगानिस्तान और रूस दोनों पश्चिमी प्रतिबंधों से परेशान हैं। इस कारण दोनों देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध भी मजबूत हो रहा है। हालांकि, रूस से मंजूरी मिलने के बाद अब तालिबान की भारत से उम्मीदें भी बढ़ गई हैं। तालिबान चाहता है कि मोदी सरकार भी उनके राजनयिक को बतौर राजदूत नई दिल्ली में मान्यता दे दे। लेकिन, मोदी सरकार ने तालिबान की डिमांड पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
रूस-तालिबान के बीच मजबूत हो रहे संबंध
रूस ने अप्रैल में तालिबान पर अपने प्रतिबंध को निलंबित कर दिया था, जिसे उसने दो दशकों से अधिक समय तक आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया था। इस कदम से मास्को के लिए अफगानिस्तान के नेतृत्व के साथ संबंधों को सामान्य करने का मार्ग प्रशस्त हुआ। हालांकि, अगस्त 2021 में काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद से ही रूस लगातार एक्टिव था। किसी भी देश ने औपचारिक रूप से तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं दी है, जिसने 2021 में अमेरिकी नेतृत्व वाली सेना के हटने के बाद देश पर कब्जा कर लिया था। तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने एक बयान में कहा, “हमें उम्मीद है कि यह नया चरण दोनों देशों को विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने की अनुमति देगा।”
चीन 2023 में तालिबान से राजदूत स्तर पर एक राजनयिक को स्वीकार करने वाला पहला देश बन गया और उसके बाद से कई देशों ने इसका अनुसरण किया है। इसमें पाकिस्तान भी शामिल है, जिसने घोषणा की कि वह इस सप्ताह पद को अपग्रेड करेगा। राजनयिकों का कहना है कि किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के समक्ष औपचारिक रूप से राजदूत का परिचय प्रस्तुत करना मान्यता की दिशा में उठाया गया कदम है।
भारत-तालिबान संबंध
जब अगस्त 2021 में तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया था, तब इसे भारत के लिए झटका माना जा रहा था। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में दोनों पक्षों के बीच संबंधों में काफी सुधार हुआ है। अभी कुछ दिन पहले ही भारत और तालिबान में शीर्ष स्तर पर पहला संपर्क हुआ था, जिसमें भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी से बात की थी। इसके पहले मुत्ताकी और भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री के बीच दुबई में मुलाकात हुई थी। इसके अलावा भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारी लगातार तालिबान नेतृत्व के साथ संपर्क में हैं।
चीन ने 10 लाख तिब्बती बच्चों को किया कैद
चीन पर मुस्लिम बहुल शिनजियांग के बाद अब तिब्बत में भी यातना शिविरों का विस्तार करने का आरोप है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से अलग करके चीनी सरकार द्वारा संचालित बोर्डिंग स्कूलों में रखा गया है।

चीन ने मुस्लिम बहुत शिनजियांग में यातना शिविर चलाने के बाद अब तिब्बत में भी इसका विस्तार किया है। इस बार चीन के निशाने पर तिब्बत के स्कूली बच्चे हैं। एक रिपोर्ट का अनुमान है कि लगभग 10 लाख तिब्बती बच्चों को उनके परिवार के सदस्यों से अलग कर दिया गया है और उन्हें चीनी अधिकारियों के नियंत्रण वाले बोर्डिंग स्कूलों में रखा गया है। इसका खुलासा एक तिब्बती कार्यकर्ता समूह ने चार साल पहले ही किया था। अब तिब्बत में चीन के “औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूलों” के प्रसार को लेकर उन्होंने नई जानकारियां साझा की हैं, जिसमें बताया गया है कि चीन किस तरह से वे तिब्बती भाषा, संस्कृति और पहचान को नष्ट कर रहा है।
तिब्बती बच्चों को क्यों कैद कर रहा चीन
तिब्बत एक्शन इंस्टीट्यूट ने गुरुवार को “जब वे हमारे बच्चों को लेने आए: चीन के औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूल और तिब्बत का भविष्य” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जो नए साक्षात्कारों और अन्य शोध पर आधारित है। इस रिपोर्ट में चीनी सरकार पर तिब्बती बच्चों को आक्रामक और जबरन उनकी संस्कृति और भाषा से दूर करने का आरोप लगाया है, जिससे अलग लोगों के रूप में उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है।
धार्मिक गतिविधियों से दूर रखने की कवायद
रिपोर्ट में पाया गया कि छात्रों को तिब्बती भाषा की कक्षाओं में दाखिला लेने या धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने से प्रतिबंधित किया गया है, यहाँ तक कि स्कूल की छुट्टियों के दौरान भी। कार्यकर्ताओं के अनुसार, माना जाता है कि ऐसे बोर्डिंग स्कूलों में अब लगभग दस लाख तिब्बती बच्चे रहते हैं, हालांकि, सटीक संख्या की पुष्टि करना मुश्किल है।
चार साल के कम उम्र के बच्चे भी बने निशाना
रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों को कम उम्र में ही उनके परिवारों से अलग कर दिया जाता है – कुछ ग्रामीण इलाकों में तो चार साल की उम्र में ही – और उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति वफादार होने के लिए प्रेरित किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “अब इस बात के और भी सबूत हैं कि तिब्बत में छोटे बच्चों को भी जबरन बोर्डिंग पर जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वर्तमान में, तीन या चार से छह वर्ष की आयु के तिब्बती बच्चों को चीनी भाषा के प्रीस्कूल में जाना पड़ता है।” TAI, 2008 में बीजिंग ओलंपिक से पहले बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के बाद तिब्बतियों की सहायता के लिए 2009 में बनाया गया एक अमेरिकी वकालत समूह है।
मुकेश अंबानी ने सेना की बहादुरी को किया सलाम
ऑपरेशन सिंदूर पर मुकेश अंबानी ने भारतीय सेना की बहादुरी को सलाम करते हुए कहा कि देश आतंकवाद के हर रूप के खिलाफ एकजुट और अडिग है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के निर्णायक नेतृत्व की सराहना की और कहा कि भारत अपनी गरिमा, सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा।
भारतीय सशस्त्र बलों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के प्रति समर्थन जताते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद एक भावनात्मक बयान जारी किया। यह ऑपरेशन सीमा पार से हो रही उकसावे की कार्रवाई का निर्णायक जवाब माना जा रहा है, जिसने देशभर में एकजुटता की नई भावना को जन्म दिया है। अंबानी के शब्द देश के करोड़ों नागरिकों की भावना की सच्ची अभिव्यक्ति हैं, जो आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में पूरी मजबूती के साथ खड़े हैं।
रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, मुकेश डी. अंबानी का आधिकारिक बयान
ऑपरेशन सिंदूर के लिए हम अपनी भारतीय सेना पर बेहद गर्व महसूस करते हैं। आतंकवाद के हर रूप के खिलाफ देश पूरी तरह एकजुट है। साथ ही, हमारी इच्छाशक्ति दृढ़ और मकसद अडिग है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साहसी और निर्णायक नेतृत्व में भारतीय सशस्त्र बलों ने हर सीमा पार उकसावे का सटीक और ताकतवर जवाब दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी का नेतृत्व यह संदेश देता है कि भारत आतंक के सामने कभी चुप नहीं रहेगा। हमारी सरजमीं, हमारे नागरिकों या देश की रक्षा करने वाले हमारे बहादुर जवानों पर किसी भी हमले को भारत कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। बीते कुछ दिनों की घटनाएं यह साफ कर चुकी हैं कि हमारी शांति को चुनौती देने वाली हर कोशिश का जवाब ठोस और निर्णायक कार्रवाई से दिया जाएगा।
रिलायंस परिवार, देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए उठाए गए हर कदम में अपना पूरा सहयोग देने को तैयार है। हम करोड़ों भारतीयों की तरह मानते हैं कि भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी गरिमा, सुरक्षा और संप्रभुता की कीमत पर नहीं।
हम सब मिलकर खड़े होंगे। हम लड़ेंगे, और हम जरूर जीतेंगे।
जय हिंद!
जय हिंद की सेना!
मुकेश अंबानी का यह बयान केवल एक कॉर्पोरेट प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की सामूहिक भावना, दृढ़ संकल्प और राष्ट्रीय एकता की झलक है। जब देश एक अहम मोड़ पर खड़ा है, तब उनकी यह आवाज उस भरोसे को मज़बूत करती है कि शांति, सुरक्षा और हमारी सेनाओं की प्रतिष्ठा ही भारत की असली ताकत हैं।
सलमान खान ने खरीदी एक और बुलेटप्रूफ एसयूवी
सलमान खान को मुंबई में देखा गया। हमेशा की तरह उनके आसपास कड़ी सुरक्षा व्यवस्था दिखी। पर वो एक नई SUV में नजर आई। ब्लैक कलर की इस बुलेटप्रूफ मर्सिडीज की कीमत करोड़ों में बताई जा रही है। पिछले साल दुबई से भी उन्होंने कार खरीदी थी, जिसकी कीमत 2 करोड़ थी।
बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान के पास कई महंगी और लग्जरी कार हैं। गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई गैंग से धमकी मिलने और घर ‘गैलेक्सी अपार्टमेंट’ के बाहर फायरिंग के बाद उन्होंने बुलेटप्रूफ गाड़ियां भी खरीदीं। वाई प्लस सिक्योरिटी में रहने वाले भाईजान ने अब एक और नई SUV खरीदी है। अब उनके गैराज में मर्सिडीज-बेन्ज Maybach GLS भी है, जिससे वो सोमवार को मुंबई में एक लोकेशन से बाहर आते नजर आए। इस कार की कीमत भी करोड़ों में है।
सलमान ने पिछले ही साल एक और बुलेटप्रूफ एसयूवी खरीदी थी। इसे दुबई से मंगवाया गया था। उनके पास पहले से ही एक बुलेटप्रूफ निसान पेट्रोल थी। लेकिन एक और निसान पेट्रोल दुबई से मंगवाई थी। सुरक्षा और पावर के मामले में जबरदस्त ये गाड़ी 2 करोड़ रुपये की बताई गई थी। अब भाईजान ने एक और SUV खरीदी है। ये भी बुलेटप्रूफ है।
Mercedes-Benz Maybach GLS का मुंबई में एक्स-शोरूम प्राइज 3.39 – 3.71 करोड़ रुपये है। बुलेटप्रूफिंग के बाद इसकी कीमत में और इजाफा हुआ होगा। 5 सिटर वाली फुल साइज मर्सिडीज का इंजन 3982 cc है। इसकी टॉप स्पीड 250 kmph है।
मालूम हो कि सलमान को बीते साल से गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई गैंग से लगातार धमकियां मिल रही थीं। मुंबई में एनसीपी नेता और उनके अजीज दोस्त बाबा सिद्दीकी की हत्या के बाद एक्टर की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। उनके घर (गैलेक्सी अपार्टमेंट) के बाहर फायरिंग भी हो चुकी है। उन्हें वाई प्लस सिक्यॉरिटी भी मुहैया की गई है।सलमान के पास हैं कई कार
जानकारी के अनुसार, सलमान के पास दो निसान पेट्रोल के अलावा पोर्शे कायने, बीएमडब्ल्यू एक्स6, टोयोटा लैंड क्रूजर, मर्सिडीज बेंज जीएलई 43 एएमजी, लेक्सस एलएक्स, ऑडी आरएस7, मर्सिडीज बेंज जीएलएस, ऑडी ए8एल जैसी महंगी कारें हैं। अब ये नई कार भी इस लिस्ट में शामिल हो गई है।
अमेरिकी सेना में जुकरबर्ग की एंट्री!,मेटा के बनाए चश्मे-हेलमेट पहनेंगे सैनिक?
मार्क जुकरबर्ग की कंपनी मेटा, अमेरिकी सेना के लिए ऐसी टेक्नोलॉजी बना सकती है, जिसे एआर-वीआर हेडसेट में लगाकर सैनिक सीधे किसी एआई पावर्ड हथियार से कम्युनिकेट कर पाएंगे। वह छुपे हुए या दूर से आ रहे ड्रोन को देख सकेंगे।
दुनिया के प्रमुख शक्ति संपन्न देश अपनी सेनाओं को हाईटेक बना रहे हैं। अमेरिका हमेशा से कुछ अलग करता आया है। खबरों के अनुसार अमेरिका की प्रमुख कंपनियों में शुमार मेटा, वहां की सेना के लिए हाईटेक टेक्नोलॉजी तैयार कर सकती है। मेटा को मार्क जुकरबर्ग लीड करते हैं और ये कंपनी फेसबुक, वॉट्सऐप व इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स चलाती है। कुछ साल से मेटा वीआर और एआर यानी वर्चुअल रियलिटी गैजेट्स पर काम कर रही है। उसने मेटा ग्लास बनाए हैं जिन्हें पहनकर एक यूजर कई सारे फीचर्स को अपने चश्मे से कंट्रोल कर पाता है। अब कहा गया है कि मेटा ने डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर एंड्रिल इंडस्ट्रीज के साथ मिलकर यूएस आर्मी के लिए वीआर/एआर हेलमेट और वियरेबल्स बनाने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। ऐसा हुआ तो यह अमेरिकी सेना में जुकरबर्ग की एंट्री होगी। आने वाले वक्त में अमेरिकी सेना के जवान मेटा के बनाए चश्मे और हेलमेट पहन सकते हैं।
एंड्रॉयड हेडलाइंस की रिपोर्ट के अनुसार, मेटा और एंड्रिल इंडस्ट्रीज मिलकर ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स बना सकती हैं, जिनमें हाइटेक सेंसर और एआई का इंटीग्रेशन होगा। दोनों कंपनियां एक पार्टनरशिप पर पहुंच गई हैं। उन्होंने टीम तैयार की है जो हाईटेक इंस्ट्रूमेंट पर काम करेगी। इसकी शुरुआत हेलमेट और चश्मों से की जा सकती है।
किस काम में इस्तेमाल होंगे
रिपोर्ट के अनुसार, सैनिकों के लिए ऐसे खास चश्मे या हेलमेट बनाए जा सकते हैं जो असल जिंदगी से जुड़े दृश्यों को डिजिटल इन्फर्मेशन के साथ सैनिकों के सामने पेश कर सकते हैं। कहा जाता है कि चश्मे में ऐसे सेंसर लगे होंगे जो किसी सैनिक की सुनने और देखने की क्षमता को बढ़ा सकते हैं। सैनिक दूर से आ रहे या छुपे हुए ड्रोन को देख पाएंगे और उन्हें टार्गेट करने में आसानी होगी।
एआई पावर्ड हथियारों से बात करेंगे सैनिक
रिपोर्ट के अनुसार, मेटा और एंड्रिल की तकनीक में ऐसी खूबी होगी, जिसके जरिए कोई सैनिक किसी एआई पावर्ड हथियार से कम्युनिकेट कर सकेगा। बताया जाता है कि एंड्रिल ऑटोनॉमस हथियार बनाएगी और मेटा उनमें अपनी टेक्नोलॉजी को इंटीग्रेट करेगी। सैनिकों को इन टेक्नोलॉजी के साथ ट्रेंड किया जाएगा जिसके बाद वो किसी भी हथियार को कंट्रोल कर पाएंगे।
मां कामाख्या पर टिप्पणी मामले में असम के मुख्यमंत्री CM हिमंत ने अपनाया सख्त रुख
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थल- कामाख्या मंदिर पर टिप्पणी करने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने देवी कामाख्या सहित कई हिंदू देवी-देवताओं का कथित अपमान करने के इस मामले में कहा, पश्चिम बंगाल के एक शख्स के खिलाफ असम पुलिस ने मामला दर्ज किया गया है। सरकार ने पश्चिम बंगाल की सरकार से कहा है कि वे आरोपी को असम को सौंप दें। सीएम हिमंत ने कहा, ‘अब नजरें बंगाल सरकार पर हैं। आने वाले समय में ये साफ हो जाएगा कि बंगाल सरकार असम के अनुरोध पर कैसी प्रतिक्रिया देती है और सहयोग करती है या नहीं।’ सीएम ने अपने एक्स हैंडल पर भी इस मामले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि असम की अदालत में कानूनी कार्रवाई के लिए वे बंगाल सरकार से सहयोग मांगेंगे। पूरा मामला कोलकाता के वजाहत खान कादरी रशीदी से जुड़ा है। उन्होंने कथित तौर पर कई सोशल मीडिया पोस्ट किए हैं। उन पर हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है। कादरी 22 वर्षीय युवती शर्मिष्ठा पनोली पर इस्लाम का अपमान करने और सांप्रदायिक टिप्पणी का आरोप लगाकर मामला दर्ज करा चुके हैं। पनोली की गिरफ्तारी के बाद कोलकाता की एक अदालत ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा है।
बंगलूरू में विराट के पब और रेस्तरां के खिलाफ केस दर्ज
क्रिकेटर विराट कोहली के सह-स्वामित्व वाले पब और रेस्तरां चेन वन-8 कम्यून के मैनेजर और स्टाफ के खिलाफ बंगलूरू पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। इन पर सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम का उल्लंघन करने का आरोप है। मामला बार में धूम्रपान के लिए कोई विशिष्ट क्षेत्र निर्धारित ना करने से जुड़ा है। एक अधिकारी ने बताया कि गश्त के दौरान मिली सूचना के आधार पर 29 मई को पुलिस की एक टीम ने कस्तूरबा रोड स्थित बार एवं रेस्तरां का निरीक्षण था। इस दौरान पाया गया कि पब के अंदर धूम्रपान के लिए कोई विशिष्ट क्षेत्र नहीं था।
तमिलनाडु : यौन उत्पीड़न में बिरयानी विक्रेता को 30 साल की सजा
चेन्नई की महिला अदालत ने अन्ना यूनिवर्सिटी यौन उत्पीड़न मामले में बिरयानी विक्रेता ज्ञानशेखरन को 30 साल की सजा सुनाई। उस पर 90 हजार का जुर्माना भी लगाया गया है। 28 मई को महिला कोर्ट की जज एम राजलक्ष्मी ने ज्ञानशेखरन पर लगाए सभी 11 मामलों में दोषी करार दिया था। यौन उत्पीड़न का यह मामला पिछले साल दिसंबर का है। ज्ञानशेखरन ने यूनिवर्सिटी कैंपस में एक सुनसान जगह पर छात्रा का यौन उत्पीड़न किया था और उसके पुरुष साथी पर हमला किया था। लोक अभियोजक मैरी जयंती ने कहा, जहां तक ज्ञानशेखरन मामले का सवाल है, कोर्ट ने सजा का एलान कर दिया है।
पीएम केयर्स फंड के दरवाजे खोलें प्रधानमंत्री मोदी, पूर्वोत्तर में बाढ़ पर बोले कांग्रेस प्रमुख खरगे
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ की स्थिति को लेकर सोमवार को मोदी सरकार पर निशाना साधा। खरगे ने कहा, उम्मीद है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए अपने पीएम केयर्स फंड के दरवाजे खोलेंगे। खरगे ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 में राज्य को बाढ़ मुक्त बनाने का वादा किया था, लेकिन ऐसा लगता है कि भाजपा की डबल इंजन सरकारों ने राज्य को धोखा दिया है। एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर विनाशकारी बाढ़, भूस्खलन और भारी बारिश से जूझ रहा है। असम, अरुणाचल, मणिपुर, सिक्किम और मेघालय बुरी तरह प्रभावित हैं। यहां कई लोगों की जान चली गई है और लाखों लोग प्रभावित हुए हैं। उन्होंने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से लोगों को सहायता उपलब्ध कराने के लिए हरसंभव प्रयास करने को कहा।
भड़काऊ भाषण पर संघ के नेता के खिलाफ कर्नाटक में केस
कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक नेता के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में सोमवार को प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस ने बताया कि आरोपी के प्रभाकर भट ने 12 मई को एक हिंदूवादी कार्यकर्ता शुहास शेट्टी की याद में आयोजित शोकसभा के दौरान यह भाषण दिया था। शेट्टी की एक मई को मंगलूरू में हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार, कार्यक्रम यहां बंटवाल ग्रामीण पुलिस थाने के तहत कवलपाडुर गांव के मडवा पैलेस कन्वेंशन हॉल में आयोजित किया गया। भट ने यहां कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दिया, जिससे सार्वजनिक सौहार्द बिगड़ सकता था और समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ सकती थी।
गोवा दिवस पर कांग्रेस के पोस्टर से खरगे गायब, भाजपा बोली दलित अध्यक्ष का अपमान किया
गोवा राज्य दिवस के मौके पर बनाए गए बैनर पर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की तस्वीर न होने को लेकर पार्टी की राज्य इकाई आलोचाओं का सामना कर रही है। वहीं, भाजपा ने आरोप लगाया कि विपक्षी पार्टी ने अपने दलित अध्यक्ष का अपमान किया है। प्रदेश कांग्रेस ने 30 मई को गोवा राज्य दिवस के अवसर पर पणजी में एक बैठक आयोजित की थी। इससे पहले उसने नवेलिम (दक्षिण गोवा) में होने वाली एक जनसभा को रद्द कर दिया था, जिसमें खरगे को शामिल होना था। कार्यक्रम के दौरान एक बैनर पर वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पार्टी की गोवा इकाई के प्रमु अमित पाटकर और विपक्ष के नेता यूरी अलेमाओ की तस्वीरें थीं, लेकिन खरगे की तस्वीर गायब थी।
छंटनी पर अड़ी ट्रंप सरकार बोली- अदालत फैसला करे; वेनेजुएला के लोगों को मिला संरक्षण बरकरार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार की तरफ से लिए गए दो बड़े फैसलों पर अब अदालतों ने रोक लगा दी है। इसमें पहला मामला फेडरल कर्मचारियों की बड़े स्तर पर की जा रही छंटनी से जुड़ा है। ट्रंप प्रशासन ने सरकारी कामकाज को छोटा करने और कर्मचारियों की संख्या घटाने के लिए एक आदेश जारी किया था। लेकिन कैलिफोर्निया की जज सुसान इल्सटन ने इस फैसले पर रोक लगा दी है। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी छंटनी के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है।
प प्रशासन ने आदेश को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति को अपनी प्रशासनिक टीम को संचालित करने का अधिकार संविधान के तहत है और इसके लिए कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत नहीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने यूनियन और शहरों (जैसे बाल्टीमोर, शिकागो, सैन फ्रांसिस्को) से जवाब मांगा है।
बता दें कि इस योजना के तहत अब तक लगभग 75,000 कर्मचारी इस्तीफा दे चुके हैं या निकाले गए हैं। इससे बड़े पैमाने पर कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा जैसे विभागों के कामकाज पर असर पड़ा है।
वेनेजुएला के 5000 लोगों को मिला संरक्षण हटाने से कोर्ट का इनकार
दूसरा मामला वेनेजुएला के नागरिकों को अमेरिका में मिलने वाले टेम्पररी प्रोटेक्टेड स्टेटस (टीपीएस) से जुड़ा है। सैन फ्रांसिस्को की अदालत के जज एडवर्ड चेन ने 5,000 वेनेजुएलावासियों को अमेरिका में रहने और काम करने की मंजूरी बरकरार रखी है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ट्रंप सरकार को टीपीएस खत्म करने की अनुमति दे दी थी।
हालांकि जज चेन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जिन लोगों के दस्तावेजों की वैधता 2026 तक बढ़ाई गई है, वे अभी भी अमेरिका में रह सकते हैं। इनका मामला अलग रखा गया है और उनकी अभी निर्वासन की संभावना नहीं है।
‘स्टील व एल्युमीनियम पर लगाया शुल्क सुरक्षा उपाय नहीं’, अमेरिका ने WTO में भारत के दावे को किया खारिज
ट्रंप प्रशासन ने भारत के इस दावे को खारिज कर दिया है कि स्टील और एल्युमीनियम पर अमेरिकी टैरिफ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के तहत सुरक्षा उपाय हैं। अमेरिका ने 23 मई को डब्ल्यूटीओ को भेजे अपने जवाब में कहा कि ये टैरिफ राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से धारा 232 के तहत लगाए गए थे।
अमेरिका ने कहा कि उसने स्टील और एल्युमिनियम पर जो टैरिफ लगाए हैं, वो व्यापार बचाने के लिए नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए लगाए हैं। इसलिए भारत का इन टैक्स के बदले जवाबी टैक्स लगाने का कानूनी आधार नहीं बनता। भारत का कहना है कि उसे डब्ल्यूटीओ के नियमों के तहत जवाब देने का हक है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि भारत शायद सीधी कार्रवाई की जगह बातचीत से हल निकालना चाहेगा।
अमेरिका ने कहा उसकी ओर से लगाए टैरिफ सुरक्षा उपाय के अंतर्गत नहीं आते हैं। इन उपायों के संबंध में सुरक्षा समझौते के (एक प्रावधान) के तहत रियायतों या अन्य दायित्वों को निलंबित करने के भारत के प्रस्ताव का कोई आधार नहीं है। अमेरिका ने यह भी दावा किया कि भारत ने इस समझौते के तहत दायित्वों का पालन नहीं किया है। अमेरिका सुरक्षा उपायों पर समझौते के तहत धारा 232 टैरिफ पर चर्चा नहीं करेगा, क्योंकि हम शुल्क को सुरक्षा उपाय के रूप में नहीं देखते हैं।
भारत का तर्क, रियायतें वापस लेने अधिकार
दरअसल, भारत ने 9 मई को सुरक्षा समझौते के अनुच्छेद 12.5 के तहत डब्ल्यूटीओ को एक सूचना दी थी। इसमें कहा गया था कि वह स्टील, एल्युमीनियम और उनसे बने उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ के जवाब में सुरक्षा समझौते के अनुच्छेद 8.2 के तहत दी जा रही रियायतों को निलंबित करना चाहता है। भारत के अनुसार, अमेरिका ने 1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत ये शुल्क लगाए हैं, इसलिए भारत को रियायतें वापस लेने का अधिकार है।
इस पर आर्थिक विश्लेषक संगठन ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने कहा कि अमेरिका की यह दलील की उसने टैरिफ (आयात शुल्क) राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लगाए हैं, भारत की ओऱ से दी गई रियायतें वापस लेने या जवाबी टैरिफ लगाने की योजना को कानूनी रूप से अमान्य बना देता है।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि भारत के पास डब्ल्यूटीओ में विवाद उठाने, खुद से जवाबी टैरिफ लगाने या अन्य देशो के साथ मिलकर दबाव बनाने जैसे कई रास्ते हैं। लेकिन व्यावहारिक रूप से भारत इस मुद्दे को भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के जरिए हल करना चाहेगा और कोशिश करेगा कि अमेरिका ये टैरिफ हटा दे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक सख्त रुख अपना सकता है और डब्ल्यूटीओ की इजाजत के बिना भी कुछ अमेरिकी सामानों पर जवाबी टैरिफ लगा सकता है।
अमेरिका के धारा 232 टैरिफ के जवाब में यूरोपीय संघ (ईयू), कनाडा और चीन जैसे देशों ने पहले ही जवाबी टैरिफ लगाए हैं। जीटीआरआई ने सुझाव दिया कि भारत के पास भले ही कई कानूनी और राजनयिक विकल्प मौजूद हैं, लेकिन भारत तुरंत कोई कदम उठाने से बच सकता है और सही समय का इंतजार कर सकता है।
इस्राइली सेना ने गाजा पट्टी में आवासीय इमारत को बनाया निशाना, महिलाओं-बच्चों सहित 14 की मौत
इस्राइली सेना ने सोमवार को गाजा पट्टी में एक आवासीय इमारत को निशाना बनाया। इसमें 14 फलस्तीनियों की मौत हो गई, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
शिफा और अल-अहली अस्पताल ने उत्तर गाजा के जबालिया शरणार्थी शिविर में हमले में पांच महिलाएं और सात बच्चे मारे जाने की पुष्टि की है। इस्राइली सेना ने इस मामले पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। इस्राइल का कहना है कि वह केवल आतंकवादियों को निशाना बनाता है और नागरिकों को नुकसान पहुंचाने से बचने की कोशिश करता है। वह नागरिकों की मौत के लिए हमास को जिम्मेदार ठहराता है, क्योंकि यह चरमपंथी संगठन आबादी वाले इलाकों में सक्रिय है।
इस्राइल-हमास युद्ध 7 अक्तूबर 2023 को तब शुरू हुआ, जब फलस्तीनी चरमपंथियों ने इस्राइल पर हमला किया। इस हमले में करीब 1,200 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर नागरिक थे और ढाई सौ लोगों को बंधक बना लिया गया। इनमें से अधिकांश बंधकों को युद्धविराम समझौतों या अन्य समझौतों के तहत रिहा कर दिया गया। हालांकि अभी भी हमास ने 58 लोगों को बंधक बना रखा है, जिनमें करीब एक तिहाई के जीवित होने का आशंका है।
गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इस्राइल की सैन्य कार्रवाई में 54,000 से अधिक फलस्तीनियों की मौत हो चुकी है, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। हालांकि, मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि मृतकों में कितने नागरिक थे और कितने हमास के लड़ाके। इस्राइली हमलों में गाजा का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है और लगभग 90 फीसदी आबादी बेघर हो चुकी है।
हमास ने कहना है कि वह बचे हुए बंदियों को तब ही रिहा करेगा, जब इसके बदले और फिलिस्तीनी कैदी छोड़े जाएं, स्थायी संघर्ष विराम हो और इस्राइल गाजा से पीछे हटे। इस्राइल का कहना है कि वह तब तक युद्ध जारी रखेगा जब तक सभी बंदियों को छुड़ाया नहीं जाता और हमास को हराया या हथियार छोड़ने पर मजबूर नहीं किया जाता और उसे निर्वासित नहीं किया जाता।
पोलैंड मेंराष्ट्रपति चुनाव में कंजर्वेटिव करोल नावरॉकी की जीत
पोलैंड में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सियासी गर्माहट अपने चरम पर है। यहां राष्ट्रपति चुनाव में कंजर्वेटिव नेता करोल नावरॉकी की जीत हो गई है। उन्होंने 50.89 फीसदी मत पाकर प्रतिद्वंदी लिबरल उम्मीदवार और वारसा के मेयर रफाल ट्र्जासकोव्स्की को हराया। ट्र्जासकोव्स्की को 49.11 फीसदी वोट मिले। जीत के बाद नावरॉकी ने कहा कि हम पोलैंड को बचाएंगे।
राष्ट्रपति चुनाव में लिबरल उम्मीदवार और वारसा के मेयर रफाल ट्र्जासकोव्स्की और राइट-विंग इतिहासकार करोल नावरॉकी के बीच बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिला। एग्जिट पोल के मुताबिक ट्र्जासकोव्स्की को 49.3% और नावरॉकी को 50.7% वोट मिले थे। लेकिन 2% की त्रुटि सीमा को देखते हुए यह मुकाबला बराबरी पर माना जा रहा था। इससे पहले एग्जिट पोल में ट्रजास्कोवस्की को नावरॉकी पर मामूली बढ़त दिखाई गई थी।
दोनों उम्मीदवारों ने किया था जीत का दावा
रविवार रात वोटिंग खत्म होने के बाद दोनों उम्मीदवारों ने वारसा में अपने-अपने समर्थकों के बीच जीत का दावा किया था। एक तरफ जहां ट्र्जासकोव्स्की ने कहा कि हम चुनाव जीत गए हैं और अब हम भविष्य पर ध्यान देंगे। यह पोलैंड के इतिहास में वाकई एक खास पल है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह हमें आगे बढ़ने और भविष्य पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा। मैं आपका राष्ट्रपति बनूंगा। वहीं दूसरी ओर नावरॉकी ने कहा कि हम जीतेंगे और पोलैंड को बचाएंगे। हम डोनाल्ड टस्क को सत्ता पर अपनी पकड़ पूरी तरह से कायम नहीं करने देंगे। अंतिम परिणाम सोमवार को आने की उम्मीद है।
क्या होगा पोलैंड का भविष्य
बता दें कि पोलैंड में जारी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर घमासान इसलिए भी खास है, क्योंकि यह चुनाव सिर्फ राष्ट्रपति चुनने का नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि पोलैंड एक राष्ट्रवादी रास्ता अपनाएगा या यूरोपियन यूनियन (ईयू) के साथ लिबरल सहयोग बढ़ाएगा। देखा जाए तो नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मौजूदा प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार की नीतियों को वीटो करने या समर्थन देने की भूमिका में होगा, जिससे सरकार का कामकाज प्रभावित हो सकता है।
दोनों नेताओं के विचार को समझिए
अब बात अगर दोंनों नेताओं के विचार की करें तो जहां एक तरफ रफाल ट्र्जासकोव्स्की (53), जो वारसा के मेयर भी हैं, एक प्रगतिशील नेता माने जाते हैं। वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहाल करने, महिलाओं के अधिकारों को सशक्त बनाने और यूरोपीय संघ के साथ मजबूत रिश्तों के पक्षधर हैं। ट्र्जासकोव्स्की रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर यूक्रेन की नाटो सदस्यता का भी समर्थन करते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने सामाजिक संवाद और विभाजन खत्म करने की बात कही है।
धार्मिक पहचान को प्राथमिकता देते है करोल नावरॉकी
वहीं दूसरी ओर, करोल नावरॉकी एक रूढ़िवादी विचारधारा के नेता हैं। वे पारंपरिक कैथोलिक मूल्यों और धार्मिक पहचान को प्राथमिकता देते हैं। वे यूरोपीय संघ की नीतियों को लेकर संदेह रखते हैं और गैरकानूनी प्रवासियों का कड़ा विरोध करते हैं। नावरॉकी यूक्रेन की नाटो सदस्यता के खिलाफ हैं, और उनका अभियान अमेरिकी दक्षिणपंथी एजेंडे से मेल खाता दिखा। हालांकि उनके अतीत में हिंसक झगड़ों और आपराधिक तत्वों से कथित संबंध रहे हैं, फिर भी उनके समर्थकों पर इसका खास असर नहीं पड़ा।




