भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 24वीं कांग्रेस में निर्वाचित केंद्रीय समिति की पहली बैठक 3 से 5 जून, 2025 को एचकेएस सुरजीत भवन, नई दिल्ली मे संपन्न हुई ।
केंद्रीय समिति ने आतंकवादी हमलों में मारे गए लोगों, पूर्वोत्तर में असमय आई बाढ़ में जान गंवाने वालों और बेंगलुरु में भगदड़ के दौरान मृतकों के प्रति गहरा शोक व्यक्त किया।
केंद्रीय समिति ने राजनीतिक घटनाक्रमों पर विचार-विमर्श किया और निम्नलिखित वक्तव्य जारी किया:
गाजा पर इस्राइली आक्रमण:
केंद्रीय समिति गाजा पर इस्राइल द्वारा जारी नरसंहार की कड़ी निंदा करती है, जो इस क्षेत्र को पूरी तरह नष्ट कर उसे हड़पने के उद्देश्य से किया जा रहा है। भाजपा सरकार को तुरंत इस्राइल को हथियारों का निर्यात रोकना चाहिए और उससे सैन्य एवं सुरक्षा संबंध समाप्त करने चाहिए। सरकार को फिलिस्तीन के पक्ष में स्पष्ट और मजबूती से खड़ा होना चाहिए , हमारे एकजुटता के संकल्प को दोहराना चाहिए और दो-राष्ट्र समाधान की दीर्घकालिक विदेश नीति पर कायम रहना चाहिए।
पहलगाम आतंकी हमला और उसके बाद की स्थिति:
केंद्रीय समिति ने यह उल्लेख किया कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद देश की जनता ने एकजुट होकर इस भयावह घटना की निंदा की और शोक प्रकट किया। इस संदर्भ में जम्मू-कश्मीर के लोगों की प्रतिक्रिया विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जिन्होंने स्वतःस्फूर्त रूप से हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन किया।
हालांकि, हिंदुत्ववादी ताकतों ने जनता की इस एकता के विरुद्ध जाकर इस जघन्य आतंकी हमले का इस्तेमाल मुसलमानों और कश्मीरियों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए किया।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री और भाजपा ने इस सैन्य अभियान का प्रयोग संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए किया। प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में इस सैन्य कार्रवाई का चुनावी फायदे के लिए उपयोग, विशेष रूप से बिहार और पश्चिम बंगाल में, साफ़ तौर पर देखा गया।
सरकार से तत्काल जवाब की मांग करने वाले कई गंभीर सवाल सामने हैं। सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि अनुच्छेद 370 हटाने और जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद वहां हालात सामान्य हो गए हैं। लेकिन यह गलत दृष्टिकोण गंभीर सुरक्षा चूकों का कारण बना है। जिन आतंकियों की पहचान हो चुकी है, उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। इन चूकों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
आतंकवाद से लड़ने का पहला सबक है—जनता की एकता को मज़बूत करना, आवश्यक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना, सभी कमजोरियों को दूर करना और जनता के जीवन की रक्षा करना।
10 मई को हुए संघर्ष विराम की घोषणा जिस प्रकार की गई, उस पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार यह दावा किया है कि अमेरिका ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों को संघर्षविराम पर सहमत कराया। इस दावे का कोई प्रभावी खंडन अब तक नहीं किया गया है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की केंद्रीय समिति इस प्रकार के अमेरिकी हस्तक्षेप का कड़ा विरोध करती है। भारत और पाकिस्तान के बीच के मामलों के समाधान में इस तरह का बाहरी हस्तक्षेप हमारे देश की राजनीतिक सहमति के खिलाफ है।
केंद्रीय समिति ने सरकार द्वारा संसद का विशेष सत्र बुलाने से इनकार किए जाने की कड़ी निंदा की है, जबकि समूचे विपक्ष ने आतंकवादी हमलों और उनके बाद की स्थिति से जुड़े सभी मुद्दों पर चर्चा के लिए इसकी मांग की थी। संसद को बुलाने के बजाय प्रधानमंत्री देश भर में घूम-घूम कर युद्धोन्माद फैलाने और राजनीतिक योजना के लिए इसका उपयोग करना चाहते हैं।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का यह निरंतर मानना रहा है कि आतंकवाद पर काबू पाने के लिए केवल सैन्य उपाय ही पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए राजनयिक, राजनीतिक और अन्य उपायों को भी समान रूप से अपनाना आवश्यक है। प्रधानमंत्री द्वारा घोषित नई नीति इन सभी विकल्पों को दरकिनार कर देती है। यह दृष्टिकोण केवल युद्धोन्माद को बढ़ावा देगा, सीमा के दोनों ओर कट्टरपंथी ताकतों को मजबूत करेगा और साम्प्रदायिक विभाजन को और गहरा करेगा।
साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और नफ़रत फैलाने वाला अभियान:
भाजपा/आरएसएस ने अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाले अपने साम्प्रदायिक अभियान को और तेज कर दिया है। पीड़ित परिवारों, सेना के प्रवक्ता और विदेश सचिव तक को ट्रोल किया गया। भाजपा के मंत्रियों और नेताओं ने इस संबंध में अत्यंत आपत्तिजनक बयान दिए हैं। सरकार ने इन पर कोई कार्रवाई करने के बजाय चुप्पी साधे रखी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह इस नफ़रत फैलाने वाले अभियान को मौन समर्थन दे रही है।
मुख्यधारा का एक बड़ा हिस्सा—जो कॉरपोरेट मीडिया के नियंत्रण में है—ने भी युद्धोन्मादी और साम्प्रदायिक ज़हर फैलाया, जिससे देश की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचा।
इसके विपरीत, सरकार ने आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने के लिए अपनी पुलिस और जांच एजेंसियों को सक्रिय कर दिया है। इस प्रकार के हमले सरकार के नव-फासीवादी चरित्र को उजागर करते हैं।
प्रवासी मुसलमानों पर हमला:
प्रवासी मुसलमानों, विशेषकर बांग्लाभाषी लोगों को ‘बांग्लादेशी’ कहकर निशाना बनाया जा रहा है और जबरन देश से बाहर निकाला जा रहा है।
जब पूरा देश आतंकवादी हमलों और साम्प्रदायिक घृणा से व्यथित है, तब भाजपा सरकार आक्रामक रूप से अपनी नवउदारवादी नीतियों को आगे बढ़ा रही है, जिससे केवल उसके पूंजीपति मित्रों को लाभ हो रहा है। आरएसएस/भाजपा की साम्प्रदायिक नीतियाँ लोगों को आपस में बांटने के उद्देश्य से चलाई जा रही हैं, ताकि जनता का ध्यान भटकाया जा सके, उनकी एकता को तोड़ा जा सके और उनके आजीविका पर हो रहे हमलों को जारी रखा जा सके।
भारतीय अर्थव्यवस्था का असली चेहरा:
सरकार जानबूझकर हमारी अर्थव्यवस्था की सच्चाई को छिपा रही है। वह ढिंढोरा पीट रही है कि भारत की अर्थव्यवस्था इस साल के अंत तक जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी, जबकि भारत और जापान के बीच प्रति व्यक्ति आय का बड़ा अंतर जैसे तथ्य को छुपाया जा रहा है।
बढ़ती असमानता, श्रमिक वर्ग की आजीविका का संकट — यही हमारे अर्थतंत्र की असली पहचान हैं, जिन्हें उजागर करना बेहद ज़रूरी है।
महत्वपूर्ण क्षेत्रों का निजीकरण:
सरकार ने परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में निजीकरण और विदेशी कंपनियों के प्रवेश को अनुमति देने पर सहमति जताई है। अमेरिकी परमाणु रिएक्टर निर्माताओं के भारत में प्रवेश को संभव बनाने के लिए सरकार ने परमाणु दायित्व कानून में संशोधन पर सहमति दी है, जो भारतीय जनता की सुरक्षा के साथ गंभीर समझौता है। पहली बार, लड़ाकू विमानों के उत्पादन को निजी कॉरपोरेशनों को सौंपा जा रहा है। रक्षा, खनन और परमाणु ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों का निजीकरण हमारे संप्रभुता और सुरक्षा पर सीधा हमला है।
साम्राज्यवादी दबावों के आगे झुकाव:
भारत सरकार इस वर्ष के अंत तक अमेरिका के साथ एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) पर हस्ताक्षर करने की योजना बना रही है। जुलाई से पहले वह एक अंतरिम व्यापार समझौते को अंतिम रूप देना चाहती है। रिपोर्टों के अनुसार, सरकार ने पहले ही अमेरिका की मांगों को मानते हुए कई वस्तुओं पर टैरिफ कम करने पर सहमति दे दी है। प्रस्तावित BTA भारतीय किसानों की आजीविका के लिए खतरा है और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा दवा क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।
सरकार एलन मस्क की स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को भारत में अनुमति देने की तैयारी में है, जबकि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ने की आशंकाएं हैं। सरकार पहले ही ब्रिटेन के साथ एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) कर चुकी है और कई ऐसे ही समझौते प्रक्रिया में हैं। ये सभी समझौते अपारदर्शी तरीके से किए जा रहे हैं, न तो किसी से सलाह-मशविरा किया गया और न ही किसानों व मज़दूरों के हितों की कोई परवाह की गई।
केंद्रीय समिति ऐसे सभी समझौतों का विरोध करती है जो भारतीय मेहनतकश वर्ग और जनता के हितों से समझौता करते हैं।
सामान्य जनगणना और जातिगत जनगणना:
केंद्र सरकार को जानबूझकर और अत्यधिक देरी के बाद अंततः यह घोषणा करने के लिए मजबूर होना पड़ा कि वह वर्ष 2027 में सामान्य जनगणना के साथ-साथ जातिगत जनगणना भी कराएगी। सरकार की मंशा और जिस प्रक्रिया को वह अपनाना चाहती है, उसे लेकर विभिन्न आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। सरकार को चाहिए कि वह तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाकर इन मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करे।
राज्यपालों के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपालों के अधिकारों पर दिए गए फैसले को स्वीकार करने और राज्य विधानसभाओं की इच्छा का सम्मान करने से इंकार कर रही है। इसके बजाय, उसने सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति संदर्भ भेजा है। यह भाजपा की अधिनायकवादी प्रवृत्ति और संघीय ढांचे के सिद्धांतों के प्रति उसकी अवमानना को दर्शाता है।
9 जुलाई की आम हड़ताल को समर्थन:
केंद्रीय समिति 9 जुलाई को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा आहूत आम हड़ताल को पूरा समर्थन देती है। उसी दिन किसान और कृषि मज़दूर भी अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। समिति अपने सभी सदस्यों और इकाइयों से अपील करती है कि वे हड़ताल को सफल बनाने के लिए सक्रिय प्रचार करें और इसमें पूरी तरह भाग लें।
पूर्वोत्तर में बाढ़:
पूर्वोत्तर भारत में असमय आई बाढ़ ने भारी जान-माल की तबाही मचाई है। 36 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 5,00,000 से अधिक लोग अपने घरों से बेघर हो गए हैं। केंद्र सरकार को तत्काल हस्तक्षेप कर पर्याप्त राहत और पुनर्वास सुनिश्चित करना चाहिए।
चुनाव:
बिहार विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2025 में होने हैं। पार्टी ने भाजपा और उसके सहयोगियों को हराने के लिए बिहार में सभी वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष विपक्षी दलों के साथ बातचीत शुरू कर दी है।
भविष्य के आव्हान :
1. केंद्रीय समिति ने जून माह में आतंकवाद, युद्धोन्माद और पहलगाम आतंकी हमले का उपयोग कर साम्प्रदायिक नफरत फैलाने की कोशिशों के खिलाफ एक सप्ताह का अभियान चलाने का निर्णय लिया है।
2. पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल 10-11 जून 2025 को कश्मीर का दौरा करेगा, जिसका नेतृत्व महासचिव एमए बेबी करेंगे। प्रतिनिधिमंडल में अन्य सदस्य होंगे: अमरा राम (राजनीतिक ब्यूरो सदस्य, लोकसभा सांसद), के. राधाकृष्णन (केंद्रीय समिति सदस्य, लोकसभा सांसद), जॉन ब्रिटास (केंद्रीय समिति आमंत्रित सदस्य, राज्यसभा सांसद), विकास रंजन भट्टाचार्य (राज्यसभा सांसद), सु. वेंकटेशन (लोकसभा सांसद) और ए.ए. रहीम (राज्यसभा सांसद)।
3. पूरी पार्टी तुरंत गाज़ा, फ़िलिस्तीन पर इज़राइल द्वारा किए जा रहे नरसंहार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करेगी।
4. केंद्रीय समिति ने आपातकाल की घोषणा की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए कार्यक्रम आयोजित करने और वर्तमान सरकार की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को उजागर करने का निर्णय लिया है। इस अवसर का उपयोग आपातकाल के दौरान आरएसएस की संदिग्ध भूमिका को उजागर करने के लिए किया जाएगा।
संगठनात्मक निर्णय:
केंद्रीय समिति ने संगठन से संबंधित कुछ निर्णय भी लिए। एक केंद्रीय सचिव मंडल का गठन किया गया, जिसमें शामिल हैं: एमए बेबी, बीवी राघवुलु, मुरलीधरन, राजेंद्र शर्मा, के. हेमलता, विक्रम सिंह और केएन उमेश।





