नब्बे वर्षों की विरासत और वर्तमान चुनौतियां

लेखक: डॉ. सुनीलम
समाजवादी आंदोलन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज तक सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और समानता की भावना को जीवित रखने में अग्रणी भूमिका निभाई है। आज, जब आंदोलन के 90 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तब देश सांप्रदायिक हिंसा, जातिवाद, बेरोज़गारी, अशिक्षा और गरीबी जैसी भीषण चुनौतियों से जूझ रहा है। इन चुनौतियों के सामने समाजवादी विचारधारा को और अधिक संगठित, सक्रिय और जनोन्मुखी होने की आवश्यकता है।

मुलायम सिंह यादव ने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी का निर्माण कर समाजवादी आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की
सिर्फ पार्टी नहीं, विचारधारा और जनसंगठन भी जरूरी
अक्सर समाजवादी आंदोलन को केवल राजनीतिक दलों तक सीमित कर के देखा जाता है, जबकि किसान, मजदूर, महिलाएं, दलित, युवा, लेखक, पत्रकार, कलाकार और वैज्ञानिकों की भूमिका उतनी ही अहम रही है। 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन से लेकर आज तक कई संगठनात्मक रूप बदलते रहे, लेकिन समाजवाद का मूल उद्देश्य—जनकल्याण और समानता—अडिग रहा।

गोवा मुक्ति आंदोलन के नेतृत्व डॉ राममनोहर लोहिया ने किया।
ऐतिहासिक संघर्ष और योगदान
समाजवादियों ने भारतीय राजनीति और समाज को अनेक मोर्चों पर दिशा दी। इसमें जमींदारी और राजशाही उन्मूलन, चौखंबा पंचायत मॉडल, गोवा मुक्ति आंदोलन, आपातकाल का विरोध और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना, मंडल आयोग की सिफारिशें, वैकल्पिक विकास नीतियों का समर्थन, निजीकरण और कारपोरेट पूंजी के खिलाफ संघर्ष

महात्मा गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन का 1942 का आह्वान, इसको समाजवादियों में अमली जामा पहनाया
आत्मचिंतन आवश्यक, लेकिन आंदोलन की कमियां
इस आंदोलन की कमजोरियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता—अहंकार, आंतरिक कलह, व्यक्तिवाद, संस्थागत अनुशासन की कमी ने इसे बार-बार कमजोर किया। अगर, हमें भविष्य की राह तय करनी है, तो बीते समय की ईमानदार समीक्षा करनी होगी।
आज की वास्तविकता, संविधान और लोकतंत्र खतरे में
2014 के बाद से देश में लोकतंत्र के मूल स्तंभ—संविधान, न्यायपालिका, मीडिया, चुनाव आयोग—लगातार कमजोर किए गए हैं। भाजपा- एनडीए शासन ने सत्ता को कारपोरेट हितों के हाथों सौंप दिया है। ऐसी परिस्थिति में समाजवादी ताकतों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। संविधान शाखाएं और जनचेतना का विस्तार जरूरी हो गया है। संघ की शाखाओं की वैचारिक चुनौती का उत्तर हमें “संविधान शाखाओं” से देना होगा। संविधान और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े गीत और नाटक जरूरी हो गए हैं। राष्ट्रीय ध्वज के साथ योग, व्यायाम, लोक शिक्षा और राष्ट्र सेवा दल की गतिविधियाँ गांव-गांव, मोहल्लों तक पहुँचें

1974 के छात्रों के आंदोलन को जे पी ने नेतृत्व दिया।
राजनीतिक विकल्प नहीं, जन आंदोलन ही रास्ता
राजनीतिक विकल्पों की कमी के बीच जन आंदोलनों ने हमेशा बदलाव की राह दिखाई है। जिसके चलते भूमि अधिग्रहण कानून की वापसी, तीन कृषि कानूनों का रद्द होना, शाहीन बाग आंदोलन,वनाधिकार और दलित आंदोलन आदि ये उदाहरण बताते हैं कि सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन ही समाजवादी आंदोलन का दीर्घकालिक लक्ष्य होना चाहिए।
आगे की राह को चार बिंदुओं पर कार्य योजना जरूरी
इसमें संविधान जागृति अभियान, हर नागरिक तक संविधान की प्रति, स्कूलों, पंचायतों में संविधान पाठ और चर्चा, राष्ट्र सेवा दल की पुनर्स्थापना, मोहल्ला स्तर पर शाखाएं, योग, गीत, नाटक, तिरंगे के साथ क्रियाशीलता, आंदोलन आधारित जनसंगठन, सत्याग्रह और सामूहिक नेतृत्व पर आधारित,सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया का विस्तार,वैचारिक और लोकतांत्रिक संगठन निर्माण, पूंजी, जाति और सत्ता के प्रभाव से मुक्त, वैचारिक प्रशिक्षण और आंतरिक लोकतंत्र पर बल जरूरी हो गया है।





