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*आखिरकार, अमेरिका को झुकना पड़ा…..चीन बन चुका है अमेरिका से बड़ी ‘पावर’?*

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चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए अच्‍छी नहीं कही जात सकती है। वह दुश्‍मन देश पाकिस्‍तान का समर्थक है। क्षेत्र में भारत को वह अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता है। चीन के साथ अमेरिका की डील होने पर निश्चित रूप से जो कंपनियां भारत की ओर रुख कर रही थीं, वे अपने प्‍लान को थोड़े समय के लिए बदल सकती हैं। यह भारत के लिए तैयारी का भी समय है। उसे अपनी आर्थिक और सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने पर फोकस बढ़ाना होगा। साथ ही अमेरिका और अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने होंगे। भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उसे अपनी तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाना होगा। आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना होगा। भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने की जरूरत है।

अमेरिका और चीन के बीच चल रही ट्रेड वॉर ठंडी होती दिख रही है। दोनों देश एक अस्थायी समझौते पर राजी हो गए हैं। इसके तहत, अमेरिका चीन से आने वाले ज्यादातर सामान पर टैरिफ 145% से घटाकर 30% कर देगा। वहीं, चीन अमेरिका से आने वाले सामान पर लेवी 125% से घटाकर 10% करेगा। यह समझौता 90 दिनों के लिए किया गया है। इसका मकसद दोनों देशों के एक्सपोर्टर्स को राहत देना और ग्लोबल मार्केट को शांत करना है। दोनों देश आगे भी बातचीत जारी रखेंगे ताकि कोई स्थायी समाधान निकल सके। यह अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के रुख में बड़े बदलाव की ओर भी इशारा करता है। अमेरिका ने जब से ट्रेड टैरिफ का ऐलान किया, दुनिया में एक चीन ही है जिसने इसका जवाब दिया। उसने साफ कर दिया कि वह ट्रंप की मनमानी को कतई नहीं मानेगा। यह चीन की बढ़ती ताकत का साफ नमूना है। आज चीन की वह हैसियत है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था को चुनौती देने पर आ गया है।

अमेरिका और चीन के बीच ट्रंप की टैरिफ नीति के बाद से ही टकराव चल रहा था। अमेरिका ने चीन से आने वाले सामान पर 145% टैक्स लगा दिया था, जिसके जवाब में चीन ने अमेरिका से आने वाले सामान पर 125% टैक्स लगा दिया था। साथ ही, चीन ने अमेरिका को ‘दुर्लभ खनिजों’ का निर्यात भी रोक दिया था। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग बंद हो गया था, जो लंबे समय तक नहीं चल सकता था। आखिरकार, अमेरिका को झुकना पड़ा।

अमेरिका के झुकने के पीछे कई कारण

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार को लेकर जो समझौता हुआ है, उसके कुछ कारण हैं। पहला कारण यह है कि अमेरिका में महंगाई बढ़ रही है। चीन से सामान कम आने और आयात पर ज्यादा टैक्स लगने से अमेरिका में चीजों की कीमतें बढ़ गई हैं। इससे आम लोगों को परेशानी हो रही है और सरकार पर दबाव बढ़ रहा है। दूसरा कारण यह है कि अमेरिकी बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर चीन से आने वाले सामान में भारी कमी आई है। इससे कारोबारियों को नुकसान हो रहा है और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। तीसरा कारण यह है कि चीन में भी फैक्ट्रियों में उत्पादन कम हो गया है। इससे चीन की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान हो रहा है। इन सभी कारणों से दोनों देशों पर समझौता करने का दबाव था।

इस समझौते से दोनों देशों को कुछ फायदे हो सकते हैं। अमेरिका को महंगाई से राहत मिल सकती है, क्योंकि चीन से सामान आने पर टैक्स कम हो जाएगा। इससे अमेरिकी कारोबारियों को भी फायदा होगा, क्योंकि वे चीन से सस्ता सामान आयात कर सकेंगे। चीन को भी फायदा होगा, क्योंकि उसकी फैक्ट्रियों में उत्पादन फिर से शुरू हो जाएगा और अर्थव्यवस्था में सुधार होगा।

हालांकि, इस समझौते से कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका ने चीन के सामने झुककर गलती की है। उनका कहना है कि चीन गलत तरीकों से दुनिया के बाजार पर कब्जा कर रहा है और उसे सबक सिखाना जरूरी था। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस समझौते से अमेरिका की नौकरियां कम हो जाएंगी, क्योंकि कंपनियां चीन से सस्ता सामान आयात करेंगी और अमेरिका में उत्पादन कम कर देंगी।

भारत को रहना चाहिए तैयार

चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए अच्‍छी नहीं कही जात सकती है। वह दुश्‍मन देश पाकिस्‍तान का समर्थक है। क्षेत्र में भारत को वह अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता है। चीन के साथ अमेरिका की डील होने पर निश्चित रूप से जो कंपनियां भारत की ओर रुख कर रही थीं, वे अपने प्‍लान को थोड़े समय के लिए बदल सकती हैं। यह भारत के लिए तैयारी का भी समय है। उसे अपनी आर्थिक और सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने पर फोकस बढ़ाना होगा। साथ ही अमेरिका और अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने होंगे। भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उसे अपनी तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाना होगा। आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना होगा। भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने की जरूरत है।

Ramswaroop Mantri

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